नन्द भारद्वाज की कविताएं:

अपनी पहचान

इस सनातन सृष्टि की
उत्पत्ति से ही जुड़ा है मेरा रक्त-संबंध
अपने आदिम रूप से मुझ तक आती
असंख्य पीढ़ियों का पानी
दौड़ रहा है मेरे ही आकार में

पृथ्वी की अतल गहराइयों में
संचित लावे की तरह
मुझमें सुरक्षित है पुरखों की ऊर्जा
उसी में साधना है मुझे अपना राग

मेरे ही तो सहोदर हैं
ये दरख्त   ये वनस्पतियां
मेरी आंखों में तैरते हरियाली के बिंब
अनगिनत रंगों में खिलते फूलों के मौसम
अरबों प्रजातियां जीवधारियों की
खोजती हैं मुझमें  अपने होने की पहचान।

आपस का रिश्ता

इतना करार तो बचा ही रहता है
हर वक्त हाथी की देह में
कि अपनी पीठ पर सवार
महावत की मनमानियों को
उसके अंकुश समेत
उतार दे अपनी पीठ से बेलिहाज
और हासिल कर ले अपनी आजादी

सिर्फ अपनी परवरिश का लिहाज
उसके हाथों की मीठी थपकियां
और पेट भर आहार का भरोसा रोक लेता है
उसके इरादों को हर बार
एक अनकही हामी का आपसी रिश्ता
ऐसे ही बना रहता है दोनों के बीच
बरसों-बरस!

बीज की तरह

एक बरती हुई दिनचर्या अब
छूट गई है आंख से बाहर
उतर रही है धीरे धीरे
आसमान से गर्द
दूर तक दिखने लगा है
रेत का विस्तार
उड़ान की तैयारी से पूर्व
पंछी जैसे दरख्तों की डाल पर!

जानता हूं, ज्वार उतरने के साथ
यहीं किनारे पर
छूट जाएंगी कश्तियां
शंख-घोंघे-सीपियों के खोल
अवशेषों में अब कहां जीवन ?

जीवनदायी हवाएं बहती हैं
आदिम बस्तियों के बीच
उन्हीं के सहवास में रचने का
अपना सुख
निरापद हरियाली की छांव में!

इससे पहले कि अंधेरा आकर
ढंक ले फलक तक फैले
दीठ का विस्तार,
मुझे पानी और मिट्टी के बीच
एक बीज की तरह
बने रहना है पृथ्वी की कोख में!

मां और बच्चा

एक उम्मीद की तरह धारण करती है
जिसे मां अपनी कोख में
अपनी चिन्ताओं से दूर रखना चाहती है
बच्चे की भोली नींद
सहमी संज्ञाओं और अनाम आशंकाओं में घिरी
जीती है उसी की सांस में हर पल

कोख से अलग होते ही बदल जाती हैं
उनके बीच की सारी अन्तःक्रियाएं
वही अवयव एक निरापद आकार में
रचता है अपना न्यारा अन्तर्लोक
किसी उल्का-पिण्ड की तरह
अनंत आकाश में विचरता है  दिशाहीन
मां, फकत् रीझ भर सकती है उसके रास पर

उसकी हर इच्छा में खोजती अपना अक्स
वह दूर तक बनी रहना चाहती है
उसी की दुनिया में   अन्तर्लीन
कोई और विकल्प रहता ही नहीं शेष
उसकी आंख में!

जब किसी अनचाहे आघात से
आहत होती हैं यह हंसती-हुलसती दुनिया
कभी मंदिर कभी मस्जिद
कभी ईश्‍वर कभी इलाही
कभी वाहे गुरू के नाम पर
बेवजह औरों को आहत करने का
हेतु बनता है जब उसका अपना अंश
सिहर उठता है मां का जख्मी कलेजा
वह कलपती है  रोती है आखी रात
कोसती है मां अपनी कोख को ताउम्र!

मरु-जल

चिलचिलाती धूप के उस पार
फैला दीखता है जो चिलकता दरिया
वह होता नहीं दर-हकीकत कहीं –
जो कुछ बचा रहता है हमारी दीठ में
उसी को सहेजने की साध में
भागते रहते हैं दिशाहीन
सूरज उतर जाता है क्षितिज के पार
इस उजाड़ अंधेरे में छोड़कर अक्सर!

बरसों बाद
जब पलटकर आते हैं खाली हाथ
उन्हीं पगडंडियों पर खोजते
पांवों के नीचे थोड़ी-सी नमी
और सूनी आंखों में छुपाते अपनी प्यास
इस कोसों पसरे थार के अधबीच,
कंटीली झाड़ियां और छितरे दरख्त
यह धीरज बंधाते हैं कि कहीं गहरे में
संजोकर रखती है पृथ्वी अपना जल!

अलग तब कहां रहती प्यास
जिसे बरसों पहले बसा लिया था
घर बाहर की दुनिया में इकसार
चिलचिलाती धूप में
फिर कहां पाते अलग निराली छांव
जिन्हें चाव से उगाया था कभी
पहली बरसात में वे दरख्त
कभी हुए ही नहीं संभव

प्यासी हवाएं बेरोक निकल जाती रहीं
इस अधबसे आसरे के पार
जिसे उम्मीद से बसाया था हमारे पुरखों ने कभी
बेशक न सुझा पाएं कोई निरापद नदी का रास्ता
दरिया  दीखता हर पल –
निर्जल नहीं हैं हमारी स्मृतियां
जीते हैं हम इसी मरु-जल की
निर्मल आस में !

साहित्य-कर्म मेरे लिए जीने का तरीका है

0 नंद भारद्वाज

पिछले चार दशक से मैं हिन्दी और राजस्थानी में अपने लेखन-कार्य से जुड़ा हूं, लेकिन आज भी हर नयी रचना एक शुरूआत लगती है और संतोष तो बिरले ही होता है। लेखन मेरे लिए शौक या हॉबी का सबब कभी नहीं रहा, बल्कि यही मेरे जीने का तरीका है। कई बार लोग मुझसे लेखन की प्रेरणा को लेकर सवाल करते हैं तो मैं अवाक् रह जाता हूं। अगर संवाद मेरी जरूरत है, तो इसमें और किसी प्रेरणा को कैसे देखूं? लेखन मेरे लिए हमेशा संवाद की तरह ही रहा है – अपने समय के साथ और खुद अपने साथ भी। परिवार और परिवेश में कुछ कारण अवश्य बन जाते होंगे, जिनसे किसी रचनात्मक कार्य की शुरूआत संभव होती हो।

मैं गांव से आया हुआ व्यक्ति हूं, यह न कोई खूबी है और न कैफियत। वहां साहित्य या संस्कृति को लेकर ऊपरी तौर पर कोई स्वरूप या संकेत नहीं दिखाई देता, लेकिन उन संस्स्कारों की जड़ें शायद काफी गहरी थीं। उम्र के साथ ज्यों-ज्यों मेरी आंख खुलती गई और अपनी जड़ों की तलाश भी जारी रही तो मैंने पाया कि अद्भुत थे वे संस्कार और वह लोक-विरासत, जिसकी गोद में पलकर मैं बड़ा हुआ और अपना होश संभाला। मेरे बड़ों ने भी शायद यही अपेक्षा की थी कि मुझमें वही संस्कार और रुचियां विकसित हों, जो वे मुझ तक संजोकर लाए थे। खुद अपनी ओर से भी यही प्रयत्न रहा कि मैं उन चीजों को जानूं-समझूं। मैंने रुचि लेकर कोशिश की। इस लोक-विरासत से मिली रामायण, महाभारत की आख्यान-कथाओं को अपनी रुचि और उनकी प्रेरणा से जाना-समझा और सत्य, न्याय और लोकधर्म के प्रति एक बुनियादी आस्था अपने भीतर अंकुरित होते हुए महसूस की। उन्हीं स्कूली दिनों की शुरूआत में  मेरे एक प्रिय शिक्षक रहे – मास्टर लज्जाराम, जिन्होंने मेरे भीतर यह विश्वास पैदा किया कि जीवन में अगर कुछ बेहतर करना है तो अच्छी शिक्षा बेहद जरूरी है। मेरे इसी प्रारंभिक जीवन-अनुभव से जुड़ी कविता है, ‘हरी दूब का सपना’, जिसके केन्द्र में उन्हीं का आत्मीय व्यक्तित्व और बिखरते सपने संरक्षित हैं।

साहित्य-कर्म को मैं जीवन के एक सहज कर्म की तरह ही लेता हूं – जैसे किसान खेती करता है, कारीगर कोई उपकरण बनाता है या एक शिक्षक शिक्षण का काम करता है। लिखना-पढ़ना मेरे लिए उतना ही सहज और जरूरी काम रहा है, जितने जीवन के दूसरे काम। यह बात अनुभव से ही जानी है कि रचनाकर्म किसी जन्मजात प्रतिभा का मोहताज नही होता, वह सुरुचि और सतत अभ्यास से विकसित किया जा सकता है। लेखन एक दायित्वपूर्ण कर्म अवश्य है, लेकिन कोई अगर इसे विशिष्ट मानकर करता है और स्वयं भी विशिष्ट होने के भ्रम में जीता है, तो न उससे वह कर्म सधता है और न वैशिष्ट्य ही बन पाता है।

अपने बहुविध रचनाकर्म में कविता को मैं अपने चित्त के बहुत करीब पाता रहा हूं। यद्यपि अन्य विधाओं के साथ भी मेरा वैसा ही आत्मीय रिश्ता रहा है। यह बात बाद में जानी कि अनुभव की प्रकृति और अभिव्यक्ति का आवेग ही यह तय करता है कि मुझे अपनी बात किस साहित्य-रूप के माध्यम से कहनी है। किसी प्रासंगिक विषय पर वैचारिक विवेचन प्रस्तुत करना जरूरी लगा, तो आलोचना या निबंध मुझे अनुकूल विधा लगी, अगर कोई जीवन-प्रसंग फिक्शन के बतौर बयान करना ज्यादा सहज और जरूरी लगा, तो कहानी या उपन्यास के आकार में उसे ढालने का प्रयत्न किया। इसी तरह नाटक, संवाद, संस्मरण आदि में भी मेरी दिलचस्पी रही है। लेकिन अभिव्यक्ति के इन विविध रूपों में कविता के प्रति मेरी लगाव कभी कम नहीं हुआ।

यों हर रचना अनुभव की पुनर्रचना का पर्याय मानी जाती है, लेकिन अपने तंई उस संवेदन को पूरी इन्टैसिटी और भाषिक आवेग के साथ व्यक्त करना मैं रचना की अपनी जरूरत मानता हूं। कविता में अक्सर चीजों के साथ हमारे रिश्ते बदल जाते हैं। यह बदला हुआ रिश्ता हमें उनके और करीब ले जाता है। वहां पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं रह जाता और न पहाड़ कोई निर्जीव आकार। शब्द वही अर्थ नहीं देते, जो सामान्यतः उनसे लिया जाता है। अभिव्यक्ति लय में विलीन होती हुई कुछ तरल आकार ग्रहण करने लगती है और कम-से-कम शब्दों का सहारा लेते हुए मन की गहराई में उतरने का प्रयत्न करती है। यही प्रयत्न कविता को दूसी विधाओं से अलग करता है। यह काव्यानुभव जितना व्यंजित होकर असर पैदा करता है, उतना मुखर होकर नहीं। इसलिए अच्छी कविता के लिए यह जरूरी है कि वह अनावष्यक विस्तार के प्रति सतर्क रहे, भाषा के अपव्यय से बचे और इस बात का खयाल रखे कि अभिव्यक्ति में वह तराश और कसावट आखिर तक बनी रहे। रचनात्मकता की इन्हीं खूबियों के कारण कविता को मैं साहित्यिक अभिव्यक्ति का एक बेहतर फॉर्म मानता हूं। रचना के भीतर मूर्त होता जीवन-यथार्थ, उसमें अन्तर्निहित मानवीय सरोकार और उसके लक्षित पाठक-वर्ग से बनता रिश्ता ही यह तय कर पाता है कि कविता उसकी जीवन-प्रक्रिया में कितनी प्रासंगिक और प्रभावी रह गई है।

यहां यह उल्लेख कर देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि इस सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के लिए मेरा मन अपनी मातृभाषा राजस्थानी में अधिक रमता है। यद्यपि अभिव्यक्ति के बतौर हिन्दी और राजस्थानी दोनों मेरे लिए उतनी ही सहज और आत्मीय हैं और दोनों में समानान्तर रचनाकर्म जारी रखते हुए मुझे कभी कोई दुविधा नहीं होती।

अपने साहित्य-कर्म को लेकर जब भी सार्वजनिक रूप से मान-सम्मान का कोई अवसर आता है और वहां अपनी भाषा को लेकर कोई रियायत या अतिरिक्त दया-भाव देखने में आता है, तो मेरा मन उद्वेलित हो उठता है। मुझ जैसे सैकड़ों राजस्थानी लेखक और करोड़ों मूक लोग आजादी के बाद से अब तक इस भाषा की मान्यता के लिए प्रतीक्षारत हैं। मैं बिना किसी भावावेष के अपने मन की यह पीड़ा दोहराना चाहता हूं कि हमारा यह मान-सम्मान तब तक अधूरा है, जब तक इस भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिल जाती।

जिस भाषा में सात सौ वर्षों की समृद्ध साहित्य-परम्परा मौजूद हो, कविता, कथा, उपन्यास, नाटक, आलोचना और गद्य की तमाम विधाओं में पर्याप्त सृजन उपलब्ध हो, हजारों हस्तलिखित पाण्डुलिपियां और प्रकाषित पुस्तकें शोध-संस्थानों और पुस्तकालयों में अंटी पड़ी हों, लोक-कथाओं, लोक-नाट्योें, लोकगीतों और मुहावरों-लोकोक्तियों का अकूत भंडार बिखरा पड़ा हो, जो आजादी से पहले राजपुताना की रियासतों की राजभाषा रही हो, षिक्षा, कारोबार और आम बोलचाल का आधार रही हो, ढाई लाख शब्दों की नौ जिल्दों में फैला जिसका विषाल शब्दकोष अजूबे की तरह सजा हो, जिसका अपना अलग व्याकरण मौजूद हो, उस करोड़ों लोगों की सजीव और समर्थ भाषा को उसका उचित स्थान न मिले, तो उस पीड़ा को वही जान सकता है, जिसे इस वास्तविकता का अहसास हो।

पिछले चार दशकों में अपने साहित्य-कर्म के साथ मैं मीडिया में भी सक्रिय रहा हूं। इधर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार को कुछ लोग कला-साहित्य के लिए एक खतरे की तरह देखने लगे हैं, जबकि देखना उसे एक सकारात्मक चुनौती की तरह ही चाहिये। इस व्यावसायिक मीडिया की अपनी प्राथमिकताएं हैं। अपनी साख और बौद्धिक वर्ग में घुसपैठ के लिए वह साहित्य या कला-रूपों का मनमाना इस्तेमाल बेशक कर लेता हो, लेकिन साहित्य और कला से उसका रिश्ता कतई विश्वसनीय नहीं बन पाया है। यहां तक कि लोक-प्रसारण का दावा रखने वाली माध्यम इकाइयां भी अपने प्रयत्न के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं अर्जित कर पाई हैं।

व्यावसायिक मीडिया को हम जितनी आसानी से जनसंचार की संज्ञा से विभूषित करने लगते हैं, दरअसल वह उसके मूल मकसद के कहीं आस-पास भी नहीं होता। उस जन की भागीदारी वहां नगण्य है, जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है।

लोग अक्सर इस तथ्य को गौण कर जाते हैं कि लोक-भाषा जन-अभिव्यक्ति का आधार होती है। प्रत्येक जन-समुदाय अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में जो भाषा विकसित करता है और वह उसके सर्जनात्मक विकास की सारी संभावनाएं खोलती है। उसकी उपेक्षा करके कोई माध्यम जनता के साथ सार्थक संवाद कायम नहीं कर सकता।

