साहित्य अकादमी पुरस्कार रै मौकै राजस्थानी लेखक रौ बयान:

भासा रै मांण बिना….

शसा अर साहित्य रै हलकै में काम करण वाळा सिरजणधर्मियां नै आज सगळां सूं मोटी चिन्ता रौ विसै औ है के भासा अर साहित्य री साख नै किण भांत कायम राखीजै। जीवण री जरूरतां अर लोगां री रुचियां में इत्ती तब्दीली आयगी के खुद साहित्य री प्रासंगिकता आज चरचा रै घेरै में आयगी-सी लखावै। इसै  बगत में किणी भासा रै सिरजणहार रै काम नै समझणौ अर उणरी कूंत करणी निस्चैई जोखम रौ काम लागै, जिणरी अंवेर-परख करतां लूंठां-लूंठां री ऊरमा निठ जावै। जोखम इण बात रौ के कोई रै साथै अणजाण्यां अन्याव नीं व्हे जावै। केई लोगां नै इण बात रौ भारी गुमान व्है के बगत अर सगळी कायनात वांरै ई हलायां हालै अर वै नीं चावै तौ नींबड़ी रौ पत्तौ ई नीं खुड़कै। पण अणभव सूं तौ आ ई बात पतीजै के बगत किणरै ई दाव में नीं आवै। बगत रा केई रूप व्है। वौ घड़ी-पुळ में बरतीजै – वौ दिनां, महीणां, बरसां अर जुगां में आपरौ गेड़ दरसावै, पण किणी गेड़ में वौ बगत पाछौ कदेई नीं आवै, जिकौ आपरौ दरसाव पूरौ कर आगीनै लंघ जावै। आछौ रचनाकार कदेई आपरै बगत री बेकदरी नीं करै अर नीं कदेई खुद नै बगत सूं ऊपर अर अलायदौ आंकै। विगत, वरतमान अर आगत रै अटूट क्रम में हरेक रचनाकार आपरी जीवण-जातरा अर काम नै इण भांत तेवड़ै / अंगेजै अर आपरै अणथक कमतर सूं उणनै पोखै के उणसूं जीवण अर नुंवै सिरजण री आस पूरीजै – अठै तांई के उणरौ मिनख जमारै आवणौ उणी रूप में सारथक गिणीजै।

इणी जीवण-जातरा में खुद रै अणभव अर हालात री सीध मुजब जद-कद ई म्हैं चौफेर जीवण री अबखायां अर बदळावां नै समझण री कोसीस करूं तौ म्हनै रेगिस्तान रै गांवाई जीवण में बदळाव री आ रफत खासी धीमी लागै। कोसां पसर्योड़ी दीखै वाई बेथाग बेकळू रेत – रेत री ओकळियां, धोरा अर धोरां री घम-घेर में गमियोड़ा गांव, जठै चौगिड़दै सून्याड़ पड़ी है। घरां रै उपरांखर हालता छीदा रूंख, गोरवैं पांघरता लीला आक, बांवळिया, जंगी कैर अर लूंख सूं नचीती झंखर खेजड़ियां री खेप, जठै जिनगाणी में नुंवै जीवण री आस अर बदळाव रा अैनांण स्यात् सोधियां ई लाधै। आखै ऊन्हाळै हांफळती सूनी आंधियां, सीयाळै री हाड-कंपाती ठार अर पतबायरौ बरसाळौ – इण  धोरा-धरती में जमानौ कदेई आवै अर कदेई अधरस्ते ई पूठौ घिर जावै। आंई कुदरती हालात में फंसियोड़ी जिनगाणी – आई-साल बगत री धार में अणचींती बह जावै। पण बात तौ उणांरी है, जिका बगत अर हालात रौ नैठाव सूं आमनौ करै अर आपरी जीवारी में उणरी दिस अर दीठ नै फोरण री हूंस राखै। अैड़ा ई जूंझारू लोगां री आफळ उण सिरजण री साख बणावै, जिकौ जीवण में नुंवी दीठ अर बदळाव री लूंठी हिमायत करै।

आजादी पाछला पिचपन बरसां में अबखती जीवारी हाल वियां ई उरशंणै पगां भाजै। हालात रौ आमनौ करै। मुलक रा मोटा ठावा-ठिकाणां, मैकमां अर मौजीज मानीजण वाळा मिनखां रै बिच्चै, रह्यंा उपरांत ई म्हनै आपरी जलमभोम, जामण री बोली अर बाळपणै रा वै संगळी-संगाती, जिका ओजूं हालात सूं बाथेड़ा करै, आपरै मने-ग्याने घणा नीजू अर नैड़ा लखावै। जे म्हारै सारै में व्है, तौ लारै बचियोड़ी जिनगाणी, म्हैं ओजूं वांरै ई बिच्चै बितावणी पसंद करूं, पण आ बात अब सारै कठै?

