मुक्तिबोध रचना शिविर, राजनांदगांव

राजनांदगांव में मुक्तिबोध रचना शिविर : एक विरल अनुभव

महानगरों और प्रादेशिक राजधानियों के सुविधाजनक ठिकानों से निकलने वाली नयी रचनाशीलता की दावेदार साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रतिस्‍पर्धी दौर में किसी दूर-दराज के कस्‍बे या जिला मुख्‍यालय जैसी साधारण जगह पर कोई साहित्यिक आयोजन या सार्थक संवाद संभव कर लेना असंभव भले न सही, आसान अब नहीं रह गया है। पहली दिक्‍कत तो यही आती है कि इन स्‍थानों पर साहित्‍य के स्‍वनामधन्‍यों और बड़े रचनाकारों को जुटाया कैसे जाय, अगर किसी तरह भाग लेने के लिए मना भी लें तो उन्‍हें अच्‍छे परिहास में कैसे रखा जाए, ताकि नये रचनाकारों के बीच वे उन्‍हीं के धरातल पर सहजता से संवाद कायम रख सकें। ऐसी संस्‍थाओं के पास अनुभव और साधन तो सीमित होते ही हैं, उनके बारे में दुष्‍प्रचार करने वाले सोखी-दोखी भी कम नहीं होते। महानगरों के मसीहा खुद भले कुछ न करना चाहें, लेकिन छोटे शहरों की कोई दूसरी संस्‍था इस तरह के आयोजन का साहस कर ले, तो उन्‍हें उसमें बीस तरह की खामियां नजर आने लगती हैं और फिर आशंकाओं का तो कहना ही क्‍या? कुछ इसी तरह की अटपटी और विकट स्थितियों में छत्‍तीसगढ़ जैसे नवोदित राज्‍य के छोटे शहरों और कस्‍बों में पिछले कुछ सालों में साहित्‍य-संस्‍कृ‍ति के सुरुचिपूर्ण आयोजन करने वाली साहित्यिक संस्‍था प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान ने विगत 17 से 20 दिसंबर 2010 के बीच हिन्‍दी के प्रतिष्ठित कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कर्मस्‍थली राजनांदगांव में एक विलक्षण रचना शिविर आयोजित करने की परिकल्‍पना कर ही डाली।

कोई तीन महीने पहले इस रचना शिविर में शामिल होने के लिए जब मेरे सामने यह प्रस्‍ताव आया तो मैं खुद असमंजस में था। तब यह आयोजन 13, 14 और 15 नवंबर को बिलासपुर में आयोजित किये जाने का प्रस्‍ताव था और प्रस्‍तावित रूपरेखा के अनुसार भाग लेने वाले वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों में सीताकान्‍त महापात्र, अशोक वाजपेयी, राजेन्‍द्र यादव, केदारनाथसिंह, चंद्रकान्‍त देवताले, विश्‍वनाथप्रसाद तिवारी, प्रभाकर श्रोत्रिय, वीरेन डंगवाल, उदयप्रकाश, अनामिका जैसे कितने ही चर्चित नाम देखकर यह जरूर लगा कि ऐसे रचना‍ शिविर में भाग लेना निश्‍चय ही उपलब्धि होगी। प्रारंभ में यही कुछ सोचकर मैंने उसमें भाग लेने का मन बना लिया था। बाद में संयोजक जयप्रकाश मानस ने जब यह सूचना दी यह आयोजन किसी कारणवश प्रस्‍तावित तिथियों पर नहीं होगा और नई तिथियों की सूचना फिर से दी जाएगी, तो बात आई-गई होती लगी थी। इस सूचना के महीने भर बाद जब उन्‍होंने फिर सूचना दी कि अब यह आयोजन 17 से 20 दिसंबर के बीच राजनांदगांव में होगा, तो मेरे लिए यह इस लिहाज से और भी महत्‍वपूर्ण हो गया कि वह मुक्तिबोध की कर्मभूमि पर होने जा रहा था, जहां मैं पिछले कई सालों से जाने का सपना संजोए हुए था। मैंने मानसजी को तुरंत  अपनी स्‍वी‍कृति से अवगत करा दिया और इस अवसर पर प्रकाशित की जानेवाली उनकी पत्रिका ‘पांडुलिपि’ के लिए मुक्तिबोध पर अपना आलेख भी भेज दिया। इस आलेख पर उनकी सकारात्‍मक प्रतिक्रिया ने मेरे हौसले को और बढा दिया। आयोजन की निर्धारित रूपरेखा के अनुसार मुझे उसमें एक सत्र को संबोधित भी करना था, सो मैं उसी  की तैयारी में जुट गया। बीच में कुछ निजी कारणों से ऐसा भी लगा कि शायद मैं न जा पाऊं और मैंने मानस को फोन पर अपनी कठिनाई से अवगत भी करा दिया। लेकिन जब मेरी इस बात से वे थोड़ा निराश लगे और यह भी लगा कि मेरी इस असमर्थता को वे बहाना मान रहे हैं, जैसे मैं किसी और के बहकावे में आकर वहां जाने से बच रहा हूं – तो मैंने अपनी कठिनाई के बावजूद तुरंत आयोजन में पहुंचने का मन बना लिया और उन्‍हें आश्‍वस्‍त भी कर‍ दिया। इस सहमति के बाद जब रेल टिकट के बारे में पता किया तो ज्ञात हुआ कि निर्धारित तिथि का रेल्‍वे आरक्षण उपलब्‍ध नहीं है, मैंने हवाई यात्रा से रायपुर पहुंचने का निश्‍चय कर लिया। ऐसा तय करते हुए इस बात के लिए भी तैयार हो गया था कि मैं आयोजन की निर्धारित व्‍यवस्‍था के अनुसार सिर्फ रेल यात्रा का ही मार्ग-व्‍यय ग्रहण करूंगा।