उदारीकरण की प्रक्रिया में इधर बहुत से बाहरी दबाव अनायास ही बाजार में प्रवेश कर गये हैं। बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ऐसा माहौल बना दिया है, जैसे अब सारा मार्केट और सारे उपभोक्ता उन्हीं के इशारों पर चलेंगे, लेकिन सचाई इतनी सीधी और सरल नहीं है। यह व्यवसायीकरण भी जन-आकांक्षाओं की उपेक्षा करके कहीं अपना पांव नहीं टिका पाता। इन कंपनियों को जब अपना उत्पाद आम लोगों तक पहुंचाना होता है, तो वे हिन्दी या कोई भारतीय भाषा ही क्या, उन भाषाओं की सामान्य बोलियों तक जा पहुंचती हैं। यह एक अनिवार्य संघर्ष है, जिसके बीच लोक-भाषाओं को अपनी ऊर्जा बचाकर रखनी है। साहित्य का काम इन्हीं लोगों के मनोबल को बचाये रखना है। यहीं एक लोक-कल्याणकारी राज्य की सार्थक भूमिका का सवाल भी सामने आता है। लोकतंत्र में लोक और तंत्र एक-दूसरे के पूरक होकर ही जिन्दा रह सकते हैं, अन्यथा न लोक चैन से जी पाएगा और न तंत्र ही साबुत रह पाएगा। दरअसल भाषा, साहित्य और संवाद के यही वे उलझे सूत्र हैं, जिन्हें सुलझाकर ही शायद हम किसी नये सार्थक सृजन की कल्पना कर पाएं।

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कहानी

आपसदारी

नंद भारद्वाज

सवेरे जब गाङी दादर स्टेशन पर पहुंची तो वह मेरे डिब्बे के सामने ही खडा था। उतरते ही लपक कर उसने मुझे अपने गले लगा लिया। हंसते-बतियाते बाहर आकर उसकी गाडी में अटैची रखते हुए जब मैंने संस्थान के गैस्ट-हाउस का पता उसे बताया तो वह बनावटी गुस्से से बोल पडा,  ”अब रहने दे ज्‍यादा होशियारी! मुझे पता है, तेरे महकमे वालों ने वी आई पी इंतजाम किया होगा, लेकिन यहां उनकी नहीं चलेगी। बैठ जा चुपचाप गाडी में। आया बडा पता बताने वाला!”  उसका मीठा उलाहना मुझे अच्छा लगा। आगे बढकर उसने गाडी का दरवाजा खोल दिया और मुझे बैठने का इशारा करते हुए खुद दूसरी ओर से गाडी में बैठ गया।

अनुराग और मैं बचपन के दोस्त थे। उसे यह कैसे मंजूर होता कि मैं उसके शहर आऊं और अपने ठहरने का बंदोबस्त कहीं और रक्खूं। यहीं अंधेरी में उसने एक अच्छा-सा मकान ले रखा था। मकान बडा न भी होता तब भी मैं जानता हूं,  हमारे पास एक-दूसरे के लिए स्पेस की कमी कभी नहीं रही। स्कूल के बाद की पढाई बेशक हम दोनों ने अलग रहकर पूरी की हो,  लेकिन सीनियर सेकेण्ड्री तक तो हम साथ ही पढे थे – एक क्लास और एक ही सैक्शन में। जोधपुर में उसके घर के सभी लोगों से मेरा अपनेपन का गंहरा रिश्ता था। अनुराग की बहन प्रिया, जो उससे तीन साल छोटी थी, उन दिनों एक कॉन्वेंट स्कूल में पढती थी। वह मुझे शुरूआत से ही अच्छी लगती थी। मेरी दोस्ती भले अनुराग से रही हो, पर घर में आकर्षण की एक वजह प्रिया भी रही।

कॉलेज में दाखिले के साथ ही मैं अपने पिता के साथ जयपुर आ गया था। मेरी बाकी की पढाई यहीं पूरी हुई। एम ए करने के बाद मैं यहीं रेडियो कार्यक्रम अधिकारी के रूप में काम पर लग गया।  रेडियो एक प्रशिक्षण केन्द्र मुंबई में हुआ करता था। इस बार जब दो सप्‍ताह के प्रशिक्षण के सिलसिले में मेरा मुंबई आने का संयोग बना तो मैंने यों ही अनुराग को सूचित कर दिया। फौरन लौटती डाक से उसका जवाब आया कि मैं सीधे उसके घर ही आकर ठहरूं।

अनुराग के साथ जब मैं गाडी में बैठकर उसके घर पहुंचा तो परिवार के सब लोगों को देखकर अचंभित रह गया। उस बहुमंजिला इमारत में उनका मकान ग्राउंड-फ्लोर पर ही था। घर का दरवाजा प्रिया ने ही खोला था। एक भरी-पूरी युवती लग रही थी वह। मुझसे नजर मिलते ही उसकी आंखों में हल्की-सी चमक और मुस्कुराहट तैर गई, लेकिन शुरू के दो-चार दिन तो वह मुझसे कम ही बोली। घर में बैठक और डायनिंग-रूम के अलावा दो बैड-रूम और एक छोटा गैस्ट-रूम था। फिलहाल गैस्ट-रूम पर प्रिया का कब्जा था और एक बैड-रूम में मां और सोनू सोते थे। मेरे ठहरने का इंतजाम अनुराग ने अपने कमरे में ही दो बैड लगवाकर कर लिया था।

दो-तीन दिनों में ही मैं उस परिवार में फिर से घुलमिल गया और प्रिया की बची-खुची शर्म-शंका अपने आप ही लुप्त हो गई। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि वह अपने बचपन के दिनों को भूली नहीं थी। कई बार उसके साथ मैं पास के बाजार तक घूम-फिर आता था और उसने मुझे मुंबई की जीवन-शैली की कई ऐसी बातें समझाईं, जो मेरी तो कल्पना में भी नहीं थीं – जैसे जवान लङके-लडकियों का साथ अकेले घूमना यहां आम बात सी थी,  जबकि मैं तो उसके साथ बाजार जाते हुए भी संकोच कर रहा था। उसने बताया कि यहां ऐसी कितनी ही औरतें हैं,  जो बिना शादी किये अकेले ही रहना पसंद करती हैं। जिस बिल्डिंग में उनका फ्लैट है,  उसमें दो-एक ऐसे जोडे भी हैं,  जो सालों से पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं,  लेकिन उन्होंने आज तक औपचारिक रूप से शादी नहीं की। यह बात मुझे कुछ अटपटी-सी लगी, जबकि प्रिया का नजरिया साफ था कि यह उनकी मर्जी है,  उसमें किसी और के ऐतराज का क्या मतलब?  घर से बाहर प्रिया का यह उन्मुक्त सोच मेरे लिए वाकई नया था। अनसोचे ही उसके प्रति मेरा आकर्षण और लगाव बढता जा रहा था।

रोज तो मैं शाम को जल्दी घर पहुंच जाता,  लेकिन कभी देरी भी हो जाती। तीसरे दिन शाम को जब देर से घर पहुंचा तो पता चला कि अनुराग को उसी शाम अचानक दिल्ली जाना पड गया था। इस खबर से उत्साह यों ही ठंडा हो गया। दिन भर की माथा-पच्ची और लोकल ट्रेन की यात्रा के कारण थोडी थकान भी थी,  इसलिए मैं कमरे में आकर लेट गया। मुझे झपकी-सी आ गयी। थोडी देर बाद ही दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई तो मेरी आंख खुल गई। दरवाजे पर प्रिया खडी थी। अन्दर आते हुए बोली,  ”क्या हुआ, सो कैसे गये। तबियत तो ठीक है न?”

”हां, मैं ठीक हूं, प्रिया! यों ही दिन भर के काम और लोकल की यात्रा के कारण थोङी थकान हो रही थी।”  मैंने उठकर संभलते हुए जवाब दिया।

”चाय बना दूं थोडी, सुस्ती उड जाएगी!”  उसने हमदर्दी जताते हुए पूछा।

”नहीं नहीं, चाय की इस वक्त जरूरत नहीं है। बस अभी मैं बाहर आता हूं। सोचता हूं, नहा लूं,  उससे थोडी स्फूर्ति आ जाएगी।”  कहकर मैं बिस्तर से उठ खडा हुआ। मुझे नहाने के लिए तैयार होते देख प्रिया वापस लौट गयी।

नहाकर जब कमरे से बाहर आया तो टेबल पर खाना लग चुका था। अनुराग की मां ने अपने साथ मेरा भी खाना लगवा लिया था। मां-बेटी ने खूब चाव से अपनी पसंद की सब्जियां बनाई थीं और पूरी मनुहार करके खाना खिलाया। मां को डर था कि अनुराग के घर से बाहर होने की वजह से मैं कहीं संकोच न करने लगूं।

खाने के बाद प्रिया अपने कंप्यूटर पर काम करने बैठ गई।  उसने सोनू और मुझे भी अपनी मदद के लिए बुला लिया। सवा दस के आस-पास सोनू तो मां के पास जाकर सो गया,  लेकिन मैं ग्यारह बजे तक उसके साथ लगा रहा। प्रिया के अलावा घर में सबको सोया देखकर मैं भी उसके कमरे से बाहर निकल आया और कुछ देर ड्राइंग-रूम में बैठ गया। ड्राइंग-रूम में लगे टी.वी. को ऑन किया ही था कि प्रिया पानी का ग्लास लेकर आ गई। उसने ग्लास मेरी ओर बढाते हुए पूछ लिया,  ”आप कॉफी पीना पसंद करेंगे?”

”हां, पी सकता हूं,  लेकिन आधा ही कप!”  मैंने उसका मन रखने के लिए हामी भर दी, जबकि चाय या कॉफी की मुझे खास तलब नहीं थी। वह रसोई में व्‍यस्‍त हो गई। मैं भी टी.वी. स्क्रीन की ओर देखते हुए रिमोट से चैनल बदलता रहा। एक न्यूज चैनल पर समाचार देखने के लिए कुछ देर रूक गया। एक न्यूज स्टोरी पूरी हुई ही थी कि प्रिया कॉफी लेकर आ गई। एक प्याला मेरी ओर बढाकर अपना प्‍याला हाथ में लिये वह मुझ   से दूर एक सिंगल सोफे पर जाकर बैठ गई।

टी.वी. की आवाज धीमी कर मैंने उससे मांजी के बारे में पूछ लिया। उसने बताया कि वे सोनू के पास सो रही हैं। बातचीत के लिए आवाज धीमी रखने की गरज से मैंने उसे अपने नजदीक आकर बैठने का आग्रह किया। वह हिचकिचाते हुए अपनी जगह से उठकर मेरे करीब लगे दूसरे सिंगल सोफे पर आकर बैठ गई। उसके साथ घर में अकेले इस तरह बात करने का यह पहला ही अवसर था और मन में कहीं यह आशंका भी कि कहीं वह मेरी किसी बात का बुरा न मान जाए। आखिर अपने मन पर नियंत्रण रखते हुए मैंने उसे यह बात बता ही दी कि मैं उससे कितना गहरा लगाव रखता हूं! मेरी बात सुनकर एक-बारगी तो वह मेरी ओर देखती ही रह गई। फिर हल्‍के से मुस्कुराती हुई अपने आप में खो गई। मुझे यह देखकर तसल्ली हुई कि उसने मेरी बात का बुरा नहीं माना,  बल्कि एक तरह से अनुकूल रूख ही जाहिर किया।

डायनिंग हॉल और ड्राइंग रूम के बीच की खुली जगह को जाली का पर्दा लगाकर अलग कर दिया गया था। पर्दे से छनकर आती रोशनी से ड्राइंग-रूम में अच्‍छा उजास था,  इसलिए वहां की बत्ती जलाने की जरूरत नहीं पडी। टी.वी. स्क्रीन का प्रकाश भी कमरे को अच्छा-खासा रौशन किये हुए था। उस हल्के उजास में मैं प्रिया की आंखों में अपने लिए तैरता एक अमूर्त लगाव महसूस करने लगा था। ऐसे ही कोमल क्षणों में अपने मन की इच्छा से प्रेरित होकर जब पहली बार मैंने उसकी ओर अपना हाथ बढाया तो उसने सहमते हुए अपना हाथ मेरी हथेली पर रख दिया। कच्चे नेह में डूबी हमारी ऊष्मा को अब किसी और भाषा की जरत नहीं रह गयी थी। मैंने एक कदम बढाते हुए उसके हाथ को अपने नजदीक लाते हुए ज्यों ही होठों से छूने का प्रयास किया,  उसने हल्के-से अपना हाथ वापस खींच लिया। गजब का आत्म-संयम था उसमें। बहुत नपे-तुले शब्दों में उसने मुझे यह समझा दिया कि इस तरह मां और भैया का विश्वास तोडना उचित बात नहीं होगी। मैंने उसे भरोसा दिलाया कि मैं इसका पूरा खयाल रखूंगा।

इस पहले इजहार के बाद आपस में हल्का अरस-परस तो चलता रहा, लेकिन आवेग में कोई कदम बढाने की नौबत कभी नहीं आई। अनुराग के वापस आने से एक रात पहले प्रिया ने मुझे यह बात कहकर और असमंजस में डाल दिया कि मैं अभी अनुराग या मां से अपने रिश्ते को लेकर कोई बात न करूं। पहले वह खुद अपने घर में बात करके उनका मन जानेगी। उनका अनुकूल रूख होने पर ही मेरा अनुराग और अपने घरवालों से बात करना ज्यादा बेहतर होगा।

प्रिया ने अपनी बातचीत के दौरान एक अप्रत्याशित जानकारी यह भी दी कि उसके जोधपुर वाले ताऊजी कुछ महीने पहले उसके लिए बीकानेर का एक रिश्ता लेकर आए थे। उसकी मां तो उस रिश्ते के लिए तैयार हो गई और बात तकरीबन पक्की ही थी, लेकिन अनुराग को जब यह जानकारी मिली कि उस लडके की यह दूसरी शादी है और उसकी पहली पत्नी ने आत्मघात किया था, तो उसने वह रिश्ता उसी वक्त छुडवा दिया। बाद में ताऊजी खुद यहां सफाई देने आए थे कि वह लडकी खुद पहले से ही किसी दूसरे के साथ जाना चाहती थी और उसके घरवालों ने धोखे से इस लडके के गले बांध दी। शायद इसी कारण उसने आत्मघात कर लिया। पुलिस ने भी इस बात को मान लिया है। इसमें उस बिचारे का क्या कसूर, वह तो बहुत सीधा-सादा है, लेकिन अनुराग ने उनकी कोई बात नहीं मानी। उसका एक ही तर्क था कि ये सारी बातें रिश्ता तय करने से पहले साफ होनी जरूरी थीं। इस विवाद के कारण परिवार में कई दिन तनाव रहा और इसी वजह से उसे घर में फिलहाल अपने रिश्ते की बात करने का उपयुक्त माहौल कम दिखाई देता है।

तीसरे दिन अनुराग दिल्ली से लौट आया था। घर में सब कुछ सामान्य ढंग से चलता रहा। प्रिया, अनुराग और अपनी मां के सामने मुझसे बहुत औपचारिक व्यवहार करती थी,  जैसे हमारे बीच कोई खास रिश्ता ही न हो। मैं खुद भी अपनी मर्यादा में बंध गया था। वैसे मैं एक सम्मोहित प्रेमी की तरह उसके इशारों पर जहां वह चलने को  कहती, चलता रहता।  एक छुट्‌टी वाले दिन तो वह मुझे सवेरे से शाम तक मुंबई दर्शन के बहाने गेटवे ऑफ इंडिया,  म्यूजियम,  जहांगीर आर्ट गैलेरी,  मालाबार हिल्स,  मरीन ड्राइव,  नेहरू भवन और गोरेगांव फिल्म सिटी की रमणीक जगहों पर सारे दिन घुमाती रही और मैं खुशी-खुशी उसके साथ घूमता रहा। मैं उसे वर्ली किनारे अपने मीडिया इंस्टीट्यूट भी ले गया,  जिसके अन्दर की गतिविधियों को वह चाव से देखती रही।

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दिन भर के मुंबई-दर्शन के बाद उस शाम जब हम जुहू के समंदर किनारे पहुंचे तो प्रिया पानी में उतरने के लिए मेरा हाथ खींचने लगी, जबकि मेरा तो समंदर के नाम से ही जी कांपता है। न मुझे तैरना आता है और न चढ.ती-उतरती लहरों के बीच पांव टिकाकर कमर तक पानी में खडे रह पाना। फिर भीगे हुए कपडों में वापस घर लौटना तो और भी अटपटा लगता। मैंने साफ मना कर दिया कि यह मेरे बस का नहीं है। आखिर उसके बहुत आग्रह करने पर अपनी पतलून की मोरी को उलटकर मैं किनारे-किनारे उसके साथ चहलकदमी के लिए जरूर राजी हो गया था। हम देर तक टखनों को भिगोती लहरों की आवाजाही के बीच दूर तक चलते गये और दूर किनारे की रेत से बने एक ऊंचे टीले पर जाकर बैठ गये। वहां चुपचाप बैठे लहरों का आना-जाना देखते रहे। यों इस समंदर किनारे मैं पहले भी कई बार आया हूं, लेकिन प्रिया के साथ आज समंदर मुझे कुछ अलग ही रंग में दिखाई दिया। उसकी लहरों का शोर मेरे मन में लगातार बढता जा रहा था और मैं चाहता था कि इस शोर के पार किसी नतीजे तक पहुंचूं। आखिर प्रिया से पूछ ही लिया,  ”तो फिर क्या फैसला किया तुमने,  प्रिया?”