बाळपणौ तौ वियां ई बगत रै हवालै मानीजै,  उणमें धार सूं न्यारौ के अपूठौ बैवण री तौ बात ई कठै ? भणाई टाबर रै विकास रौ आधार व्हिया करै अर वौई आधार जीवण जातरा री असली पूंजी। जद म्हैं इण दीठ सूं खुद री जातरा नै देखूं तौ उण जीवण अर अणभव रा केई चितराम बणता-बीखरता दीखै। अठै आ बात ई बिगताय दैवणी वाजिब व्हैला के म्हारी पीढी रा टाबरां नै आपरी मायड़भासा में भणाई रौ हक कदेई नीं मिळियौ अर म्हांनै अेक अैड़ी भासा सीखणी पड़ी जिणनै आज तांई  घर में बरतावतां म्हांनै संकौ आवै। हालात ओजूं वै ई है।

बगत री सगळां सूं मोटी खासियत आ मानीजै के वौ कठैई घड़ी-पलक ई ढबै नीं अर नीं कोई रौ मारग ढाबै। जोतसियां रै भोळावै मरजी पड़ै जित्ता टूणा-टोटका करवायलौ, बगत नीं आपरै पख में करियौ जा सकै अर नीं बख में। अलबत आं टोटकां में आपरै बगत रौ पोखाळौ जरूर व्है। बगत रै साथै केई वार आछा संजोग ई मिनख री गरज साज दिया करै। म्हारी इण जीवण-जातरा में बगत अर संजोग रौ जिकौ साथ रह्यौ उणसूं जे कोई औ नतीजौ काढण री कोसीस करै के जीवण में जिकौ कीं व्है, बगत रै साथ दियां सूं ई संभव व्है, तौ आ बात म्हारै हीयै कत्तेई नीं ढूकै। असल बात तौ आ ई है के हरेक मिनख नै जीवण में अबखा हालात सूं बारै आवण रौ मारग खुद आपरी आफळ अर सूझ-बूझ सूं ई सोधणा पड़ै।

जिनगाणी री इणी आफळ अर अणभव सूं सिरज्योड़ी जिण कथा-पोथी रै ओळावै आज म्हैं आपरै सांम्ही हूं, उणरी प्रस्तावना में कथ्योड़ी बात में आपरौ सुर रळावतां म्हैं आ बात फेरूं दोहरावणी चावूं के ‘‘रेगिस्तानी हलकै में मिनख री जीवारी आपरै आपै सारू जूंझण रौ ई दूजौ नांव गिणीजै, जठै आखौ हलकौ अर उणरा रैवासी – खासकर करसा, कारीगर अर लुगायां कुदरती हालात अर लोकराज री सुस्ती में फळती अबखायां सूं तौ जूंझै ई, वै जिण घर-परिवार, समाज अर चौफेर में जलमै अर जीवै, उणरी बदळाव-विरोधी मनगत अर सामंती मांन-मोल वांरी दोजखी नै औरूं दूणी कर नांखै, पण जिका सावचेत मानवी आं हालात सूं अणथक जूंझण री हूंस राखै, अहोड़ा अर अबखायां वांरै आतम-बळ अर खुलतै मारग में कठैई आडा नीं आवै।

इण अबखी जातरा में लुगायां नै आपरी जीवारी संवारण सारू ओपता अवसर किणी भावाजोग के भलाई सूं हाथ नीं आवै, वांनै तौ सावचेत रैय आपरै पख में फोरणा अर अंगेजणा ई पड़ै। वां बणती गुजायसां नै अंगैजतां खुद रै आपै सारू अर आप-सरीखा मिनखां री जीवारी सारू अेक सबखौ अर ऊजळौ मारग बणावणौ पड़ै – निस्चैई इण कमतर में वै खुद री जिनगाणी नै तौ सोरी अर सारथक बणावै ई, अैड़ी अेकठ कारवायां रौ बळ बंधावतां दूजां नै ई भागीदार बणण री मांयली ऊरमा देवै – वांरै जीवण में ऊंडी आस्था अर नुंवौ आतम-विस्वास उपजावै।