अपनी इस यात्रा में 15 दिसंबर को मुझे दिल्‍ली के साहित्यिक मित्रों के बीच ‘एक कवि एक शाम’ कार्यक्रम में काव्‍य-पाठ करना था और अगले दिन 16 दिसंबर की सर्द सुबह साढ़े छह बजे दिल्‍ली से रायपुर के लिए रवाना होना था। तय कार्यक्रम के अनुसार मैं सुबह साढ़े आठ बजे रायपुर पहुंच गया। विमान जब इस नगर के आकाश पर पहुंचा तो नीचे का नजारा देखने लायक था। नगर के बीचो-बीच दूर से दिखते छोटे-छोटे तालाब और जलाशय अनायास यह आश्‍वस्ति दे रहे थे कि इस जमीन पर जल का कोई अभाव नहीं है। शायद यह बात मुझ सरीखे मरुस्‍थलीय हलके के व्‍यक्ति के लिए और भी महत्‍व रखती है। एयरपोर्ट पर स्‍वयं मानस मुझे रिसीव करने के लिए मौजूद थे। दोपहर तक यहीं एक अतिथिगृह में विश्राम करने के बाद अपरान्‍ह 3 बजे मैं मानस और उनकी टीम के साथ कार से राजनांदगांव के लिए रवाना हो गया। इसी रास्‍ते पर देश का सबसे बड़ा इस्‍पात केन्‍द्र भिलाई आता है, जिसकी गगनचुंबी चिमनियां दूर ही दीखने लगी थीं। जाने क्‍यों भिलाई से गुजरते हुए अनायास बरसों पहले यहीं एक अप्रिय शहादत के शिकार श्रमिक नेता शंकरगुहा नियोगी और हाल ही में आदिवासियों के प्रति सहानुभूति रखने के कारण चर्चा में आए डॉ विनायक सेन की याद ताजा हो आई। इस दुखद स्‍मृति के साथ ही मन में एक अव्‍यक्‍त-सी उदासी भर आई। अपनी इस स्‍मृति और अहसास को मन ही में घुलाते मैं मौन भाव से इस औद्योगिक नगरी से गुजर गया और थोड़ी ही देर में हम दुर्ग होते हुए सूर्यास्‍त से पहले अपने गंतव्‍य स्‍थल राजनांदगांव पहुंच गये।