”फैसला मेरे हाथ में कहां है, निखिल! मैं तो खुद उस समय का इंतजार कर रही हूं, जहां कुछ कहने-करने की सूरत बनती दीखे। भैया और मां को तो मनाना आसान है,  लेकिन चाचा-ताऊ और परिवार के बाकी लोगों का यही कहना है कि रिश्ता उन्हीं की जात-बिरादरी के दायरे में हो। खासकर मां इस बात को लेकर थोङी दुविधा में है।”

”फिर हमारे इस रिश्‍ते का क्या होगा?”

”हम कोशिश कर रहे हैं,  यों अधीर होने से कैसे काम चलेगा? तुम पुरूष हो, तुम्हारे लिए चटपट फैसला कर लेना आसान हो शायद,  लेकिन हम लडकियों को बहुत आगा-पीछा देखना होता है।”

”ठीक है! तीन दिन बाद मुझे वापस लौट जाना है। अगर इन तीन दिनों में कोई फैसला नहीं हो पाया तो देख लेना, अपहरण करके ले जाऊंगा।”  मैंने हंसी में बात को समेटने की कोशिश की।

”घुटनों तक पानी में उतरने की तो हिम्मत दिखा नहीं पाते और मेरा अपहरण करोगे ? चलिये, यह कोशिश भी कर देखिये। कहीं तो आपको साहस दिखाने का मौका मिले!”  इस व्यंगात्मक टिप्पणी के साथ वह हंसते हुए उठ खडी हुई,  लेकिन उसकी बात में छिपी चुनौती से मैं सतर्क जरूर हो गया। मैं अकेला ही उस स्थान से उठकर लहरों की ओर बढ  गया था और उसे उकसाते हुए बोल उठा,  ”अच्छा, तो रानी साहिबा को हमारे साहस में ही संदेह है?… चलिये, बढिये इस दरिया की ओर। …देखें कौन कितनी दूर साथ देता है?”

”फिलहाल तो मुझे अंधेरी ईस्ट जाना है। …इस दरिया में उतरने का साहस फिर कभी देख लेंगे। आइये, बाहर टैक्सीवाला इंतजार कर रहा होगा।”  प्रिया ने वहीं खडे-खडे उत्तर दिया और विपरीत दिशा की ओर चल दी। मैं भी उसकी ओर बढ कर साथ हो लिया। आज दिनभर के भ्रमण से वह काफी खुश नजर आ रही थी। चलते हुए हम दो-तीन मिनट में अपनी टैक्सी के करीब पहुंच गये थे। मैंने प्रिया को टैक्सी का गेट खोलकर अन्दर बैठने की मनुहार करते हुए कहा,  ”आइये, फिलहाल तो आपका साथ देना ही बेहतर है। …अगले अभियान पर फिर कभी!”

”मेरी खुशनसीबी!”  मुस्कुराते हुए वह टैक्सी में सवार हो गई। मेरे अन्दर बैठकर गेट बंद करते ही टैक्सी वापस चल पडी थी।

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मुंबई दर्शन के तीसरे दिन मेरी वापस रवानगी थी। यह उससे पहले दिन की बात है। अमूमन मैं और अनुराग सवेरे घर से साथ ही निकला करते थे। वह वर्ली में मुझे  अपने इंस्टीट्यूट छोङ देता, लेकिन आज अनुराग को थोडा जल्दी निकलना था और मुझे  थोडी देर के लिए कुछ जरूरी कागजात लेने जाना था,  इसलिए दसेक बजे तक रवानगी के हिसाब से मैं आराम से तैयार हो रहा था। प्रिया को भी नौ बजे तक कॉलेज के लिए निकलना था। वह अपने समय से निकल गई।

आधे घंटे बाद मैं घर से निकल पडा। घर के पास वाले बस-स्टैंड के शेड के नीचे खडा बस का इंतजार कर ही रहा था कि इतने में एक छोटा लडका जाने कहां से निकलकर मेरे पास आया और एक बंद लिफाफा यह कहते हुए मेरे हाथ में पकडा गया कि अभी प्रिया मैडम आपके लिए देकर गई हैं। मैं लिफाफा हाथ में लिये उलट-पलट कर देखने लगा। कुछ पूछने के लिए नजर वापस घुमाई,  लेकिन लडका उससे पहले ही जा चुका था। एकाध मिनट तो मैं लिफाफे की ओर देखता रहा, जिस पर अंग्रेजी में सिर्फ तीन शब्द लिखे हुए थे – ‘जस्ट फॉर यू…’। मैं लिफाफा खोलने वाला ही था,  इतने में स्टेशन की ओर जानेवाली बस आती दिख गई। मैंने लिफाफा कमीज की जेब में रख लिया और बस में सवार हो गया। बस सवारियों से भरी हुई थी। अंधेरी स्टेशन पास ही था,  इसलिए यही सोचकर लिफाफा जेब में पडा रहने दिया कि ऑफिस जाकर आराम से पढ  लूंगा – यदि प्रिया ने घर में बात होते रहने के बावजूद यह पत्र भिजवाया है, तो कोई जरूरी बात ही होगी।

इंस्टीट्यूट पहुंचकर मैं सीधा गैस्ट-रूम में सोफे पर बैठ गया और जेब से लिफाफा निकाल लिया। खोलने पर भीतर एक तह किया हुआ पत्र दिखाई दिया,  कोई पौन पेज लिखा हुआ और पूरे मजमून के आखिर में लिखा था – ‘आपका एक शुभचिन्तक’। मुझे  आश्चर्य हुआ कि यह पत्र प्रिया की बजाय किसी शुभचिन्तक ने भिजवाया था – मेरा ऐसा शुभचिन्तक यहां कौन आ गया और यह क्या चाहता है?

मैंने आस-पास देखकर सावधानी से पत्र पढ.ना शुरू किया – ”प्रिय बंधु, आपको मेरा यह पत्र थोडा अटपटा और अप्रत्याशित तो लगेगा, सहज रूप से विश्वास कर पाना भी आसान नहीं होगा – यह भी सोचेंगे कि मैं कौन होता हूं आपको इस तरह लिखनेवाला? आपकी ये सब शंकाएं सही होंगी, पर मेरा मानना है कि ये सब जानना आपके लिए ज्यादा जरी नहीं है, आप तो वह जान लें, जिसे जानना आपके लिए बेहद जरूरी है और वह आपको मेरे अलावा कोई नहीं बताएगा।

आप अभी जिस बालिका के प्रेम-पाश में बंधे हैं, उसके अतीत और अन्दरूनी इरादों से लगता है आप परिचित नहीं हैं,  और होंगे भी कैसे?  वह स्वयं तो आपको बताएगी नहीं और न ही उसके घरवाले। बालिका देखने में सुन्दर है,  होशियार है, मुंबई की कल्चर में पूरी तरह रसी-बसी, किसी भी युवक को आकर्षित कर लेने वाले सारे गुण और लक्षण हैं उसके पास। बस एक ही अतिरिक्त खूबी है जो इन सारे गुणों पर भारी पडती है और वह है उसके चित्त की चंचलता। वह किसी एक की होकर नहीं रह सकती। आप शायद तीसरे या चौथे क्रम पर आए हैं और मेरा मानना है कि आप भी अन्तिम नहीं होंगे – पहला भुक्तभोगी मैं स्वयं हूं और मेरे बाकायदा उसके प्रेमजाल में बने रहते हुए ही उसे दूसरे को सौंप देने की तैयारियां होने लगीं और ये बाला टुकुर-टुकुर देखती रही,  मैंने ऐतराज किया तो मुझ पर ही उल्टे-सीधे आरोप लगाने लगी।  आप भी याद करें… आपको इस बाला ने पहली बार किस तरह लुभाया होगा और फिर क्या-क्या लुभावने सपने दिखाए होंगे… आप तो भले घर के दिखते हैं,  तुरन्त शादी के लिए मन भी बना लिया होगा, लेकिन उसका मन बनना इतना आसान नहीं है… इन दिनों कई बार आपको इसके साथ देखा है,  कल जुहू पर आप दोनों को साथ देखा, तो जान गया कि इसने आपको भी पूरी तरह फांस लिया है। एक इनसानी रिश्ते के नाते मैंने बहुत कडा मन बनाकर आपको यह हकीकत बयान की है… मैं उसका पहला प्रेमी रहा हूं… उसका इतना बुरा भी नहीं चाहता… लेकिन आपकी सज्जनता को देखकर थोडी चिन्ता अवश्य हुई। आपके दोस्त अपनी बहन की हकीकत को बहुत कम जानते हैं, वे आपको मुंबई में बनाए

रखने के लिए शायद आपकी हर संभव मदद करना चाहेंगे, अब यह आप पर है कि आप मुंबई में इस बला की गिरफ्त में रहना पसंद करेंगे या इससे जल्दी छूट जाना… यकीन मानिये मेरा इसमें कोई निजी स्वार्थ नहीं है, लेकिन आपको आगाह करके बचा लूं तो समझूंगा एक पुण्य का काम हो गया। आगे जैसा आप उचित समझें।… आपका एक शुभचिन्तक!”

पत्र पढ.कर एकबारगी तो मेरा सिर चकरा गया। गैस्ट-रूम की दीवारों पर सजी तस्वीरें मुझे घूमती-सी नजर आईं। कौन हो सकता है ऐसा लिखनेवाला?  जो भी है, प्रिया और उसके घरवालों को और खुद मुझे अच्छी तरह जानता है,  लेकिन प्रिया ने तो ऐसे किसी व्‍यक्ति का कभी जिक्र नहीं किया….! मैं बात करना चाहूं तो किससे करूं ? कल मुझे यहां से जाना भी है,  यदि सामान पास में होता तो आज ही निकल जाता, लेकिन सामान के लिए तो एक बार अंधेरी जाना ही होगा।

पत्र पढने के बाद घंटे भर तक मेरे भीतर सन्नाटा-सा बजता रहा। ट्रेनिंग पूरी हो जाने के बाद सर्टिफिकेट और कुछ रिपोर्ट्‌स लेनी थीं,  जो मैंने याद करके ले लीं। दो घंटों में अपना सारा काम निपटाकर सवा दो बजे तक मैं संस्थान से बाहर आ गया था। अंधेरी के लिए वहीं से एक टैक्सी लेकर अपरान्ह तीन बजे तक घर लौट आया। टैक्सी को वहीं रुकने के लिए कहकर घर के दरवाजे की घंटी बजा दी। दरवाजा प्रिया की मां ने ही खोला था। प्रिया के बारे में पूछने पर बताया कि वह अभी कॉलेज से आई नहीं है। अनुराग तो वैसे भी सात-आठ से पहले कम ही आ पाता था। मैंने मां को बता दिया कि मुझे कुछ जरूरी काम से अभी चर्चगेट लौटना होगा। रात को देरी हो सकती है,  कल दोपहर बाद वहीं से गाडी पकडनी है,  इसलिए मुझे अभी जाना पडेगा। रात्रि विश्राम मैं वहीं संस्थान के गैस्ट-हाउस में कर लूंगा। यह कहकर मैं अपना सामान पैक करने कमरे में चला आया।

कमरे में इधर-उधर बिखरा अपना सामान बटोरकर अटैची में जमा ही रहा था कि मुझे दरवाजे पर खडी प्रिया दीख गई। एक उडती-सी नजर से मैंने उसकी ओर देखा और अपने काम में लगा रहा। उसने मेरे करीब आकर पूछा,  ”मैं पूछ सकती हूं कि ये क्या हो रहा है?”

”क्यों,  आपको नहीं दिख रहा?  मैं सदा के लिए तो यहां आया नहीं था, अब वापस जाने का वक्‍त आ गया है, तो जाना ही पङेगा!”  मैंने रूखा-सा उत्तर दे दिया और अपना सामान समेटता रहा।

वह एक झटके से आगे बढी और मैं कुछ समझूं उससे पहले ही आधी जमी अटैची उसने बिस्तर पर उलट दी। मैं नाराज होता हुआ बोल पडा,  ”ये क्या तरीका हुआ?”

”जब किसी बात का सीधा उत्तर नहीं मिलता तो मुझे यही तरीका ठीक लगता है!” वह शरारत से हंसने लगी।

”मैं अभी जिरह करने के मूड में बिल्कुल नहीं हूं और आपसे तो मुझे कोई बात ही नहीं करनी!”

”क्यों जनाब,  जान सकती हूं बांदी से ऐसा क्या गुनाह हो गया?  हुजूर की तबियत तो ठीक है न, या बाहर किसी से झगडा करके आए हैं!”  उसने फिर बात को हंसी के दायरे में ही रखते हुए पूछ लिया।

”गुनाह तो मुझसे हो गया प्रिया कि मैंने किसी को बिना जाने-समझे इतना बडा रिश्ता जोडने का सोच लिया! बताओ, क्या प्रायश्चित है इसका …?”