आजादी पाछला आं बरसां में इण गांवाई समाज में कांई बदळाव आयौ – हलकै रा बारला हालात अर मिनख री मांयली मनगत में कांई तब्दीली व्ही, जीवण रा बुनियादी असूल अर जीवण-मोल किण अगन-परीक्षा सूं गुजर्या अर वांरी कांई गत-गुंजायस बणी ‘सांम्ही खुलतौ मारग’ रा सावचेत मानवी चरित इणी आफळ अर ऊरमा रौ मांयलौ सांच सांम्ही लावै। दूजै अरथ में आ कथा कीं ठावा चरितां रै जीवण-संघर्ष अर वांरी जीवण-दीठ रै बुनियादी फरक नै दरसावण वाळा घटणा-परसंगां री मारफत वांरै अंतस री पीड़, मनोभाव अर मांयली अमूंज नै तौ सांम्ही लावै ई, आं बदळता हालात में जिनगाणी री डोर आपरै हाथ में राखण री मनगत वाळा माईतां अर समाज रा आगीवाणां रै सांम्ही कीं अैड़ा अबखा अर आकरा सवाल ई ऊभा करै के वांरौ आपौ अर आमूळ आचरण खुद वांरी निजरां में ई एक लूंठौ सवाल बण जावै।

आ बात एक हद तांई आछी लागै के साहित्य अकादमी तमाम भारतीय भासावां में सिरजण नै पूरौ मांण देवै अर इण पेटै वै ‘मेजर’ या ‘माइनर’ भासावां रौ कोई भेद नीं राखै – आ बात वां भासावां रा लिखारां नै कीं थ्यावस अवस देवै, जिकां री मायड़भासा संविधान री आठवीं सूची सूं हाल बारै है। म्हैं अर म्हारै जैड़ा सईकडूं राजस्थानी लिखारा आजादी-पाछला पिचपन बरसां सूं जिण मायड़भासा री मान्यता सारू बाट उडीकां, जे भारतीय लोकतंत्र में उणरी कोई सुणवाई नीं व्है, तौ म्हांरौ नीजू मांण-सम्मान अठै कांई अरथ राखै ! म्हैं बिना किणी भावावेस के आवाज नै ऊंची करियां, म्हारै हीये री मांयली पीड़ सूं आ बात दोहरावणी चावूं के म्हारौ औ मांण-सम्मान तद तांई अधूरौ है, जद तांई के राजस्थानी नै भारतीय संविधान री आठवीं सूची में उणरौ वाजबी हक नीं दिरीजै।

जिण भासा में सात सौ बरसां री लूंठी साहित्य-परम्परा मौजूद रही व्है, कविता, कथा, नाटक अर गद्य री विधावां में ओपतौ सिरजण मौजूद व्है, हजारूं हस्तलिखित ग्रंथ अर छपियोड़ी पोथियां मौजूद व्है, लोककथावां, लोक-नाटकां, लोकगीतां अर ओखाणां रौ अखूट भंडार मौजूद रह्यौ व्है, जिकी आजादी सूं पैली रियासतां री राजभासा रही व्है, भणाई, कारोबार अर आम बोलचाल री आधार रही व्है, जिणरौ आपरौ सबदकोस व्है, न्यारी व्याकरण मौजूद व्है, उण सजीव अर समरथ भासा नै संविधान री आठवीं सूची में कोई ठौड़ नीं दिरीजणी एक इसी पीडा़ है के उणनै वौ ई जांण सकै जिणरै साथै आ बीती व्है।