आम बोल-चाल में इस कस्‍बे का पूरा नाम प्राय: कम ही लोग लेते हैं, उनका काम नांदगांव से ही चल जाता है, जो शायद पहले कभी गांव ही रहा हो। लेकिन अब तो यह अच्‍छे खासे शहर की शक्‍ल अख्तियार कर चुका है। शहर के बीचो-बीच से गुजरते नेशनल हाईवे पर इन दिनों फ्‍लाई-ओवर बनने का काम तेजी से जारी है। इस हाईवे ने पूरे कस्‍बे को दो भागों में बांट दिया है। रायपुर से पश्चिम दिशा की ओर कोई 70 किलो- मीटर की दूरी पर स्थित यह जिला मुख्‍यालय, छत्‍तीसगढ़ राज्‍य का एक संवेदनशील हलका माना जाता है।

आयोजन स्‍थल सिन्‍धु भवन पहुंचने पर वहां मौजूद कई स्‍थानीय साहित्‍यकारों और कार्यकर्त्‍ताओं से परिचय हुआ। सबसे मुलाकात के बाद रात्रि-विश्राम के लिए मुझे स्‍थानीय राजकीय विश्राम-गृह पहुंचा दिया गया। यहां पहुंचने के बाद मेरी पहली इच्‍छा यही थी कि मैं जल्‍द-से-जल्‍द उन स्‍थानों को अवश्‍य देख आऊं, जिनका मेरे प्रिय कवि मुक्तिबोध के जीवन और कविताओं से गहरा संबंध रहा है। अपनी इसी इच्‍छा को मन में दोहराते उस दो-मंजिले विश्राम-गृह की बालकनी से मैं हल्‍की ठंड के बावजूद रात्रि के स्‍याह अंधेरे में देर तक नांदगांव की झिलमिलाती रौशनियां और अपनी स्‍मृति में अंकित मुक्तिबोध की कविताओं के अनेकानेक बिम्‍ब याद करता रहा, जो बरसों से मेरे अवचेतन में घूमते रहे हैं। अगले दिन अपरान्‍ह 4 बजे इस रचना शिविर की विधिवत शुरुआत होनी थी। उस लिहाज से 17 दिसंबर के शुरुआत का तीन-चौथाई दिन सहज ही मेरे पास भ्रमण के लिए उपलब्‍ध था। मैं रात को सोने से पहले ही मन में यह निश्‍चय कर चुका था कि सुबह उठते ही पहला काम यही कर लेना है। उसी रात से प्रतिभागी रचनाकारों का भी आने का सिलसिला जारी था, जो अगली शाम तक जारी रहा। सवेरे उसी अभियान पर निकलने से पहले कुछ देर के लिए मैं सिन्‍धु भवन आया तो बाहर से आ रहे कई लेखकों से मुलाकात हुई – मसलन सागर से आये बुजुर्ग साहित्‍यकार प्रो श्‍यामसुन्‍दर दुबे, गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र और तिरुअनंतपुरम् से आई रति सक्‍सेना मुझे पहले ही दौर में मिल गये थे। जब उन्‍हें मेरे भ्रमण कार्यक्रम का पता चला तो बुद्धिनाथ और रति भी साथ चलने को तैयार हो गये। हम तीनों नाश्‍ता करने के तुरंत बाद मुक्तिबोध के निवास, उनके कार्य-स्‍थल दिग्विजय कॉलेज और उन स्‍थलों को देखने निकल पड़े, जिनका उनके जीवन और रचना-संसार से गहरा रिश्‍ता रहा है।

मुक्तिबोध अपने जीवन के अंतिम दिनों तक जिस दिग्विजय कॉलेज में पढ़ाते रहे थे, उसी कॉलेज के पश्चिमी छोर पर मुख्‍य द्वार के पास बना एक छोटे-सा दो-मंजिला भवन उनका निवास रहा था। राज्‍य सरकार ने इसी निवास को मुक्तिबोध स्‍मृति संस्‍थान और त्रिवेणी संग्रहालय के रूप में संरक्षित कर लिया है, जिसमें मुक्तिबोध के ही समकालीन दो वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों स्‍व पदुमलाल पुन्‍नालाल बक्षी और बल्‍देवप्रसाद मिश्र की कृतियों, उनकी हस्‍त-लिपियों, दुर्लभ चित्रों और स्‍मृति चिन्‍हों को संग्रहीत कर लिया गया है। उस दिन ईदुल-जुहा के कारण कॉलेज बंद था, लेकिन संग्रहालय जरूर खुला था। हम प्रात 11 बजे जब यहां पहुंचे तो संग्रहालय के निकट ही लगी तीनों वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों की प्रतिमाओं के पास खुले स्‍थान पर शामियाना लगाया जा रहा था, जहां सायं 4 बजे रचना शिविर का उदघाटन समारोह आयोजित किया जाना था।