”खुलासा बात करो निखिल बाबू! मुझसे पहेलियां मत बूझो। अपनी इस छोटी-सी  जिन्दगी में पहले ही कुछ धोखे खाये बैठी हूं और बडी मुश्किल से उनसे बाहर आई हूं… अब सहज ही किसी पर विश्वास करना मेरे बूते की बात रही भी नहीं… आप मेरे बचपन के साथी हैं और जाने क्यों आप पर मुझे शुरू से ही धीरज रहा है… अगर मुझसे कोई अनजाने में भूल हुई हो तो आपका हक बनता है कि आप बेशक मुझे उलाहना दें, लेकिन इस तरह टेढी बातें न करें…” उसने संजीदगी से अपनी बात कही।

मैंने बिना कुछ बोले जेब से वह कागज निकालकर प्रिया की ओर बढा दिया और दुबारा अटैची सीधी कर सामान जमाने बैठ गया। तीन-चार मिनट बाद वापस उसकी ओर नजर घुमाई तो वह कागज नीचा किये और आंखों में आंसू लिये खडी थी…।

”क्यों भई, सिक्के का दूसरा पहलू सामने आया तो उसका निपटारा आंसुओं को थमा दिया… यह तो कोई बात नहीं हुई…” मैंने उसी वीतरागी भाव से अपनी बात कह दी।

”ये आंसू तो मेरे दुर्भाग्य के हैं, निखिल! मुझे आज तक कोई माई का लाल ऐसा दीखा नहीं, जो सिक्के के दोनों पहलू सही-सही एक ही नजर में सामने रख दे! उन दूसरे लोगों की तरह आपने भी एक पहलू को देखकर पूरे सच की तसल्ली कर ली… अगर यही आपकी समझ है तो आप जाएं भले ही… मैं तसल्ली कर लूंगी कि मैंने आपको समझने में भूल कर दी…”

”वह बात छोडो, लोगों की साथ रहते उम्र बीत जाती है और एक-दूसरे को समझना फिर बाकी रह जाता है… आप अपने मुंह से बता दो कि सच क्या है…”  मैंने बात को संवारने की कोशिश की। यह भी लगा कि प्रिया के कहने में कुछ सार की बात जरूर है… वाकई सच का कोई ऐसा पहलू छुपा रह गया है, जिससे मैं पूरी तरह वाकिफ नहीं हूं।

”लगता है, आपके पास समय कम है… आप तो वापस जाने के लिए टैक्सी भी साथ लेकर आये हैं न… मैं भी आपका ज्यादा समय नहीं लूंगी… आप तो कम में इतना ही जान लें कि लिखनेवाला अगर इतना ही सत्यवादी है तो यों छुपकर क्यों वार करता है… मैं तो अकेली लडकी हूं और आप एक बाहरी आदमी… फिर किस बात का डर है उसे… आपको यह पत्र वह हाथों-हाथ तो नहीं दे गया होगा… अगर कुछ माद्दा और दम है तो सामने आकर बात करे न,  ताकि खुद के कारनामे भी सामने आएं!”  इतनी बात कहकर वह एकबारगी रुक गई। मुझे लगा कि उसकी बात अभी पूरी नहीं हुई है। हाथ वाला कागज मुझे वापस लौटाते हुए वह कडुवाहट के साथ आगे बोली,  ”कमीना, अध्यापन के पवित्र काम पर कालिख पोतता है और दूसरों को नसीहत देता फिरता है… साहित्य और कला के नाम पर भोली-भाली लडकियों को अपने चंगुल में फांसता है और चाहता है कि उसके कारनामों की मैं अनदेखी कर दूं… अबकी बार कभी सामने पड गया तो भरे बाजार में लत्ते उतरवाकर छोडूंगी… बदजात ने मेरे डर से कॉलेज ही बदल लिया… लेकिन आप तो जाएं निखिल बाबू, आप से किस बात की नाराजगी, …आपके संस्कार  अच्छे हैं… मुझे  खुद इस बात का अफसोस है कि कभी-कभी मेरा अति-विश्वास और इच्छाएं खुद मुझे ही कुसूरवार ठहरा देती हैं…”  बोलते-बोलते रोष से उसका गला भर आया था और वह चुप हो गई। अपने दुपट्‌टे से आंखें पौंछती वह एकाएक पीछे घूमी और मैं कुछ कहूं, उससे पहले ही कमरे से बाहर निकल गई। मैं अचकचाया-सा कुछ पल अपनी जगह खडा रहा, फिर कमरे से बाहर आया और बाहर खडी टैक्सी का किराया चुकाकर वापस अन्दर आ गया।

सीधा कमरे की ओर जाने की बजाय मैं डायनिंग टेबल के पास रखी कुर्सी पर बैठ गया। प्रिया की मां लिविंग-रूम के कोने में रखे फ्रिज में कोई सामान ठीक कर रही थी। उनकी पीठ मेरी ओर थी। मैंने सहज रहते हुए उनसे कहा, ”मांजी! क्या थोडी चाय मिल जाएगी…?”

”हां हां, अभी बनाकर लाती हूं बेटा!”  उन्होंने मुडते हुए मुस्कुराकर मेरी बात का उत्तर दिया और रसोई की ओर बढ गई। आधे मिनट बाद उल्टे पांव लौटती हुई बोलीं, ”चाय तो प्रिया ने पहले ही चढा रक्खी है।”  वह मेरे पास ही खाली कुर्सी पर बैठ गई। मुझे लगा कि उन्होंने प्रिया और मेरे बीच हुआ संवाद जरूर सुन लिया होगा,  इसीलिए शायद वे इतनी देर से चुप हैं। मैं कुछ संकोच-सा अनुभव करने लगा था। मुझे चिन्ता और संकोच में बैठा देखकर वे धीरे-से इतना ही बोली,  ”निखिल, तू मेरे लिए अनुराग जैसा ही बेटा है,  प्रिया बहुत इमोशनल लडकी है,  …उसकी किसी बात का बुरा मत मानना, …हो सके तो उसका मन रखना! बस मुझे यही बात कहनी है।”  वह इतना-सा बोलकर चुप हो गई। मैं मां से कुछ बात शुरू करता,  उससे पहले ही प्रिया चाय के तीन कप ट्रे में लेकर बाहर आ गई और बिना कुछ बोले ट्रे टेबल पर रख दी। उसके चेहरे पर उदासी थी। मुझ से बिना नजर मिलाए,  उसने एक कप उठाया और वापस अपने कमरे में चली गई।

चाय पीकर मैं उसी ऊहापोह मनःस्थिति में वापस कमरे में लौट आया। मैंने पत्र के बारे में प्रिया की प्रतिक्रिया पर गौर किया तो मुझे उसकी बातों में सच्चाई साफ नजर आने लगी। यह जरूर कोई लंपट व्यक्ति है,  जो प्रिया को परेशान करता रहा है। मुझे  प्रिया से और जानकारी लेकर उसका पता करना चाहिये और अनुराग को साथ लेकर उसे सबक सिखाना चाहिये। भले ही उसके लिए दो-चार दिन और रुक जाना पडे तो कोई बात नहीं। मैं पलंग पर बैठा यह सोच ही रहा था,  तभी बाहर मांजी की आवाज सुनाई दी। वे प्रिया से घंटे भर बाहर जाकर बाजार से कुछ सामान और सब्जी लेकर आने का कह रही थी। प्रिया उनके साथ जाने की जिद कर रही थीं,  लेकिन वे उसे घर पर ही रहने की हिदायत देकर मुख्य दरवाजे से बाहर निकल गई थी। घडी में सवा पांच बजे थे। मैं भी कमरे से निकलकर ड्राइंग-रूम में आकर बैठ गया था और टी.वी. ऑन कर लिया था। दो-तीन मिनट बाद जब प्रिया मेरे पास आकर खडी हो गई, तो मुझे खुद ग्लानि-सी महसूस होने लगी कि मैं भी कैसे-कैसे बहकावों में आ जाता हूं। उस प्रसंग को लेकर अब मेरे मन में कोई शंका बाकी नहीं रह गई थी।

प्रिया को अपने पास खडा देखकर मैंने टी.वी. की आवाज बंद कर दी और उसे अपने पास बैठने का आग्रह किया। वह सोफे के दूसरे सिरे पर बैठ गई। उसे सहज बनाने के लिए जब मैंने मां के बाजार से लौट आने के बाद समंदर किनारे या पास के किसी रेस्तरां चलने का सुझाव दिया तो वह गंभीर हो गई। बोली,  ”निखिल, मैं अपनी वजह से आपको किसी दुविधा में नहीं डालना चाहती। मुझे खुशी है कि आप मुझसे इतना लगाव रखते हैं। इस बार आपसे मिलकर जीवन में मेरी दिलचस्पी बढी है, लेकिन अब फिर चीजें धुंधली नजर आने लगी हैं। यकीन मानिये, मैं आपको कोई सफाई नहीं देना चाहती। आप खुद अपने विवेक से फैसला करें। कोई शंका हो तो पहले उसे दूर कर लें,  खुद अपने तरीके से जांच करें और सही नतीजे पर पहुंचें।”  अपनी बात पूरी कर वह चुप हो गई।

मैंने उसे आश्वस्त करते हुए फिर कहा, ”मैं तो यही कहने बैठा हूं कि इस अवांतर प्रसंग को यहां घर तक ले आने की उतावली के लिए तुम मुझे माफ कर दो! मुझे तो खुद पर गुस्सा आ रहा है कि ऐसी हल्की बात मैं घर तक लाया ही क्यों? अब तुमसे गुजारिश है कि तुम इस बात को यहीं खत्म कर दो। दूसरी अर्ज ये है कि तुम दो दिन पहले मुझे समंदर किनारे ले गई थी,  आज मेरी इच्छा है कि हम फिर वहीं चलें या किसी अच्छे रेस्तरां में,  और उस दिन के अधूरे संवाद को एक मुकम्मिल फैसले में बदलकर वापस लौटें।”

मेरी बात सुनकर प्रिया के चेहरे पर एक सहज मुस्कान उभर आई। उसके भीतर का तनाव भी कम हो गया था। मेरी आंखों में देखते हुए उसने इतना ही कहा,  ”इसके लिए हमें कहीं और जाने की जरत नहीं है, निखिल! फैसला भी किसी और को नहीं लेना है। बस, अपने भीतर की उलझन को थोङा साफ करना है। पिछले दो दिनों से मैं यही सोचती रही हूं कि तुम्हारे लौटने से पहले हम खुद किसी नतीजे पर पहुंच जाएं, तो बेहतर है।!”

”तो बताओ न! मेरी तरफ से और क्या तसल्ली चाहिए तुम्हें? तुम कहो तो कोई एफेडेबिट तैयार करवा लूं, तुम कोई शर्तनामा तैयार करना चाहो तो मैं उसके लिए पहले ही कोरे कागज पर अपने साइन करके तुम्हें सौंप दूं । ”

”ओ हो…, अभी तो बहुत उदार बन रहे हो,  लेकिन शर्तनामा सामने आने पर यह मत कहना कि इसकी तो तुमने कल्पना ही नहीं की थी।”

”फिर तो प्रिया, तुम एक कागज ले ही आओ, ये शुभ-कार्य मैं अभी सम्पन्न किये देता हूं, ताकि आगे का रास्ता साफ हो।”  बातचीत जिस तरह आगे बढ. रही थी,  उससे मैं काफी उत्साहित महसूस करने लगा था।

”सवाल किसी शर्तनामे का नहीं है, निखिल!”  प्रिया का स्वर एकाएक संजीदा हो गया था। अपने को थोडा और संयत करते हुए वह कहने लगी,  ”कुछ बातें हैं, जो मैं आपको बताना जरूरी समझती हूं,  ताकि कोई गलतफहमी न रहे। …पहले यह बताएं कि क्या आपको इस बात की जानकारी है कि आपके और भैया के कॉलेज ज्वाइन करने के दिनों में हमारे घर में क्या-कुछ घटित हो गया था?”  उसने बिना कोई भूमिका बांधे एक सीधा सवाल किया।

”नहीं, मुझे तो किसी ने कोई जानकारी दी ही नहीं। शुरू में तो मैं खुद पढाई में इतना डूबा रहा कि किसी के बारे में खबर लेने की फुरसत ही नहीं रही। आपके पिताजी के निधन का समाचार जरूर मुझे अपने दोस्तों के जरिए मिल गया था और उस वक्त मैं आना भी चाहता था,  लेकिन किन्ही कारणों से देरी हो गई। मैंने अनुराग को पत्र लिखकर अपना दुःख भी प्रकट किया और आठ-नौ महीने बाद जब मिलने के लिए जोधपुर पहुंचा तो पता चला कि आप लोग मुंबई शिफ्ट हो गये हो। बाद में कभी-कभार अनुराग का खत आ जाता,  लेकिन घर-परिवार के बारे में वह कोई समाचार लिखता ही नहीं था। लेकिन तुम बताओ,  उसमें ऐसी क्या खास बात है,  जो मेरी जानकारी में होनी चाहिए थी और नहीं है ?”

”क्या तुम्हें बाद में भैया ने या किसी और ने कभी कुछ नहीं बताया।”

”और तो कोई क्या बताता?  अनुराग को मैंने ही पत्र लिखकर हालचाल पूछे थे और उसकी ओर से पत्र न आने के बारे में शिकायत भी की थी,  जिसके जवाब में उसने लिखा कि घर में कुछ परेशानियों की वजह से वह मुझे खत नहीं लिख पाया,  लेकिन किन्ही खास परेशानियों का जिक्र उसने नहीं किया। मैंने भी इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। यही सोचकर रह गया कि घर-परिवार में छोटी-मोटी परेशानियां तो होती रहती हैं, अगर कुछ बताने लायक होगा, तो वह लिख देगा। यों खुद मुझे इस बात का अहसास था कि बाबूजी के न रहने पर घर में कितनी परेशानियां पैदा हो गई होंगी। परिवार में वे अकेले कमाने वाले व्यक्ति थे। अकेली उनकी पेंशन से तो क्या गुजारा चलता? अच्छी बात यही रही कि अनुराग को जल्दी ही जॉब मिल गई और आप सब मुंबई आ गए। तुम्हारे बारे में जानने की इच्छा बराबर बनी रही,  लेकिन यही संकोच रहा कि कहीं अनुराग को बुरा न लगे। मैं तो यही समझे बैठा था कि तुम्हारी कहीं शादी हो गई होगी और अब तक तो तुम अपनी ससुराल में रस-बस गई होगी। इतने बरसों बाद जब तुम्हें अपने सामने देखा तो कितना आश्चर्य हुआ। सच पूछो तो, मुझे इतनी खुशी हुई कि क्या बताऊं! और जब यह जाना कि तुम मीडिया में अपना कैरियर बनाने में रुचि रखती हो तो मेरे लिए तो वैसे ही अतिरिक्त आकर्षण का कारण बन गई।”  यह बात कहते हुए मेरी अपनी खुशी अनायास ही जुबान पर आ गई थी।

शायद उसे भी मेरी बात अच्छी लगी, लेकिन अपने को संयत रखते हए उसने इतना ही कहा,  ”पिताजी के न रहने से जो परेशानियां बढी, वे तो खैर अपनी जगह थीं ही,  लेकिन कुछ अनचाही परेशानियां और भी पैदा हो गईं, जो किसी के बस की बात नहीं थीं। मेरी तो एक तरह से पारिवारिक रिश्तों में दिलचस्पी ही खत्म हो गई थी,  लेकिन भैया ने वाकई बहुत कष्ट देखे हैं और आज भी वही हैं, जो मुझे हर परेशानी से बचाकर रखते हैं।”

”मैं समझा नहीं, …तुम किस परेशानी की बात कर रही हो?  क्या हुआ था, तुम्हारे साथ?”