आ बात म्हैं अखराय नै कैवणी चावूं के किणी हलकै विसेख री भासा अर संस्क्रती सूं जुड़ियोड़ा जिका सवाल राजनीत री जाजम माथै आगै कदेई सलटावण रै ओळावै टाळ दिया जावै, निरमोही बगत अर फुरता हालात फेरूं वांनै उणी सरूप अर सीध में सुळझण रौ संजोग कम ई देवै। उण समाज री चेतना अर सरोकारां में जे वै सवाल बरसां पछै ई किणी न्यावू निवेड़ै री उडीक में जागता दीख जावै तोै वांरौ निवेड़ौ तौ कीं व्है के नीं व्है, उण समाज री जीवारी अर उणरै सिरजण री साख जरूर सांसत में पड़ जावै। राजस्थानी भासा री संवैधानिक मान्यता अर उणरै विकास रौ सवाल एक इणी भांत रौ टाळियोड़ौ सवाल है जिणरौ कोई न्यावू निवेड़ौ म्हनै नैड़ौ नीं दीखै। इणनै मुलक रा आगीवाणां री अदूरदर्सिता कैवां के इतिहास री खांमी, जिणरौ खामियाजौ इण भासा रा किरोडूं हिमायती अर लिखारा लारला पचास बरसां सूं भोगता आया है अर आगै ई कुण जाणै कित्ता बरस औरूं भोगता रैवैला।

आप तमाम भारतीय भासावां रा मौजीज लिखारां अर लोकतंत्र रा लूंठा हिमायतियां रै बिच्चै आज म्हैं अरज करणी चावूं के आप कित्ताक बरसां तांई यूं मून धारियां इण अन्याव नै देखता रेवोला अर आपरे सिरजण में मानवीय अधिकारां अर लोकतंत्र री दुहाई देवतां कोई संकोच नीं करौला ! सेवट कद तांई?

नन्द भारद्वाज

पीव बसै परदेस

एक अणचींतै हरख

अर उमाव में थूं  उडीकै

मेड़ी चढ़ खुलै चौबारै

सांम्ही खुलतै मारग माथै

अटक्योड़ी रैवै अबोली दीठ

पिछांणी पगथळियां री सौरम

सरसै मन रा मरूथळ में

हेत भरियै हीयै सूं

उगेरै अमीणा गीत

अणदीठी कुरजां रै नांव

संभळावै झीणा सनेसा !

हथाळियां राची मेंहदी अर

गैरूं वरणै आभै में

चितारै अलूंणै उणियारै री ओळ

भीगी पलकां सूं

पुचकारै हालतौ पालणौ !

आंगणै अधबीच ऊभी निरखै

चिड़कलियां री रळियावणी रम्मत

माळां बावड़ता पाछा पंखेरू

छाजां सूं उडावै काळा काग

आथमतै दिन में सोधै सायब री सैनांणी !

च्यारूं कूंटां में

गरणावै गाढौ मूंन

काळजै री कोरां में

झबकै ओळूं री बीजळियां

सोपो पड़ियोड़ी बस्ती में

थूं जागै आखी रैण

पसवाड़ा फोरै धरती रै पथरणै !

धीजै री धोराऊ पाळां

ऊगता रैवै एक लीली आस रा अंकुर

बरसतां मेहुड़ां री छांट

मिळ जावै नेह रा रळकतां रेलां में !

पण नेह मांगै नीड़

जमीं चाहीजै ऊभौ रैवण नै

घर में ऊंधा पड़िया है खाली ठांव

भखारियां सूंनी      बूंकीजै –

खुल्ला करनाळा,

जीवण अबखौ अर करड़ौ है भौळी नार –

किरची किरची व्हे जावै

सपनां रा घरकोल्या:

वा हंसता फूलां री सोवन क्यार

वौ अपणेस गार माटी री गीली भींतां रौ

वा मोत्यां मूंघी मुळक –

हीयै रौ ऊमावौ:

जावौ बालम –

परदेसां सिधावौ !

थूं उडीकै जीवण री इणी ढाळ

अर रफ्तां-रफ्तां

रेत में रळ जावै सगळी उम्मीदां !

जिण आस में बरतावै आखौ बरस

वा ई कूड़ी पड़ जावै सेवट सांपरतां

परदेसां री परकम्मा रौ इत्तौ मूंघौ मोल –

मिनख री कीमत कूंतीजै खुल्लै बजारां !

आ सांची है के

परदेसां कमावै थारौ पीव

अर आखी ऊमर

थूं जीवै  पीव सूं परबारै !

1 Response to “राजस्थानी सिरजण”


  1. 1 गौतम April 23, 2011 at 11:48 am

    पिछांणी पगथळियां री सौरम

    सरसै मन रा मरूथळ में

    हेत भरियै हीयै सूं

    उगेरै अमीणा गीत

    अणदीठी कुरजां रै नांव

    संभळावै झीणा सनेसा !……..

    …… वाह सा- पीड ने दिया आप सबद भी अरथ भी !!!


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