संग्रहालय के स्‍वागत कक्ष में हमारी मुलाकात एक बु‍जुर्ग-से सज्‍जन से हुई जो राज्‍य सरकार के ही राजस्‍व विभाग के सेवा-निवृत्‍त कर्मचारी थे और अब इस संग्रहालय के स्‍वागत अधिकारी का काम देख रहे थे। ऊपर-नीचे के इन्‍हीं चार कमरों में तीनों साहित्‍यकारों से संबंधित पुस्‍तकों, हस्‍तलिपियों और उनके चित्रों को सजाया गया है। संभवत इसी संस्‍थान के सही विकास और उसके बेहतर उपयोग की दृष्टि से इस भवन के पास ही राज्‍य सरकार ने एक नया ‘सृजन-संवाद’ भवन भी बनवाया है, जिसमें संदर्भ-सामग्री के संग्रह, आम लोगों के लिए वाचनालय, संगोष्‍ठी-कक्ष और लेखकों-शोधार्थियों के लिए आवास-कक्ष बनवाये गये हैं, लेकिन उचित रख-रखाव के अभाव में दो साल पहले बना यह नवनिर्मित भवन अब उजाड़-सा पड़ा है। सुरक्षा के अभाव में कुछ उठाईगीर इस भवन में से दरवाजों के कुंदे, बिजली के उपकरण (पंखे, ट्यूब-लाइटें-स्विच आदि) और बाथरूम की फिटिंग्‍स तक उखाड़कर ले गये हैं। पूछने पर जानकारी मिली कि अब सरकार ने उसकी रखवाली की व्‍यवस्‍था की है और दुबारा कुछ राशि स्‍वीकृत कर उसे फिर से तैयार करवाया जा रहा है।

इसी कॉलेज परिसर में रियासती जमाने के बने दो तालाब (रानी सागर और बूढ़ा सागर) हैं, जिनमें बारहों महीने जल भरा रहता है। कहते हैं, रियासती जमाने में स्‍थानीय राजघराने की स्त्रियां इसी रानीसागर में जल-क्रीड़ाएं करती थीं, इसीलिए इस जल को साफ सुथरा रखने पर पूरा ध्‍यान दिया जाता था, लेकिन आजकल ये जल-स्रोत स्‍थानीय जनता के लिए सार्वजनिक नहानघर हो गया है, जहां बस्‍ती की स्त्रियां और शहर के धोबी इस जल को कपड़े धोने के काम में लेते हैं। इन तालाबों के किनारे कुछ पुरानी शैली के मंदिर और मस्जिद भी हैं, जो आम लोगों को धर्मभीरू बनाये रखने में अपनी पारंपरिक भूमिका निभा रहे हैं। यही तालाब और पर्यावराण मुक्तिबोध की कविताओं में सहज ही रेखांकित किया जा सकता है। मैं जिस विश्राम-गृह में रुका हुआ था, वह भी संयोग से इसी रानीसागर के किनारे पर स्थि‍त था, जो अनायास ही रात के अंधेरे में मुझे उन कविताओं में वर्णित भूगोल की तरफ खींच ले जाता था। कॉलेज की इमारत का स्‍थापत्‍य भी कुछ इसी वातावरण का अटूट हिस्‍सा लगता है, जो रियासती जमाने में स्‍थानीय शासकों ने अपने बचाव के लिए एक किले के रूप में बनवाया था। 1947 में जब देश आजाद हुआ और रियासती शासन समाप्‍त हो गया तो राजा दिग्विजयसिंह ने अपना यश बरकरार रखने के लिए इसे एक शिक्षण संस्‍थान का रूप दे दिया और उन्‍हीं के नाम से यह अब दिग्विजय कॉलेज के रूप में प्रसिद्ध है।