”हुआ तो नहीं। बस, होने जा ही रहा था… लेकिन बच गये! मतलब, मैं किसी और की होने से बच गई,  लेकिन वह लङका तो जिन्दगी से ही महरूम रह गया… इसका वाकई मुझे अफसोस है।”  उसने एक गोल-मोल-सी पहेली बयान कर मेरी उत्सुकता को और बढा दिया था।

”क्या….? क्या बात कर रही हो तुम?  मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया।”  मैं आश्चर्य से उसकी ओर देखे जा रहा था।

”यही हकीकत बताने की तो कोशिश कर रही हूं आपको। पिताजी के स्वर्गवास के बाद मां को हरवक्त मेरे सगाई-ब्याह की चिन्ता लगी रहती थी। मैं तो छोटी थी,  खुद अपने बारे में क्या राय देती,  और वैसे भी अपने परिवारों में लडकी की राय को कौन महत्व देता है? उन्हें तो सिर्फ मां-बाप के कहने के मुताबिक बरताव करना होता है। मुझे हरवक्त यही डर बना रहता कि कहीं गलत जगह पर न फंस जाऊं। उन्हीं दिनों मेरे मामाजी जोधपुर के एक फौजी परिवार के संपर्क में आए और उन्होंने लडके के पिता से मेरे रिश्ते की बात कर ली। मां और भैया को भी वह रिश्ता पसंद आ गया। मैं उस वक्त जोधपुर में बी. ए. सैकिंड ईयर की परीक्षा की तैयारी कर रही थी। मेरी इस रिश्ते में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी,  लेकिन लडकी की बेरुखी की कौन परवाह करता है?  लडका आर्मी में कमीशंड अफसर था। सगाई के वक्त जब पहली बार उससे मिलना हुआ तो घर में सभी को पसंद आ गया। सबकी रजामंदी से सगाई भी हो गई। सगाई के बाद भैया तो मां को साथ लेकर वापस मुंबई लौट गये और मुझे वापस हॉस्टल छोड  गये। तीन महीने बाद अचानक खबर आई कि मेरा वह मंगेतर कश्मीर में आतंकवादियों के साथ मुठभेड  में शहीद हो गया। यह जानकर घर में सभी को बेहद अफसोस हुआ। लडके से यों तो कोई भावनात्मक रिश्ता तब तक बना ही नहीं था, लेकिन उसके इस तरह जाने का दुःख होना तो स्वाभाविक ही था। इस हादसे के बाद मां की चिन्ताएं और बढ  गईं। बी. ए. की परीक्षा समाप्त होते ही भैया मुझे अपने साथ मुंबई ले गये। मां को भी उन्होंने यह समझाने का प्रयास किया कि व्यर्थ की चिन्ताएं न करे। लेकिन उसकी चिन्ता अपनी जगह कायम थी। इस बीच मैंने जिन्दगी से जो कुछ जाना-सीखा, उस दृष्टि से मेरी चिन्ताएं और सोच कुछ दूसरी तरह का हो गया था।”

”अगर ठीक समझो तो अपनी चिन्ताओं में मुझे भी शामिल कर सकती हो। शायद हम साथ मिलकर कोई बेहतर निर्णय कर सकें।”  मैंने उसके सोच की दिशा का अनुमान करते हुए सुझाव दिया।

”चाहती तो मैं यही हूं कि अपनी कुछ बातें आपके सामने खुलासा रख दूं, जिससे आपको भी निर्णय लेने में आसानी रहे। असल में अपना पोस्ट-ग्रेजुएशन करने के बाद मुझे यह जरूरी लगने लगा है कि मैं अपनी रुचि का कोई जॉब कर लूं, यह मीडिया कोर्स करने के पीछे भी यही मकसद है। इसे लेकर मैं कोई कैरियर चुनूं या न चुनूं, काम करने का यह विकल्प मैं अपने हाथ में रखना जरूरी समझती हूं… जीवन को लेकर कोई बङी महत्वाकांक्षाएं नहीं हैं मेरी,  लेकिन अपनी रुचि का काम करते हुए आत्म-सम्मान के साथ जीना मेरी अपनी जरूरत है… घर और परिवार को मैं ऊंचा मान देती हूं और बडों के प्रति आदर भी,  लेकिन अपेक्षा उनसे यही करती हूं कि वे अपना बडप्पन खुद बनाकर रखें,  छोटों को स्नेह दें और उन्हें विकसित होने के लिए बेहतर अवसर। …मैं जीवन में सच्ची साझेदारी की इज्जत करती हूं, जिसे आप आपसदारी कहते हैं। …पति-पत्नी के रिश्तों में समर्पण और स्वीकृति की बजाय मैं सहमति को ज्यादा अहमियत देती हूं… मेरी नजर में प्रेम कोई निजी मामला नहीं है, उसका असर घर-परिवार और समूचे माहौल पर रहता है। …किसी एक से लगाव रखते हुए मैं समूचे जीवन-जगत से लगाव की कल्पना करती हूं!”

“निखिल, ये बातें मुझसे रिश्ता बनाने या निभाने की शर्तें नहीं हैं, और न कोई मेरी जिद है… इन बातों को मैंने किन्हीं किताबों से पढकर ग्रहण नहीं किया है – ये मेरे अपने अनुभव हैं। …जीवन के बारे में मेरी इस सोच को लेकर कई बार जब मां और भैया को चिन्तित देखती हूं, तो खुद परेशान हो उठती हूं। उन्हें कह चुकी हूं कि वे मेरी चिन्ता छोड  दें… लेकिन उनके लिए भी शायद यह आसान नहीं रह गया है ।….मां कई बार भैया को अपने रिश्ते के लिए जोर देकर कह चुकी हैं। बङे मामा भैया के लिए एक अच्छा रिश्ता लेकर आए भी थे,  लेकिन अब तो भैया ने भी कहना शुरू कर दिया है कि जिस दिन प्रिया रिश्ते के लिए हां कर देगी,  वे अपने बारे में निर्णय कर लेंगे…। अब यह भी कोई बात है?  मेरे लिए यह स्थिति वाकई चिन्ताजनक हो गई है…. अपनी मां और भैया की इच्छा से मैं परिचित हूं… उन्होंने हम दोनों को आपसी समझ बनाने के लिए ही शायद यह मौका दिया है… लेकिन मेरा आप पर कोई दबाव नहीं है… आप भैया के अच्छे दोस्त हैं और आगे भी बने रहें… मुझसे अब वैसा लगाव रखते हैं या नहीं,  यह आपको तय करना है… जब ठीक समझें,  बता दीजियेगा!”  इस आखिरी बात के साथ प्रिया का स्वर बहुत धीमा हो गया था और अपने खुले हाथों की ओर देखते हुए वह खुद में ही जैसे खो गई थी।

प्रिया की बातों पर विचार करते हुए मैं वाकई चकित था। उसकी पारदर्शी सोच का मान रखते हुए मैंने सिर्फ इतना ही पूछा,  ”हमारे बीच इतनी गहरी आपसदारी के बाद भी क्या कोई निर्णय बाकी रह गया है, प्रिया ? …यह जीवन खुद हमने अपने हाथों से बनाया है,  …और तुमने तो इसे तराशा भी है! …हमारे अपनों ने बेशक इसमें अपनी भागीदारी निभाई हो, पर इसे आगे ले जाने और मुकम्मिल बनाने का मनोबल तो हमीं को अर्जित करना है…। बस,  इसी बात के लिए हमें एक-दूसरे का साथ चाहिए… मेरे अंतस में इस बात को लेकर न कोई दुविधा पहले थी और न अब है। …अगर कुछ अधूरा है,  तो उसे हम साथ मिलकर पूरा करेंगे… बताओ,  अपनी इस आपसदारी को लेकर और किस तरह की तसल्ली चाहिए तुम्हें…क्या तुम्हें यह पर्याप्त नहीं लगती, प्रिया?” यही मेरी स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी और इससे ज्यादा कहने के लिए मेरे पास कुछ था भी नहीं। मेरी आंखों में तैरते इसी अपनत्व और भरोसे के प्रति आश्वस्त होते हुए वह सोफे के कोने से उठकर एक कदम मेरी ओर बढ आई। मैं भी अपनी जगह उठकर खडा हो गया था। मैं और कुछ समझूं – बोलूं इससे पहले ही उसने अनायास मुझे अपनी उत्सुक बाहों और आतुर होठों में कसकर बांध लिया।

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-७१/२४७, मध्यम मार्ग

मानसरोवर, जयपुर – ३०२०२०

Published December 4, 2009 Uncategorized 1 Comment Edit

स्त्री मुक्ति के बहाने मानव मुक्ति का सपना

  • डॉ. पद्मजा शर्मा

संवादहीनता से उपजी दूरियों और  दो  पीढ़ियों के वैचारिक  टकराव के ताने-बाने से बुना नन्द भारद्वाज का उपन्यास  ’आगे खुलता रास्ता‘  स्त्री की पीड़ा, उसके  संघर्ष,   दर्द,  प्रेम,  प्रगति  और दृढ इच्छा-शक्ति की कहानी खुलकर बयान करता है. यह अपने अस्तित्व और  अस्मिता  के लिए जूझती सत्यवती की कहानी है. अँधेरे से निकलती ऐसी रौशनी की कहानी, जिसके प्रकाश में मध्यम वर्गीय परिवार की हर लड़की अपने सपनों की उडान देखती है. सत्यवती के व्यक्तित्व में चाँद की-सी शीतलता, आसमान का-सा विस्तार और पहाड़ की-सी अडिगता है, जो इस उपन्यास को स्त्री की जिजीविषा और उसकी संघर्ष&गाथा का एक अनूठा दस्‍तावेज बना देती है.

सत्यवती बचपन से ही मेहनती, सहयोगी प्रवृति वाली, गलत को गलत कहने वाली स्वतंत्रचेता लड़की है. उसे जो रास्ता ठीक लगता है, उस पर निडर होकर चलती है. पिता  के      ’पीने’  पर प्रश्न  खड़े करती है. पत्नी गीता को जब वे धकियाते हैं तो वह पिता को डपटती है –  ’यह क्या जानवरपना  है ?  होश तो ठिकाने हैं आपके ?’  छात्रावास में भोजन की सुचारू व्यवस्था करवाती है . मनपसंद लड़के से विवाह करती है. पेट की  जाई  बेटी होने के नाते अपना हक़ समझकर बीमार माँ का इलाज शुरू करवा देती है, भाई और पिता की नाराजगी की परवाह किये बिना. उसमें निर्णय लेने की क्षमता है , धीरज है  और विवेक भी है. इसी से जीवन के जरुरी फैसलों पर पकड़ मजबूत रहती है.

पिता के क्रोध, परिवार के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार से  शनै: शनै: चुकती जाती माँ को देखकर सत्यवती यह समझ जाती है  कि  ‘आत्म निर्णय’ लेने के लिए ‘आत्म निर्भर’  होना पहली शर्त है. वह संगीत निकेतन में बच्चों को  नृत्य  व संगीत का अभ्यास करवाती है. प्राइवेट बी. ए.  करती है. शिक्षिका बनती है. यहाँ से प्रारम्भ होता है उसका स्वावलंबी जीवन.  फिर भी  सत्यवती अहमक नहीं है. वह रिश्तों की अहमियत पहचानती है. पिता की उजाड़, सूनी आँखों में जब एक नदी बहते देखती है तो  अपना दायाँ हाथ पिता के कंधे पर रख देती है. वे उसकी ओर अबोध नज़रों से देखते रह जाते हैं.

समाज, परिवार और परम्परागत सोच के कांटे उसकी पगथलियों को लहूलुहान करते हैं. पर वह निरंतर आगे बढ़ती जाती है. प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सदाबहार की  तरह खिली रहती है.. इसी से प्रेरणा पाकर छोटी बहन दुर्गा अपना रास्ता तलाशती है. अपने हिस्से  की  खुशियाँ  पाती है. अपने  जीवन के अहम् फैसले खुद लेती है. वह  अपनी कमान किसी और के हाथ में सौपने को हरगिज राजी नहीं. विवाह के लिए  देखने – दिखाने  की बात आती है तो वह साफ कहती है कि  सामने  वालों को गुडिया चाहिए और वह गुडिया  बनने  को  तैयार  नहीं.

परन्तु इनके ठीक उलट उसकी माँ गीता  एक परम्परागत भारतीय नारी है. गीता  और रामबाबू में कई बार हाथा पाई की नौबत आई. ऐसे में बच्चे सहम जाते. पर गीता खुले में विरोध  नहीं करती. उसे लगता  कि वह  अपनी ही नजर में गिर जाएगी.  गीता के लिए पति  का  निश्चय ही उसका भविष्य  और बच्चों का सौभाग्य है . वह संतोषी  इतनी है कि पति की कमाई पर भी अपना  अधिकार  जमाती. पति की बगल में लेटे लेटे रोने को ही अपनी नियति स्वीकार कर लेती है.

लेकिन लेखक स्त्री को मजबूत देखना चाहता है. इसी से राय देता है कि पति को रास्ते पर लाने  के लिए पत्नी  झगड़े , कोसे, घर छोड़े,   पीहर जाने की धमकी दे. अगर  गीता ऐसा करती, तो उसका जीवन जिस अँधेरी गुफा में गुम हो गया था, न होता. हर रोज सूरज डूबने के साथ ही गीता के मन पर घिरता अँधेरा उसे नहीं डराता, शायद. तभी तो थकती काया से हार खाती गीता, बेटी को स्वीकारती, समझाती है कि – “मेरी आत्मा राजी है कि तूने किसी का बेकार दबाव नहीं माना,  पर अब तू अपना और ज्यादा अकाज मत कर.”

बेटी के जन्म का  तार  पाकर रामबाबू उत्साहित नहीं होते. जाहिर है, लड़की के प्रति सामाजिक सोच में कोई बड़ा अंतर नहीं आया है. आज भी लड़की की शिक्षा को गैर जरुरी  माना  जाता है. लेखक इस सन्दर्भ में स्कूलों की कमी की ओर भी इशारा करता है. लेखक   का विश्वास है कि अक्षर ज्ञान जितना जरुरी है उतना ही जरुरी अंतस को खुला रखना है.

बेटे से अधिक संवेदना युक्त बेटी होती   है. वीरेन्द्र चूने की फैक्ट्री   लगाकर पिता की जमा पूंजी को चूना लगा देता है. इधर माँ को  अधमरी हालत में भी  अस्पताल नहीं ले जाता. वह इस चेष्टा में है कि माँ से मुक्ति पा ले. लेकिन उसके सोचे हुए को उलट देने वाली बेटी सत्यवती हर बार आड़े आ जाती है.

सच्चाई और न्याय में किसी की दिलचस्पी न हो तो रामबाबू जैसे नेक दिल, मेहनती इन्सान भीतर से टूट जाते हैं, बेआवाज. चिंता और परेशानी में बड़ी सरलता से शराब की ओर मुडकर अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं. रामबाबू ईमानदारी की बेकद्री होते देख कर वक्त के साथ चलते-चलते एक ऐसे मोड़ मुड़ जाते हैं कि उनकी खुशहाल जिन्दगी को ग्रहण लग जाता है.  उन्हें उस पत्नी की फ़िक्र नहीं  जिसे जी जान से चाहते हैं. वह धीरे-धीरे डूब रही है और बचाने  का कोई उपाय नहीं. यहाँ लेखक रामबाबू के बहाने पूरे समाज को ही कटघरे में खड़ा करता है –  “ क्या इन्सान का फर्ज नहीं बनता  कि अपनी आँखों के सामने  कष्ट  पा रहे मरीज को कम-से-  कम अस्पताल तक तो पहुंचाए. माँ पॉँच दिनों से बीमार पड़ी है और आज तक कोई उसे अस्पताल पहुँचाने वाला नहीं मिला. माना बाप बीमार है, बेटे में इतनी सूझ नहीं है. लेकिन क्या  अडौस -पडौस  में भी ऐसा कोई नहीं था जो या तो खुद ऐसा करता या कम से कम उसे ही समय पर खबर पहुँचाता.”

रामबाबू को पत्नी के प्रति  अपने रवैये से पछतावा होता है. वे पश्चाताप की आग में झुलसते   हैं. पुरुष जो ठहरे. मुट्ठी  बंद रखना चाहते हैं पर विफल हो जाते हैं.  और अस्पताल से स्वास्थ्य-लाभ लेकर लौटी सत्यवती के अवसाद भरे दुर्बल चेहरे को देखकर उनका  अंतस  पिघलकर  आँखों के रास्ते बहने लगता है. ”….और कब पछतावे में झुका  माथा  घुटनों में आ लगा , खुद उन्हें इसका कम ही  भान  रहा .”   कभी- कभी ख़ामोशी भी कितना बोलती है .

उपन्यास में केंद्रीय  विषय  को और विश्वसनिय  बनाने के लिए  और विस्तार देने  के उदेश्य  से कई समस्याओं की ओर अंगुली उठाई है. भारत-पाक बंटवारे के बहाने लेखक राज- सत्ता  और धर्म  की ठेकेदारी करने वाले  सियासी  लोगों  पर कटाक्ष करता है  कि  ये लोग एक-सी जीवन-शैली और साझे इतिहास वाले मुल्क के टुकडे कर डालते हैं और फिर वर्षों तक उन टुकड़ों पर बसी जनता को उकसा-उकसा कर अपने  राजनीतिक स्वार्थ पूरे करते हैं. उन्हें न किसी मुल्क से लगाव है न मजहब से और न कौम से .