इसी कॉलेज के त्रिवेणी परिसर में अपरान्‍ह 4 बजे मुक्तिबोध स्‍मृति रचना शिविर का उदघाटन कार्यक्रम सम्‍पन्‍न होना था। भ्रमण और भोजन के उपरान्‍त नियत समय पर सभी प्रतिभागी रचनाकार समारोह स्‍थल पर पहुंच गये। यह देखकर अच्‍छा लगा कि इस समारोह में रचनाकारों के अलावा बड़ी संख्‍या में राजनांदगांव नगर के नागरिक और साहित्‍यप्रेमी उत्‍साह से भाग लेने के लिए उपस्थित थे। समारोह के आरंभ में संयोजक की घोषणा से ही पहली बार यह बात मेरी जानकारी में आई कि मुझे इस आयोजन में मुख्‍य अतिथि के रूप में मंच पर बैठना है और जाहिर है उसी रूप में अपना उदबोधन भी देना है। यों मंच पर अध्‍यक्ष के रूप में राज्‍य पुलिस के महानिदेशक और वरिष्‍ठ साहित्‍यकार विश्‍वरंजनजी के उपस्थित रहने की तो जानकारी पहले से थी ही, बाकी हल्‍का-सा अनुमान था कि कुछ वरिष्‍ठ लोग शायद और भी रहें। वे मंच पर रहे भी – खासतौर से स्‍थानीय वरिष्‍ठ साहित्‍यकार शरद कोठारी, प्रो श्‍यामसुंदर दुबे, बुद्धिनाथ मिश्र, श्रीप्रकाश मिश्र, रति सक्‍सेना और युवा कवि जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव की उपस्थिति ने निश्‍चय ही समारोह को गरिमापूर्ण बना दिया। हालांकि वक्‍ता के रूप में प्रो अशोक संघई और शरद कोठारी जी को स्‍वागत भाषण देना था, मुझे मुख्‍य अतिथि के रूप में उदघाटन भाषण और विश्‍वरंजनजी को अपना अध्‍यक्षीय उदबोधन। सभी वक्‍ताओं ने नपे-तुले शब्‍दों में अपनी बात कही और निर्धारित समय-सीमा में कार्यक्रम सम्‍पन्‍न हो गया। कार्यक्रम के अंत में बस्‍तर के लोक-कलाकारों ने अपना पारंपरिक मांगलिक मोहरी वादन प्रस्‍तुत कर सभी आगंतुकों को उस अंचल की लोक-संवेदना से अनायास ही जोड़ लिया।

उदघाटन के बाद उसी रात्रि से सिन्‍धु भवन में रचना शिविर के विभिन्‍न कार्यक्रमों की विधिवत शुरुआत हो गई। पहले कार्यक्रम के रूप में राजनांदगांव के स्थानीय रचनाकारों के काव्य पाठ का आयोजन हुआ, जिसमें शंकर सक्सेना, अब्दुल सलाम कौसर, प्रोफेसर कृष्ण कुमार द्विवेदी, दाऊलाल जोशी, डॉ शंकर मुनिराय, आत्माराम कोशा, आभा श्रीवास्तव, राजेश गुप्ता, गिरीश ठक्कर आदि ने अपनी रचनाएं पढ़ीं।

अगले दिन 18 दिसंबर को सुबह 9-30 बजे से जिन विचार-गोष्ठियों की शुरुआत हुई, उनमें प्रथम गोष्‍ठी के रूप में ‘रचना की दुनिया और दुनिया की रचना’ विषय पर श्रीप्रकाश मिश्र और नंद भारद्वाज ने अपना वक्‍तव्‍य प्रस्‍तुत किया। दोनों वक्‍ताओं ने समकालीन हिन्‍दी लेखन की समृद्ध विरासत, उसके वर्तमान स्‍वरूप, रचना में यथार्थ और कल्‍पना तथा नयी रचनाशीलता में लक्षित बदलावों पर विस्‍तार से चर्चा की। चर्चा में रति सक्‍सेना, आनंद कृष्‍ण, शंकर सक्‍सेना और कई युवा रचनाकारों ने भाग लिया। दूसरे सत्र में ‘रचना और भारतीयता’ विषय पर डॉ रोहिताश्‍व ने जहां साहित्‍य की विशाल परंपरा में भारतीयता की पहचान को रेखांकित किया वहीं युवाकवि जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव ने नयी रचनाशीलता और लोक-तत्‍वों के माध्‍यम से भारतीयता की पहचान पर विशेष बल दिया।  तीसरे सत्र में प्रो श्‍यामसुन्‍दर दुबे और रति सक्‍सेना ने ‘रचना और प्रजातंत्र’ विषय पर अपने सारगर्भित वक्‍तव्‍य प्रस्‍तुत किये। इसी प्रकार तीन दिन तक चली विचार-गोष्ठियों के क्रम में रचना और मनुष्‍यता का संकट, रचना और संप्रेषण, शब्‍द समय और संवेदना, कविता की अद्यतन यात्रा, कविता में छंद और लय, समकालीन लेखन में महिला, दलित और आदिवासी, समकालीन हिन्‍दी कहानी, हिन्‍दी आलोचना के स्‍वरूप और ललित निबंधों पर जहां वरिष्‍ठ रचनाकारों ने अपने आधार वक्‍तव्‍य प्रस्‍तुत किये वहीं युवा रचनाकारों और अन्‍य प्रतिभागियों ने उन पर अपने मौलिक विचार प्रस्‍तुत कर इस त्रिदिवसीय आयोजन को अपनी वैचारिक ऊष्‍मा से समृद्ध बनाया।

इन विचार गोष्ठियों में श्रीप्रकाश मिश्र, श्‍यामसुन्‍दर दुबे, बुद्धिनाथ मिश्र, रोहिताश्‍व, रति सक्‍सेना, रघुवंश मणि, प्रफुल्‍ल कोलख्‍यान, जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव, श्रीराम परिहार और नंद भारद्वाज ने जहां मार्गदर्शक साहित्‍यकार के रूप में अपनी सहभागिता निभाई वहीं छत्‍तीसगढ़ के प्रमुख  साहित्‍यकारों में डॉ बल्‍देव, अशोक संघई, राम पटवा, रवि श्रीवास्‍तव, प्रो चित्‍तरंजन, कमलेश्‍वर साहू, नासिर अहमद सिकंदर, कोलकाता से आये कथाकार बिमलेश त्रिपाठी, भुवनेश्‍वर से आये दिनेश माली, महंतकुमार शर्मा जैसे युवा रचनाकारों ने अपने सटीक प्रश्‍नों और टिप्‍पणियों के माध्‍यम से इस विमर्श को नयी अर्थवत्‍ता प्रदान की।‍ यद्यपि विचार-गोष्ठियों में यह बात जरूर अनुभव की गई कि कुछ विद्वान अपनी बात को सटीक और सारगर्भित तरीके से प्रस्‍तुत करने के कम अभ्‍यस्‍त हैं। अक्‍सर उनके वक्‍तव्‍य मूल विषय से थोडे अवांतर, बोझिल और कुछ हद तक दोहराव के भी शिकार पाये गये, लेकिन इन छोटी कमियों के बावजूद उनकी ईमानदारी, परिश्रम और साहित्‍य के प्रति उनकी निष्‍ठा में शायद ही कोई कमी-कमजोरी महसूस की गई हो। इन सभी लोगों से रूबरू संवाद और अनौपचारिक चर्चाएं इस आयोजन की अनूठी उपलब्धि कही जा सकती है, जो महानगरों और साहित्‍य के बड़े ठिकानों में विरल होती जा रही है।