औद्योगीकरण के कारण बढ़ती जा रही बेरोजगारी की ओर इशारा है. औद्योगीकरण ने व्यक्ति के हाथ काट दिए हैं. मशीनों और नए औजारों ने हजारों किसानों और कारीगरों को दिहाड़ी मजदूर बनने पर मजबूर कर दिया है.  और मजदूरों के प्रति सोच है कि इन्हें अधिक सुविधाएं न दी जाएँ वरना इनके हौंसले  बढ़ जायेंगे.

कर्म  के  अनुरूप  फल  की  बात  है  तो  कमीशन  है, रिश्वत भी है. जातीय बंधन में जकड़ी मानसिकता है . शिक्षक संगठनों और शिक्षकों की राज्य-व्यापी हड़तालें हैं  तो नौकरीपेशा स्त्री (माँ ) की पीड़ा भी है.  प्रेम के भावनात्मक और दैहिक चित्र  भी  हैं.  जीवन साथी  के  साथ अंतरंगता   के द्रश्य हैं –  वहां  आलिंगन,  स्पर्श, भीतरी उमंग और  प्रेम है,  मगर प्रतीक रूप में.  जैसे कि “उस रात पूरे हलके में अच्छी बारिश हुयी .”  लेखक की नजर से छोटी से छोटी बातें  भी नहीं बच पाई हैं . सूरज के मामा मामी नन्हीं  बच्ची के लिए लकड़ी के  ‘गोल’ खिलौने  लाते हैं .

राजस्थान की माटी की सौंधी महक लिए संस्कृति,  त्योंहार,   शब्द,  नृत्य, सब हैं –  नेकाला , पोख, बिलम, हल, हाल, चऊ , पंजाली , बेई, चौसींगी, निवेड़ा, ओपरी, भेड़कर,  कुमाणस,  सोरायी , अदीठ , दोरी-सोरी ,  नाजोगा,  लालटेन , खेस , चिमनी , खाट है. लोक-नृत्य घूमर है  और हैं होली के फाग. तो कैरी का आचार  भी  है. ये कथा में अनायास आये हैं मगर इनसे कथा में ताप आया है और  ताजगी भी. पानी की कमी की ओर इशारा  कर लेखक ने  राजस्थान की नियति पर भी प्रकाश डाला है.  मुझे  इसलिए  उपन्यास  और  अच्छा  लगा कि  यहाँ  मेरा जोधपुर भी  है.

उपन्यास में लेखक नें कहीं कहीं ऐसे सूत्र वाक्य भी रचे हैं  जिनमें जीवन की जमीनी    सच्चाई साँस लेती है. वे  कहानी को बूस्ट करते हैं तो कभी  दिल में सीधे  उतर, पाठक को अपनी  सादगी  से अभिभूत कर देते  हैं.  कभी  लेखक के मंतव्य को जाहिर करते हैं,  जैसे –

“….अगर बुलावे का इंतजार करती तो , करती ही रह जाती. फिर सोचा रे जीवड़ा, माँ के पास जाने में किसके बुलावे का इंतजार — बस, सोचा और  आ गई .”

“बस अड्डे पर उस वक्त यही दो बसें एक दूसरी की ओर पीठ किये खड़ी  थीं”

“पिता बाहर बैठक में दो बरस के पोते के साथ अपना बुढ़ापा पोख रहे थे .”

“छात्र , अभिभावक,  अध्यापक , कर्मचारी तो खुद इस अवसरवादी   राजनीती  और बाजारू  व्यवस्था  की भीतरी मार से पीड़ित  ऐसे मरीज हैं जिनकी  इस व्यवस्था में  न  कोई पूछ है और न उनके  साथ बेहतर  बर्ताव .”

“दफ्तर के विवाद में घाटा हमेशा छोटे कर्मचारी को ही उठाना पड़ता है .”

“इतनी नई चीजों के बावजूद लोगों का यह विश्वास कभी कम नहीं हुआ कि भले कितनी मशीनें आ जाएँ इन्सान का काम तो इन्सान से ही पार पड़ता है .”

“बाहर का अँधेरा उतरोतर गहरा होता जा रहा था और तारों से भरा आसमान उतना ही गूंगा और गुमसुम .”

“सभी को अपने आसपास  जमा  देखकर रामबाबू  को लगा  कि अब  उसका  परिवार  अपनी उर्जा  और आकार में पूरा है. वह बहुत देर तक संतोष  की मीठी गोली अपने अंतस में घुलाते रहे .”

“….. नौकरी करना सिर्फ रोजगार से जुडना नहीं होता, उसका अपना एक अलग मकसद और आनंद होता है. जीवन में कुछ नया करने सीखने का मार्ग खुलता है.”

उपन्यास में जहाँ  समाज की सोच में आये बदलावों को  पकड़ा है वहीँ  उसकी सोच को बदलने की कोशिश भी की है .खासकर स्त्री के सन्दर्भ में. निश्चित ही उपन्यास. “आगे खुलता रास्ता” लेखक के कद को बड़ा करेगा . लेखक बारीक बयानी नहीं करता. कई बार बारीक बयानी  से रेशे परस्पर उलझकर टूट जाते हैं .हर पात्र का व्यक्तित्व स्वतंत्र है .यद्यपि लेखक अपने पात्रों के साथ चलता है पर उन्हें अपनी लाठी से नहीं हांकता. “आगे खुलता रास्ता” का संसार लेखक का अपना देखा और जिया हुआ सा लगता है. कथानक लोक की पाळ-पाळ चलता है  इसलिए ताजगी का एहसास बराबर बना रहता है .

गांधीजी स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए स्त्री और पुरुष की स्वतत्रता व समानता में विश्वास करते थे  .यही सोच इस उपन्यास में देखने को मिलती है. सत्यवती और सूरज,   खुद ऊँचे उठते हैं तो अपने साथवालों को भी उठाते हैं. गीता दबती है तो परिवार की खुशियाँ काफूर हो जाती हैं. लेखक चाहता है कि स्त्री अपने ‘स्व’ को पहचाने. वह नहीं चाहता कि स्त्री को पुरुष अपने डंडे से हांके.  लेखक स्त्री-स्वतंत्रता के साथ ही   व्यक्ति की स्वतंत्रता का भी हिमायती है .

कुल मिलाकर  उपन्यास  स्त्री-मुक्ति को मानव-मुक्ति से जोड़कर एक बेहतर दुनिया का सपना रचता है . समय  की  हलचल का  पता देता है. तभी खुलता है आगे का रास्ता.

JJ                                डॉ. पद्मजा शर्मा

15-बी , पंचवटी कालोनी ,

सेनापति भवन के पास,

जोधपुर , राजस्थान .