रचना शिविर की दूसरी रात्रि जहां बाहर से आये वरिष्‍ठ रचनाकारों के काव्‍य-पाठ पर केन्द्रित रही वहीं तीसरी रात्रि को प्रतिभागी युवा रचनाकारों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इन युवा रचनाकारों में श्रीमती शैल चन्‍द्रा, शोभा शर्मा, प्रदीप देशमुख, सुमन शर्मा, अशोक बर्डे, ज्‍योति द्विवेदी, हाशम बेग आदि की कविताएं विशेष उल्‍लेखनीय रहीं। इस आयोजन की खूबी यह थी कि शिविर में आये वरिष्‍ठ रचनाकारों की प्रत्‍येक कविता पर अपनी समीक्षात्‍मक टिप्‍पणी प्रस्‍तुत करते हुए उनकी रचनाशीलता के संबंध में उपयोगी सुझाव भी दिये।

शिविर के अंतिम दिन 20 दिसंबर को अपरान्‍ह वरिष्‍ठ साहित्‍यकार विश्‍वरंजन की अध्‍यक्षता में आयोजित समापन समारोह में अतिथि साहित्‍यकारों को शॉल, श्रीफल और स्‍मृति चिन्‍ह प्रदान कर सम्‍मानित किया गया। इसी अवसर पर मुक्तिबोध के मित्र रचनाकार शरद कोठारी और गीतकार शंकर सक्सेना को उनके साहित्यिक अवदान के लिए प्रमोद वर्मा स्मृति अलंकरण से सम्मानित किया गया। इस आयोजन की कामयाबी में संस्थान के कार्यकारी निदेशक जयप्रकाश मानस, कमलेश्वर साहू,  बीएल पाल,  डी एस अहलूवालिया, सुरेश छत्री, शांति स्वरूप शर्मा  आदि का उल्लेखनीय योगदान रहा।

इस आयोजन की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि राजनांदगांव जैसी जगह पर बीस से अधिक वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों और सौ से अधिक युवा रचनाकारों की जीवंत उपस्थिति और हर गोष्‍ठी में उनकी सक्रिय भागीदारी से यह बात पुष्‍ट होती है कि दूर-दराज के क्षेत्रों में साहित्‍य और नये रचनाकर्म को लेकर आज भी लोगों के उत्‍साह और उत्‍सुकता में कोई कमी नहीं आई है, शायद यही कारण है कि मध्‍य भारत का यह दूरस्‍थ इलाका हिन्‍दी की ऊर्जावान रचनाशीलता के लिए आज भी एक मिसाल माना जाता है और यह अनायास नहीं है कि इसी रचनाशीलता के बीच से मुक्तिबोध, श्रीकान्‍त वर्मा, अशोक वाजपेयी, प्रमोद वर्मा, धनंजय वर्मा, विनोदकुमार शुक्‍ल, एकान्‍त श्रीवास्‍तव जैसी रचनात्‍मक प्रतिभाएं आज हिन्‍दी संसार का गौरव मानी जाती है। अपने प्रिय कवि की कर्मभूमि पर आयोजित ऐसे सार्थक उपक्रम में भाग लेना मेरे लिए किसी विरल अनुभव से कम नहीं था।

nandbhardwaj@gmail.com

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2 Responses to “मुक्तिबोध रचना शिविर, राजनांदगांव”


  1. 1 Monika Jain April 29, 2011 at 8:04 pm

    Aaj aapko pada kavitakosh.org me to laga ki Nand Bhartdwaj ka vyaktitv panchtatv ki kya me nahi balki Nand ke shabdo me samaya hai. Meri soch sahi nikli is Nandanvan me shabdon ke phool bhawnao ki khushbu bikherte hai. Aapko kavitakosh me padna ek sukhad anubhav raha aur ummid karti hu ki aap chand aisi kavitaye bhi likhenge jinme urdu aur hindi ki mehak ek saath hogi.

    Aapko padne ki abhilashi
    Monika

    • 2 nandbhardwaj April 29, 2011 at 8:24 pm

      कोई आत्‍मीय पाठक जब यह कहता है कि मेरी रचनाओं को पढना अच्‍छा लगा, उससे एक आत्मिक सुख की अनुभूति होती है, कहीं अपना लिखा अर्थवान लगने लगता हे, और बेहतर लिखने का उत्‍साह मिलता है और सबसे अलहदा ये बात कि एक जीवंत इन्‍सान से रिश्‍ता बनता है। उसकी आत्‍मीयता मन को सुख देती है। आभार।
      नंद भारद्वाज।


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