मोब . 9414721619 e mail  padmjaa@gmail.com

Published November 26, 2009 Uncategorized Leave a Comment Edit

Published November 26, 2009 Uncategorized Leave a Comment Edit

स्मृति-लेख:
हरीश भादानी : जो पहले अपना घर फूंके
• नंद भारद्वाज

एक ऐसा कवि-गीतकार जिसके गीतों और कविताओं से ही नहीं, उसके होने मात्र से उस शहर-हलके के आम लोग आत्मीय लगाव और अपनत्व से रीझ उठते रहे हों, कामगारों की आम-सभाओं और जुलूसों में जिसके गीतों की धूम मची रही हो, जिसके जन-गीत लोगों के हौसलों में नया जोश भर देते रहे हों, जो अपने सोच और संवेदन में वेद, आख्यान और उपनिषदों की उक्तियों को नया लोकधर्मी अर्थ देने की अद्भुत सामर्थ्‍य रखता हो, जिसके गीतों में अपने समय और परिवेश की चिन्ताओं और यथार्थ की खुरदुरी जमीन का गहरा अहसास बोलता हो, उस जनकवि का आकिस्मक अवसान ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसकी पूर्ति किसी तरह संभव नहीं दीखती। उनसे आत्मीयता रखने वाले उन तमाम लोगों का मन आज एक गहरे अवसाद में डूबा नजर आता है और उनके पास इससे उबर आने का कोई विकल्प शेष नहीं है।
इसी लोक-संवेदन में रसा-बसा और मरूस्थलीय जीवन-संसार को अपनी आर्द्र रचनाशीलता से सींचने वाला आम-जन का प्रिय कवि हरीश भादानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के एन् जन्मदिवस (2 अक्टूबर 2009) की सुबह अपनी आयु के छिहत्तरवें वर्ष के पायदान पर अनायास सदा के लिए मौन हो गया। बेशक हर अवसान अपने आप में आकिस्मक और अनायास ही होता है, लेकिन इसके आसार विगत दिनों में उनके बहुत करीब आ गये थे। उनकी मंझली बेटी सरला माहेश्वरी, जो पिश्चम बंगाल से दो बार राज्यसभा की सदस्य रह चुकी हैं, उनके उपचार के लिए दिल्ली और कोलकाता में निरन्तर प्रयत्न करती रहीं और बीकानेर में बड़ी बेटी पुष्पा और छोटी कविता उनका हर संभव इलाज करवाती रहीं, लेकिन इन प्रयत्नों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
पिछले कुछ वषोZं से उनके स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आती जा रही थी – पहले मधुमेह, फिर हृदय-रोग और कोलकाता में उपचार के दौरान दुर्बलता के चलते घर में दुघZटनाग्रस्त हो जाने के कारण कूल्हे की हड्डी की शल्य-क्रिया से अभी ठीक से उबर भी नहीं पाए थे कि आहारनली के कैंसर ने उन्हें ऐसी अवस्था में ला छोड़ा, जहां आयुर्विज्ञान की कोई उपचार-विधि कारगर नहीं रह गई थी। इन तीन-चार वर्षों में वे लगातार कभी कोलकाता, कभी बीकानेर तो कभी जयपुर प्रवास के दौरान अक्सर अपने क्षीण स्वास्थ्य को लेकर लगातार जीवन के लिए संघर्ष करते रहे। पिछले एक अरसे से तो वे छोटी बेटी कविता और अविनाश की देखरेख में बीकानेर में ही टिककर अपना इलाज करवा रहे थे, लेकिन ये आखिरी चार-पांच महीने बेहद कष्ट में गुजरे।
यों शारीरिक और मानसिक कष्टों से हरीश भादानी का रिश्ता नया नहीं था। उनसे आत्मीय संबंध रखने वाले लोग इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि 11 जून 1933 को बीकानेर के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे इस रचनाकार का बचपन किन विकट परिस्थितियों में बीता है – उनके पिता बेवा महाराज बेटे के जन्म लेने के कुछ दिन बाद ही सन्यासी हो गये और मां उसी सदमे में बेटे को बेसहारा छोड़कर चल बसी। मां-बाप की इस अयाचित परिणति का बच्चे की परवरिश पर तो असर पड़ना स्वाभाविक था ही, तिस पर परिवार के बाकी लोग उसे अपशकुनी और मान बैठे। वह बचपन से ही परिवार जनों की सतत उपेक्षा और दादा के कठोर अनुशासन में बड़ा हुआ, पग-पग पर मिलती प्रताड़ना और उपेक्षा ने उसे भीतर से बेहद संवेदनशील और भौतिक सुविधाओं के प्रति विरक्त-सा बना दिया। विरासत में मिली पारिवारिक संपत्ति को और आगे बढ़ाने या उसकी देखरेख करने में उसकी कतई दिलचस्पी नहीं रह गई, बल्कि इस अकेलेपन और सन्यासी पिता के आदर्श ने उसे और वीतरागी-सा बना दिया। वह किशोरपन से बैरागीपन के भजनों और गीतों को गाने में इतना खो गया और खुद भी वैसे गीत रचने में रम गया कि फिर पलटकर कभी पीछे नहीं देखा।
कुछ और वयस्क होने पर जब वे समाजवादियों और रायवादियों के संपर्क में आये तो एक नयी ही दुनिया और विचार से उनका साक्षात्कार हुआ। वे सामूहिक चेतना के एक ऐसे विचार-दर्शन की ओर उन्मुख हुए, जहां निजी सुख-दुख और वैयक्तिक विकास का उनके लिए कोई अर्थ नहीं रह गया। वे अपनी चिन्ता छोड़ उन जरूरतमंद और पीड़ित लोगों की दशा सुधारने के प्रति इतने तल्लीन हो गये कि विरासत में मिली अपनी सम्पत्ति तक धीरे-धीरे परमार्थ के कामों में लुटा बैठे। जन-आन्दोलनों में सक्रियता बढ़ी तो अपनी स्नात्कोत्तर शिक्षा का रास्ता ही बिसार बैठे। उनकी लोकधर्मी कविताएं और तमाम जनगीत उसी दौर की उपज रहे हैं।
अपनी इसी रचना-यात्रा की ओर संकेत करते हुए उन्होंने अपने एक संग्रह `उजली नजर की सुई´ की भूमिका में लिखा भी है – “अपने में अकेलेपन का भार ढोते हुए मैं आगे वाली भीड़ से जुड़ गया हूं, उसकी एक इकाई बन गया हूं। मैं इस भीड़ के साथ-साथ चलते रहने के मोह से बंधा रहना चाहता हूंं। इससे दूरी और अलगाव की कल्पना तक करने का साहस मुझमें नहीं है। इससे कसकर इसलिए भी जुड़ा रहना चाहता हूं कि इकाईपन का अहसास तक समाप्त हो जाए। संभवत: यही मेरी जिजीविषा है, जो मुझे अधूरे गीतों से शब्द संयोजन के जैवी-धर्म का निर्वाह कराती हुई `सुलगते पिंड´ और `उजली नजर की सुई´ तक ले आई है।´´
उनसे गहरा लगाव रखने वाले इस बात से भी परिचित रहे हैं कि वे जीवन-पर्यन्त अपने आहत बचपन और जीवन के विषम यथार्थ से तो लड़ते ही रहे, अपने जीवन के उत्तरकाल में खुद अपने स्वास्थ्य से भी अधिक परिवार के आत्मीयजनों के स्वास्थ्य को लेकर और अधिक संतप्त रहे। उनकी दोनों बड़ी बेटियां पुष्पा और सरला तो गहन उपचार से गुजर ही रही थीं, उसी दौरान उनकी बहू प्रज्ञा और पौत्र एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गये और दुर्भाग्य से उस नन्हे बालक को तो बचाया भी नहीं जा सका।
अपने जीवन-निर्वाह और साहित्यकर्म की निरन्तरता के लिए उन्हें जिन हालात से जूझना पड़ा, वह औरों के लिए बेशक प्रासंगिक न हो, लेकिन अपनों की इस आत्म-पीड़ा और खुद के दुर्बल स्वास्थ्य ने उनकी रचनाशीलता को किस कदर प्रभावित किया, इसे जाने बगैर हम रचनाकार हरीश भादानी के उस त्रास को शायद ही ठीक से समझ पाएं। उन्होंने बरसों तक मुंबई-कोलकाता और जयपुर-बीकानेर में अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में कलमी मजदूरी के अनेक काम किये – प्रौढ़ शिक्षा और साक्षरता मिशन के तहत अनौपचारिक शिक्षा पर कोई दो दर्जन किताबें लिखकर सौंपी। सन् 1960 से ´74 और 1990 से ´93 तक `वातायन´ जैसी पत्रिका के जरिये जहां प्रदेश में नये रचनाकारों के लिए एक साहित्यिक मंच तैयार करने का अनूठा कार्य किया, वहीं लोक महत्व के मसलों पर जन-आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए जेल-यात्राएं भी भोगीं। यहां तक कि काव्य-सृजन के दौर में वे जिस तरह के स्नायविक तनाव से गुजरते हुए अपनी रचना को आकार देते रहे, उससे उनकी अन्तश्चेतना और काया पर पड़े असर को कम ही लोग अनुमान पाते हैं।
यह एक विडंबना ही है कि हरीश भादानी एक संवेदनशील कवि के रूप में अपने प्रदेश में जहां पर्याप्त लोकप्रिय और चर्चित रहे, वहीं हिन्दी के वृहत्तर पाठक-वर्ग के बीच सार्थक चर्चा और उचित मूल्यांकन के अभाव में प्राय: ठण्डी उपेक्षा के शिकार। इतने बड़े प्रदेश में वे एकमात्र ऐसे गीतकार रहे हैं, जिन्होंने नयी कविता की व्यक्तिवादी प्रवृतियों, नवगीतों की आत्मविभोर गेयता और अकविता की अराजक पदावली के विरुद्ध रचनात्मक संघर्ष करते हुए अपने रचना-कर्म को बराबर सार्थक बनाए रखा। शुरू के वर्षों वे काव्य-मंचों पर भी सक्रिय रहे, लेकिन व्यावसायिक दबावों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया।
अपनी इस सुदीर्घ रचनायात्रा में उन्होंने जहां हिन्दी संसार को `उजली नजर की सुई´, `खुले अलाव पकाई घाटी´, `नष्टो मोह´, `सन्नाटे के शिलाखंड´, `पितृकल्प´, `एक अकेला सूरज खेले´, `सड़कवासी राम´, `विस्मय के अंशी´, `सयुजा सखाया´, `मैं – मेरा अष्टावक्र´, `आडी तानें सीधी तानें´ जैसी बीसों बेजोड़ कृतियां दीं, वहीं अपनी मातृभाषा राजस्थानी में `बाथां में भूगोळ´ और `जिण हाथां आ रेत रचीजै´ जैसी उल्लेखनीय कृतियों के माध्यम से साहित्य में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। हिन्दी में गीतों की परम्परा को निराला, नागार्जुन, शील, केदारनाथ अग्रवाल आदि कवियों ने जहां समकालीन जीवन-यथार्थ से जोड़ते हुए ठोस आधारभूमि प्रदान की, वहीं हरीश भादानी, रमेश रंजक, शलभ श्रीरामसिंह, नचिकेता आदि जनवादी गीतकारों ने उस परंपरा को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि उन्होंने जनसामान्य तक पहुंचने के इस सशक्त माध्यम को अवमूि‍ल्‍यत करने वाली रूपवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ जमकर संघर्ष भी किया। ऐसे कठिन दौर में राजस्थान जैसे धीमी गति वाले प्रदेश में हरीश भादानी की उपस्थिति अपना विशेष महत्व रखती है। उनके गीतों और कविताओं की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे महज `मानवीय परिस्थिति और दर्द की अभिव्यक्ति´ तक सीमित न रहकर उन शोषित जनों का हौसला भी बढ़ाती हैं, जो इस बदलाव की विरासत के असली वारिस हैं।
उनके गीतों में जीवन की वास्तविकता, कवि का आत्म-संघर्ष और उनका रचना-संसार अपनी पूरी रचनात्मक ऊर्जा और आत्मीयता के साथ अभिव्यक्त हुआ है – जहां कोलाहल भरे आंगन में सन्नाटा है, सुलगते जंगल हैं, बिफरती रेत है, हलचलों से भरे शहर हैं, शहर में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती ड्योढ़ी है, रेत में नहाया मन है, अपना ही आकाश बुनने की उत्कट आकांक्षा है, टूटे हुए पुलों को फिर से बना लेने के मजबूत इरादे हैं और सबसे ऊपर इन सारी विपरीत परिस्थितियों के बीच निरन्तर जूझते रहने और रचते रहने का ठोस इरादा है : `मौसम ने रचते रहने की / ऐसी हमें पढ़ाई पाटी।´
हरीश भादानी के गीतों की अन्तर्वस्तु चूंकि उन्हीं मेहनतकश लोगों की रोजमर्रा की मशक्कत भरी ज़िन्दगी से ताल्लुक रखती है, इसलिए इन गीतों की भाषा और अंदाजे-बयां उतना ही सहज और उनके काव्य-संस्कार के अधिक करीब पड़ता है। यही कारण है कि इन गीतों में लोकगीतों की-सी सहजता और आत्मीयता है। कर्मठ जीवन के चित्र आंकते हुए उनकी अभिव्यक्ति में भाषा का यह देशज रूप खुलकर सामने आता है – `धरती भर कर चढ़े तगारी, बांस बांस आकाश फरनस को अगियाया रखती, सांसें दे दे घास।´
भाषा के इस देशज व्यवहार की निर्मिति में जहां कवि ने अमूमन अच्छे और सार्थक प्रयोग किये हैं, वहीं कथ्य की मांग के अनुसार उन्होंने कई नये शब्द, प्रतीक और अछूते बिम्बों की रचना की है। भाषा के इस देशज रूप के साथ उनके गीतों में उर्दू-फारसी के शब्दों की बहुलता भी देखने को मिलती है। कई बार कुछ शब्दों की बार-बार आवृत्ति कथनी पर विपरीत असर डालती भी है, लेकिन लोक-भाषा के शब्दों को अपनी सर्जना में खपाने और उनसे नया असर पैदा करने का यह प्रयत्न कवि की लोक-जीवन में गहरी रुचि, आत्मीय संपर्क और जन-संघर्षों के प्रति उनके आन्तरिक लगाव का ही परिचायक रहा है।
उनके इसी कर्मठ व्यक्तित्व और आत्म-संघर्ष की एक बेजोड़ अभिव्यक्ति है उनकी लम्बी कविता `पितृकल्प´ जो संभवत: हिन्दी की अकेली ऐसी कविता है, जिसमें कवि ने अपने छह दशक की जीवन-यात्रा के उतार-चढ़ावों, कड़वे अनुभवों और कुछ बुनियादी सवालों पर खुद से जिरह की है और कुछ ऐसे नये सवाल भी उठाये हैं, जिनका हम सभी की ज़िन्दगी से गहरा ताल्लुक है।
`पितृकल्प´ पहली ऐसी कविता है, जहां कवि का अपना जीवन-संघर्ष मूल कथ्य बनकर प्रस्तुत हुआ है और यह उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा कि यह लंबी कविता भी प्रकारान्तर से उसी रेतीली संवेदना का एक अभिन्न अंग बनकर सामने आती है। `पितृकल्प´ की भूमिका में कवि ने अपनी जीवन-यात्रा के निजी संदर्भों की ओर इशारा करते हुए लिखा भी है कि “प्रश्नों के बियाबान में अपने लिए पगडंडी तलाशते-बनाते अनेक घटकों से इस रचनाकर्मी को टकराना पड़ा है। मुझ अकिंचन ने इन आंखों से देखे हैं घटकों के सोच, सपनों और कार्य-व्यापारों में जहां-तहां खुभे, मर्यादा, आचार-संहिता, सीमा के बांवलिये कांटे, रिसती हुई उम्र, लहू और यत्न भी।´´
कांटों के चुभन की यही अन्तर्व्‍यथा उनके तमाम गीतों और कविताओं में जहां-तहां बिखरी पड़ी है, लेकिन इस प्रक्रिया में उन्होंने अनुभव के रूप में जो कुछ अर्जित किया और उस व्यापक जन-समुदाय को अवदान के रूप में जो कुछ दिया, उसकी तुलना में उस पुश्तैनी माया का मूल्य तो जैसे कुछ भी नहीं। तभी तो कबीर की तर्ज पर वे कहते हैं –
जो पहले अपना घर फूंके
फिर धर-मजलां चलना चाहे
उसको जनपथ की मनुहारें!
हरीश भादानी सही अर्थों में इसी जनपथ पर जन के साथ चलने वाले हमारे युग के एक समर्थ जनकवि हैं, जिन्होंने उस माया और परिपाटी को अस्वीकार करते हुए अपनी परम्परा को नये सिरे से समझने और कविता में उसके सकारात्मक पक्षों की नयी व्याख्या प्रस्तुत करने की पहल की है। कवि ने `नष्टो-मोह´ और `पितृकल्प´ की भाव-भूमि पर ही एक और महत्वाकांक्षी कविता रची, `मैं – मेरा अष्टावक्र´ और इस कविता के माध्यम से उन्होंने अपने उसी अनुभव संसार और सोच को एक नया विस्तार देने की कोशिश की। इसी कविता पर अपना अभिमत देते हुए डॉ. शिवकुमार मिश्र ने भी इसी बात पर बल देते हुए कहा था कि “यह रचना वस्तुत: एक ऐसा आत्मालाप, एक आत्म-साक्षात्कार या आत्म-संवाद है, अपने द्वारा अपने से ही की गई एक वैचारिक मुठभेड़, जद्दोजहद या कशमकश। यह एक जीवंत बहस है जिसमें संवादी और विवादी एक ही व्यक्ति है – व्यक्ति का जिज्ञासु मन और उसके भीतर बैठा उसका जागृत प्रतिरूप, उसे रह-रहकर झिंझोड़ता और आत्मसजग करता हुआ। यह अपने माध्यम से अपने को फिर से टटोेलने, पहचानने और पढ़ने का एक संजीदा प्रयास है।´´
निश्चय ही हरीश भादानी की इन आत्म-संवादी कविताओं का रचना-संसार और दायरा इतना व्यापक है कि उसमें स्थानीय हवालों से लेकर खाड़ी और अंध महासागर तक के अन्तर्राष्ट्रीय हवाले सहजता से घुल-मिल गये हैं। उन्हें किसी एक हलके या हवाले की परिधि में रखकर देखना पर्याप्त नहीं होगा। कवि का अपने आभ्यंतर और बाह्य-संसार से रिश्ता भी इतना व्यापक रहा है कि उसमें आज के इन्सान की सारी पीड़ा और उसकी नियति के बेतरतीब हवाले क्षत-विक्षत अनुभवों की तरह दूर-दूर तक फेैल गये हैं, उन्हें कोई और तरह की तरतीब दे पाना कठिन है। यह इस कविता की ताक़त भी है और उसकी आंतरिक संरचना की एक बड़ी दुविधा भी।
यह बात भी उल्लेखनीय है कि हरीश भादानी ने अपने गीतों और कविताओं में प्रदेश की विषम भौगोलिक स्थितियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए जल के अभाव पर गहरी चिन्ता प्रकट की है। ऐसे अनेक गीत और कविताएं हैं जो इसी चिन्ता पर केिन्द्रत हैं। अपने एक साक्षात्कार में इसी ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा था, “आप पानी की ही बात लीजिये, जमीन के नीचे का पानी और नीचे धंसता जा रहा है और ऊपर से बरस में एक दो बार ही बरसे, कई-कई बार तो बरसों नहीं बरसे, तब वहां पानी का मोल क्या होगार्षोर्षो तब उन आंखों में पानी की प्रतीक्षा रहेगी या उडीक, हर, लाय, या बळत! यही बात मैंने अपनी कविताओं में कहने की कोशिश की है – `उत्तरादे पर उझके दिखे ओ मेघ बाबा! / छोड़ अपनी कूंट / आ, उतर आ!´ इस तरह के बेचैन बुलावों को `आ रे बदरा, ले निमंत्रण´ जैसी प्रांजल प्रतीक्षा बनाकर कैसे पेश किया जा सकता है।´´
उनकी काव्य-भाषा और रचना-शिल्प के स्वरूप पर यहां ज्यादा विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं है, फिर भी यह जान लेना आवश्यक है कि उनकी काव्य-भाषा के पीछे इसी मरुस्थलीय जीवन की कठिनाइयों – खासकर पानी की कमी और अभावों में पलते देहाती जीवन को उसी लहज़े और मुहावरे में रचने की कोशिश, उनकी कविता को लोक के बेहद करीब ला खड़ा करती है। लोक के साथ इसी आत्मीय रिश्ते के चलते उन्होंने जो लोकप्रियता अर्जित की, यह उसी का परिणाम था कि उनके अवसान की खबर सुनते ही समूचे प्रदेश और साहित्य-जगत में शोक की लहर-सी व्याप्त हो गई। यही नहीं, उनकी अन्तिम इच्छा के रूप में जब मरणोपरान्त देहदान के संकल्प की जानकारी मिली तो अगले दिन उस महाप्रयाण में जैसे समूचा बीकानेर नगर सड़कों पर उमड़ पड़ा और अपने लाड़ले जनकवि को अश्रुपूरित विदाई देते हुए गर्व अनुभव किया।

– 71/247, मध्यम मार्ग
मानसरोवर, जयपुर-302020

Published November 16, 2009 Uncategorized 1 Comment Edit

यही है रास्ता
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

राजस्थानी और हिंदी के सुपरिचित रचनाकार नंद भारद्वाज का नया उपन्यास ‘आगे खुलता रास्ता’ उनके 2004 में केंद्रीय साहित्य अकादमी से पुरस्कृत राजस्थानी उपन्यास ‘सांम्ही खुलतौ मारग’ पर आधारित है. इसे अनुवाद कहना इसलिए उचित नहीं है कि लेखक ने न केवल कथा के आरंभ और अंत में परिवर्तन किए हैं, उसकी भाषा को भी हिंदी की प्रकृति के अनुरूप करने के क्रम में काफी बदलाव किए हैं. अपने राजस्थानी उपन्यास का ज़िक्र करते हुए उन्होंने इस उपन्यास की भूमिका में लिखा भी है, “इसके आरंभ और अंत से मैं संतुष्ट नहीं था. पाठ में कसावट की कमी बराबर खलती रही. इस पुनर्सृजन के दौरान मुझे यह भी लगा कि इसकी मूल भाषा और अनुवाद की भाषा की प्रकृति एक-सरीखी नहीं है, जो वाक्य अपनी मूल भाषा में बेहद व्यंजनापरक और असरदार लगता है, उसके यथावत शाब्दिक अनुवाद में वह सारी व्यंजना और चमक खो जाती है, ऐसी सूरत में उस प्रसंग के पूरे वाक्य विन्यास और अभिव्यक्ति को हिंदी की प्रकृति के अनुरूप रखने की दृष्टि से मुझे उसका पुनर्सृजन करना ज़्यादा बेहतर लगा. कथा-प्रसंगों में जहां कहीं अंतराल छूट गए थे, या मूल में जो अनावश्यक विस्तार पा गये उन्हें संपादित कर फिर से लिखा और इस तरह एक मुकम्मल पाठ तैयार किया. बेशक, मूल कथानक वही है, प्रमुख पात्र वही हैं, घटना-प्रसंग, संवादों के आशय, संबंधित ब्यौरे आदि वही हैं, लेकिन अपने मौज़ूदा स्वरूप में अब यह उस मूल पाठ से भिन्न भी हो गया है.” (अनुवाद और पुनर्सृजन)
उपन्यास एक मूलभूत विचार पर आधारित है. लेखक ने प्रारंभ में ही उसे स्पष्ट कर दिया है: “जीवन में कुछ भी पूर्व निर्धारित या प्रारब्धवश घटित नहीं होता. जो कुछ होता है, उसका निश्चित कार्य-कारण संबंध दृश्य में मौज़ूद रहता है. अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्ष करने वाले हर व्यक्ति को एक बेहतर मानवीय जीवन के लिए अपना रास्ता स्वयं खोजना या बनाना पड़ता है. जीवन-यात्रा में ऐसे निर्णायक मोड़ अवश्य आते हैं, जहां हमें एक बेहतर विकल्प या रास्ता चुनना होता है. हमारा जीवन-विवेक जितना जागृत और सम्यक होगा, विकल्प का चुनाव उतना ही सही और सटीक होगा – उसी से बेहतर और वृहत्तर जीवन का रास्ता खुलता है, उसी में हमारे होने और जीने की सार्थकता निहित होती है.” (अनुवाद और पुनर्सृजन)
दो खण्डों में विभक्त इस उपन्यास में लेखक पहले बाबू रामनारायण की जीवन गाथा प्रस्तुत करता है और फिर दूसरे खण्ड में वह हमें उसकी बेटी सत्यवती के जीवन संघर्ष और उसके अपने विवेक से अपना जीवन-पथ चुनने के प्रयासों और उन प्रयासों के मार्ग में आने वाली अड़चनों से रू-ब-रू कराता है. उपन्यास का प्रारंभ सत्यवती से होता है, लेकिन बहुत जल्दी कथा के केंद्र में रामनारायण आ जाता है और फिर पूर्व दीप्ति पद्धति के माध्यम से कथाकार हमें उसकी पूरी जीवन-यात्रा से परिचित कराता है. दूसरा भाग मुख्यत: सत्यवती के जीवन पर केन्द्रित है. कथा के अंत में रामनारायण और सत्यवती की अलग-अलग जीवन धाराएं मिलकर एक हो जाती हैं. कहना अनावश्यक होगा कि रामनारायण और सत्यवती की इन कथाओं में और बहुत से पात्र और चरित्र भी यथासमय और यथास्थान अपना योग देते हैं. मुझे लगा कि उपन्यासकार का मूल लक्ष्य सत्यवती की कथा कहना है, लेकिन उस कथा को समुचित आधार देने के लिए उसने रामनारायण की कथा भी कही है. यह बात ग़ौर तलब है कि उपन्यास के ये दो खण्ड एक तरह से दो अलग-अलग पीढ़ियों की कथा भी कहते हैं.
लेखक ने रामनारायण के परिवेश का परिचय देने के बाद उनके सेवा काल पर अधिक ध्यान दिया है. रामनारायण एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति है. लेकिन उसकी ईमानदारी उसके सहकर्मियों को सहन नहीं होती क्योंकि इससे उनके हित आहत होते हैं, इसलिए वे उसके कर्तव्य निर्वहन में दिक्कतें पैदा करते हैं. उधर उनका प्रशासन उनसे यह चाहता है कि वे उचित अनुचित और न्याय अन्याय का विचार छोड़ केवल वह करें जिससे कंपनी का हित सधता हो. ज़ाहिर है कि ये सारी बातें उन्हें प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती हैं. वे चिड़चिड़ करने लगते हैं, और क्रमश: शराबखोरी की तरफ अग्रसर होने लगते हैं. इससे अन्य बातों के अलावा उनके घर का बजट भी डगमगाता है और पत्नी बच्चों को अभाव की ज़िन्दगी जीनी पड़ती है. लेखक ने राम बाबू की कथा को उनकी नौकरी की स्थितियों के साथ बहुत खूबसूरती से गूंथा है.
उपन्यास का दूसरा केन्द्र है रामबाबू की बेटी सत्यवती, उर्फ सत्तो. बल्कि, ज़्यादा सही तो यह कहना होगा कि उपन्यास का केंद्र ही सत्तो है. रामबाबू की कथा तो उसे समुचित आधार प्रदान करने के लिए कही गई है. सत्यवती रामबाबू और गीता की बड़ी बेटी है. उससे छोटी है दुर्गा और सबसे छोटा है वीरेन्द्र उर्फ वीरू. सत्यवती पढ़ने में बहुत तेज़ है. गांव के स्कूल से वह दसवीं पास करती है. दसवीं में पढते वक़्त स्कूल के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने के प्रश्न पर अपने पिता से पहली बार उसका रास्ता अलग होता नज़र आता है. पिता नहीं चाहते कि वह कार्यक्रम में भाग ले, लेकिन वह न केवल भाग लेती है, प्रशंसा भी अर्जित करती है. यहीं से पिता के साथ उसके रिश्तों में बदलाव आने लगता है. बदलाव मां के साथ वाले रिश्तों में भी आता है, लेकिन वहां स्थिति सुस्पष्ट नहीं रहती. लगता है जैसे मां खुद ही यह निर्णय नहीं कर पाती है कि वह अपने पति का समर्थन करे या बेटी का. दसवीं के बाद पिता सत्यवती का रिश्ता तै करना चाहते हैं, मां-बाप दोनों ही उसे पढने के लिए गांव से बाहर भेजने के पक्ष में नहीं हैं. मां फिर भी थोड़ी-सी उसके पक्ष में है, लेकिन आखिर तो वह ‘भारतीय नारी’ है. गांव के स्कूल के क्रमोन्नत हो जाने से सत्यवती ग्यारहवीं कक्षा भी गांव से ही पास कर लेती है और फिर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर मां-बाप की अनिच्छा के बावज़ूद एस टी सी की पढाई करने बाहर चली जाती है. यह पढ़ाई करते हुए ही उसकी भेंट अपनी एक प्रिय सहेली शारदा की बुआ के बेटे सूरज से होती है और फिर यह भेंट आहिस्ता-आहिस्ता अनुराग में परिवर्तित होती जाती है और इसकी परिणति होती है उनके अंतर्जातीय विवाह में. सत्यवती यह विवाह अपने मां-बाप की गैर मौज़ूदगी में आर्य समाज में करती है. अपने बहिन दुर्गा को वह ज़रूर शादी में बुलाती है. सत्यवती न केवल पढ-लिखकर खुद अपने पैरों पर खड़ी होती है, और अपनी ज़िन्दगी के फैसले खुद करती है, वह अपनी बहिन का जीवन भी संवारती है, और उसे पढा लिखाकर प्रशासनिक सेवा की अधिकारी बनाती है. सत्यवती उपन्यास के अंत में अपनी बीमार मां की भी समुचित देखभाल कर उन्हें जैसे मौत के मुंह से वापस लाती है. इस तरह वह एक आदर्श युवती की छवि प्रस्तुत करती है. लगभग वैसी ही है उसकी बहिन दुर्गा भी. लेकिन इन दोनों का भाई वीरेन्द्र इतना अच्छा नहीं है. वह न केवल सत्यवती और उसके पति सूरज से दुराव बनाये रखता है, बीमारी की अवस्था में अपनी मां की भी पर्याप्त देखभाल नहीं करता.
उपन्यास में प्रासंगिक रूप से और बहुत सारी कथाएं आती हैं, लेकिन उन सबका मक़सद सत्यवती के जीवन संघर्षों को और उन संघर्षों को वह किस सूझ-बूझ से झेलती है, इस बात को उभारना ही है. असल में सत्यवती एक ऐसा चरित्र है जो हमारे आस-पास कहीं भी मिल जाएगा. यह कोई विरल और अनूठा चरित्र नहीं है. उसके मां-बाप का उसके प्रति जैसा बर्ताव है वह भी अप्रत्याशित नहीं है. पिता, एक शब्द में कहूं तो रूढ़ियों के बंधन से जकड़े हैं. बेटी को ज़्यादा पढाना लिखाना व्यर्थ है, उसे नाचना गाना नहीं चाहिए, जल्दी ही उसकी शादी करके अपने दायित्व से मुक्त हो जाना चाहिए: यही है उनका सोच. उनका रवैया अपनी बेटियों और बेटे के प्रति साफ़ तौर पर अलग है. बेटा उनके लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है. उनकी पत्नी गीता का भी जैसे अपना कोई सोच नहीं है. वह लगभग अपने पति की अनुगामिनी है. उसकी विशिष्टता यही है कि वह पूरी अनुगामिनी नहीं है. कभी-कभी उसे बेटी का पक्ष भी सही लगता है, लेकिन वह अपने पति से अलग जाने का साहस नहीं जुटा पाती. इस तरह, उपन्यास की नायिका सत्यवती, जैसी भी है, अपनी परिस्थितियों की उपज है. उपन्यास की सार्थकता इस बात में निहित है कि लेखक ने उन्हीं परिस्थितियों के बीच से उसे अपने लिए रास्ता भी निकालते चित्रित किया है. सत्यवती विद्रोहिणी है, अशिष्ट नहीं. वह बहुत सोच-समझकर, ठण्डे मन से अपने लिए रास्ता तलाश करती है. मुझे तो लगता है जैसे नंद जी आज की युवतियों से कहना चाहते हैं कि सही रास्ता यह है जो सत्यवती ने अपने लिए तलाशा है. वह अपनी राह भी चलती है, लेकिन न पिता को अस्वीकार करती है न मां को. नौकरी करती है तो पूरी निष्ठा से, और एक आदर्श अध्यापक के रूप में अपना दायित्व निर्वहन करती है. अपनी नौकरी में अन्याय को सहन नहीं करती, उसका प्रतिकार भी करती है, लेकिन अपने कर्तव्य से कभी मुंह नहीं मोड़ती. सूरज से प्रेम करती है, लेकिन उसके व्यवहार में कहीं भी छिछोरापन या हलकापन नज़र नहीं आता. मां-बाप और भाई के व्यवहार से आहत होती है, लेकिन उनके व्यवहार का समुचित विश्लेषण भी करती है और उनके प्रति मन में कोई कड़वाहट नहीं पनपने देती.
मैं उपन्यास को केवल सत्यवती की कथा के रूप में ही नहीं देखता. यह उपन्यास अपनी तरह से स्त्री विमर्श का उपन्यास है. अगर हम उपन्यास की तीन स्त्रियों को एक साथ रखकर देखें, तो गीता, सत्यवती और दुर्गा में हमें अपने भारतीय समाज स्त्री की बदलती छवि दिखाई देगी. यह सातत्य बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन इस उपन्यास का महत्व इतह्ने तक ही सीमित नहीं है. इस उपन्यास की कथा में मुझे और भी अधिक व्यापक निहितार्थ नज़र आते हैं. यह उपन्यास परंपरा और आधुनिकता के द्वन्द्व के बारे में हमारा नज़रिया साफ करता है. हमारा देश आज जिस मुकाम पर खड़ा है, जहां एक तरफ उसे अपना अतीत पुकार रहा है और दूसरी तरफ आगे बढती दुनिया की बहुत सारी आवाज़ें सुनाई दे रही हैं, वहां मुझे सत्यवती का यह चरित्र एक प्रकाश स्तंभ की तरह नज़र आता है. न तो हम अपने अतीत से बंधे रह सकते हैं, और न दूसरों के तलाशे रास्तों पर उनका अंध अनुकरण करते हुए चलकर किसी मंज़िल पर पहुंच सकते हैं. अपना रास्ता हमें खुद अपनी स्थितियों के अनुरूप बनाना होगा. यह है इस उपन्यास का संदेश.

इस उपन्यास की एक बहुत बड़ी ताकत इसकी भाषा और इसके जीवंत चित्र हैं. लेखक ने परिवेश को साकार करने का कोई मौका नहीं छोड़ा है. एक ही उदाहरण काफ़ी होगा: “लाजवंती के जाने के बाद गीता ने एक सरसरी नज़र से क्वार्टर का मुआयना किया. जिस बरामदे में वह खड़ी थी, उसके दाहिने हाथ की ओर रसोई थी और रसोई के ठीक सामने बांई ओर स्नानघर. इन दोनों के बीच बरामदे में खुलते दरवाज़ों के दो अलग-अलग कमरे थे और कमरों की सीध में बरामदे के पार खुला चौक था, जो तीन ओर से करीब छह फुट की ऊंचाई तक टीन की चद्दरों से घिरा हुआ था.” (पृ 69) ऐसा लगता है जैसे आप क्वार्टर के बारे में पढ़ नहीं रहे, उसे देख रहे हैं. नंद जी के कवि होने का प्रमाण तो इस पूरे उपन्यास में कहीं भी देखा जा सकता है. वे शब्दों का ज़रा-सा भी दुरुपयोग नहीं करते. कभी-कभी तो एक वाक्य में ही इतना कुछ कह जते हैं कि ताज़्ज़ुब होता है. मेरी बात पर विश्वास न हो तो इस उपन्यास का 13 वां अध्याय पढ़ें, और फिर इस अध्याय की अंतिम पंक्ति पर ध्यान दें : “उस रात पूरे इलाके में अच्छी बारिश हुई.” (पृ 75) और ऐसा भी नहीं है कि वे हमेशा कम शब्दों में ही अपनी बात कहते हैं. जब वे इस कृपणता से बाहर निकलते हैं तो उनका कौशल और भी निखर उठता है. एक बानगी देखें: “उन्होंने बल्ब की मद्धिम रोशनी में गीता की सांचे ढली अनावृत्त देह को पहली बार खुली आंखों से निहारा, उसके उमगते अंगों में कौंधती चमक देखी और अनबोली उमंगों को अपने आत्मिक स्पर्श से सहलाते हुए उस अधखुली लज्जा के अदृश्य बंधन खोल दिए.” (पृ 40). भाषा का यह लालित्य सत्यवती और सूरज के मिलने के अनेक प्रसंगों में भी देखा जा सकता है. एक छोटा-सा अंश उद्धृत करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं: “बाहर आसमान में गर्जना बढती जा रही थी और वर्षा ने भी शायद अपनी लय पकड़ ली थी. कुदरत के इसी संगीत के साथ अपना स्वर मिलाते हुए वे जाने कितनी देर बेसुध एक-दूसरे की सांसों में बंधे सोए रहे. उन्हें आज किनारे पहुंच जाने की कोई उतावली नहीं थी. इकसार हुए ज़मीन-आसमान में देर तक रह-रहकर कौंधती रही बिजलियां और भीगी हुई अमराइयों में झरता रहा अमृत सारी रात.” (पृ 202). उपन्यास में ऐसे अनेक स्थल हैं. लेकिन मैं जिस एक वाक्य पर मर मिटा हूं वह उपन्यास के अंत में आता है. बेटी और मां-बाप के बीच का मनोमालिन्य मिट जाने के बाद लेखक कहता है, “जीवन में पहली बार सत्यवती ने पिता की उजाड़ आंखों में एक नदी को उमड़ते देखा और उनके चेहरे की सलवटों में बहती अपनेपन की अथाह नमी.” (पृ 224) जिस क्रम में यह वाक्य आता है, और वहां इसे जो प्रभाव पैदा होता है, उसे खुद उपन्यास पढ़कर ही महसूस किया जा सकता है.
मुझे इस उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति लगी इसकी सहजता और साधारणता. आज बहुत सारी रचनाओं में जिस तरह के चकाचौंध और चमत्कृत करने वाले शिल्प और ऊबड़- खाबड भाषा का प्रयोग हो रहा है, और उनकी प्रायोजित प्रशंसाएं हो रही हैं, उनको ध्यान में रखें तो कहना पड़ेगा कि यह उपन्यास बेहद मामूली उपन्यास है. सीधी- साधी कहानी कही गई है और बेहद सहज भाषा है. लगभग वैसी ही जैसी आप हम बोलते हैं. कथा पूरी तरह समझ में आ जाती है. कोई उलझन नहीं है. लेकिन मुझे कहने की इज़ाजत दें कि ये ही बातें इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत हैं. बिना किसी उलझाव के अपनी बात कहना कितना मुश्क़िल होता है, इसे वे ही समझ सकते हैं, जिहोंने कभी कुछ कहने का प्रयास किया हो. इस सरलता और सादगी का मूल्य असल में उस काल में छिपा है जिस काल की कथा इस उपन्यास में है. छठे सातवें दशक की कथा, और वह भी राजस्थान के ग्रामीण अंचल की कथा अगर इस तरह नहीं कही जाती तो अनुचित ही होता.
आशा की जानी चाहिए कि हिंदी जगत इस महत्वपूर्ण उपन्यास का समुचित स्वागत करेगा.
◙◙◙

समीक्षित कृति:
आगे खुलता रास्ता (उपन्यास)
मूल, अनुवाद और पुनर्सृजन: नंद भारद्वाज
रचना प्रकाशन, 57,नाटाणी भवन, मिश्र राजाजी का रास्ता, चांदपोल बाज़ार, जयपुर-302001
संस्करण: 2009
पृष्ठ: 224 (सजिल्द)
मूल्य: 200.00
—————————————————-
समीक्षक संपर्क सूत्र:
ई-2/211, चित्रकूट, जयपुर- 302021.

Published November 15, 2009 Uncategorized Leave a Comment Edit


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