कहानी

            अपने अपने अरण्य           

रे-भरे पेड़ों और झाड़ियों से ढंकी पहाड़ियों से घिरे इस विशाल जंगल के एक छोर पर बसी इस छोटी-सी बस्ती में जब सवेरे की पहली किरण अपनी आंख खोलती है, तो यहां के ठहरे हुए जीवन में एक हलचल-सी आरंभ होती है। बीती रात की अच्छी बारिश के बाद सवेरे तक जारी बूंदा-बांदी अब थम गई थी। भूरे-मटमैले बादलों की आवाजाही के बावजूद आकाश मौन था। हल्की आवाज के साथ बस के आकर रुकते ही आस-पास की थड़ीनुमा दुकानों से निकलकर लोग बस को घेरकर खड़े हो गये थे।

बस्ती के नाम पर नेशनल पार्क के लिए बनाए गये कुछ भवन और दूसरे मकानात ही दिखाई देते हैं। उन्हीं को घेरे खड़ी पहाड़ियां और चारों ओर का जंगल एक अलग ही तरह का वातावरण बनाते हैं। सुनसान जंगल में खड़ी इन इमारतों में कृषि, पशुपालन, स्वास्थ्य विभाग, बिजली, पानी, डाकतार जैसे ऑफिस हैं और दो वन-विभाग के गैस्ट-हाउस, जिनमें ज्यादातर तो सरकारी विभागों के अधिकारी ही ठहरते हैं। कभी-कभार कोई भूला-भटका सैलानी भी आ जाता हैं, जिसे कहीं और पनाह नहीं मिलती। थोड़े-बहुत कच्चे मकान हैं, जिनमें ग्रामवासी रहते हैं, जो पहले कभी इन्हीं पहाड़ियों के बीच बसे गांवों में अपना गुजर-बसर करते थे। बस्ती में एक प्राथमिक स्कूल है और एक डाकखाना भी, जो यहां के कर्मचारियों और निवासियों की सुविधा के लिए बनवाया गया है। पार्क के मुख्य-द्वार के सामने से गुजरती इस खुली सड़क का एक सिरा आगे जाकर राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ जाता है और दूसरा पास ही के जिला मुख्यालय से। सड़क पर दिन भर वाहनों की आवा-जाही बनी रहती है। इस रूट पर चलने वाली ज्यादातर बसें और यात्री-वाहन पार्क आने-जाने वाले सैलानियों से ही भरे होते हैं, जिन्हें इसी मुख्य-द्वार पर लाकर उतार दिया जाता है और वापस लौटने वाले भी इसी द्वार के पास बने शेड के नीचे या सड़क के उस पार की कच्ची थड़ियों और ढाबों के आस-पास बैठकर वाहनों का इंतजार करते हैं।

रुकी हुई बस के बीच वाले गेट से एक-एक कर उतरती सवारियों के बीच अपने ढीले-ढाले लिबास को सम्हाले जब मानसी ने सामने खड़े लोगों पर नज़र दौड़ाई तो उसे मुस्कुराकर हाथ हिलाते रोहित दिख गये थे। उसने भी अभिवादन में अपना दाहिना हाथ ऊपर उठा दिया था और अगले ही क्षण वह बस से नीचे उतर आई थी। रोहित के साथ खड़े वनकर्मी ने आगे बढ़कर उसका सूटकेस और बैग अपने हाथों में सम्हाल लिया था और सामान लेकर वह रोहित से कुछ कदमों की दूरी पर जाकर रुक गया था। बस से उतरकर मानसी सीधे रोहित के सामने आ खड़ी हुई थी – उसके मुस्कुराते चेहरे के पार कुछ और भी तलाश करती हुई-सी। उसे अपने इतने करीब पाकर रोहित ने अनायास पूछ लिया था, ‘‘कैसी हो मानसी?’’

‘‘जी…. कैसी हो सकती हूं आपके बगैर?’’ हल्की मुस्कुराहट के साथ यकायक निकल आए इस सवालिया जवाब में जैसे उसने बहुत-कुछ कह दिया था। सुनकर एकबारगी  अचकचा गया था रोहित।

‘‘मेरा मतलब…. रास्ते में कोई तकलीफ तो नहीं हुई?’’ अपने को सम्हालते हुए उसने बात आगे बढ़ाई।

‘‘नहीं, तकलीफ कैसी…. ये तो पूरा रास्ता ही इतना खूबसूरत है और फिर सुबह की बारिश ने इसे और भी खुशगवार बना दिया….।’’

‘‘इसीलिए तो सैलानी ऐसे ही मौसम में यहां आना पसंद करते हैं। …वैसे घर चलना पसंद करोगी या….’’ पूछते हुए रोहित के स्वर में शरारत थी या परिहास, वह ठीक से पकड़ नहीं पाई। बस हल्की-सी उदासी के साथ इतना ही कह पाई – ‘‘जहां आप ठीक समझें!’’

उसे लगा, मानसी बुरा मान गई। तुरंत अपनी भूल सुधारते हुए बोल पड़ा, ‘‘ओ के बाबा,  ….आय एम सॉरी! ….सामान क्वार्टर ले चलो कुंजन।’’ उसने अपने से थोड़ी दूरी पर खड़े वनकर्मी को निर्देश दिया और वे दोनों पैदल ही अपने घर की ओर चल पड़े, जो ज्यादा दूर नहीं था, बल्कि सामने ही दीख रहा था।

रोहित चालीस की उम्र पार करता दरम्याना कद-काठी का हंसमुख इन्सान था, जिसे वन अधिकारी के रूप में इस छोटी-सी बस्ती के कर्मचारी और निवासी ही नहीं, जंगल के जानवर भी उसी लगाव से जानते थे। रास्ते में जो भी मिलता, उससे हंसकर दुआ-सलाम जरूर करता।

मानसी को यह देखकर अच्छा लगा कि उसका बंगला खूब खुला-खुला और साफ- सुथरा था। घर के आगे हरी घास का लॉन और चहारदीवारी के पास ऊंचे-ऊंचे अशोक और मोरपंखी के पेड़ थे। अंदर के कमरों का एक बार मुआयना कर लेने के बाद वह हाथ-मुंह धोने बाथरूम की ओर चली गई और रोहित उसका सामान लेकर बैडरूम में। जब वे वापस बैठक में आए,  तब तक सेवक गोपाल चाय बनाकर ले आया था। हाथ-मुंह धो लेने से वह भी कुछ तरो-ताजा महसूस करने लगी थी। अभी कपड़े नहीं बदले थे, अलबत्ता जूड़े में बंधे हुए बालों को जरूर खोल दिया था, जिससे घने काले बालों के बीच सलोना चेहरा और निखर आया था। चाय का प्याला उठाकर पहला घूंट लेते हुए उसी ने बात शुरू की थी – ‘‘और आप कैसे हैं?’’

‘‘बस जैसा हूं, तुम्हारे सामने हूं…. खुद ही जान लो।’’ वह नहीं जान पाई कि वह खुश है या उसी की तरह भीतर से उन्मन।

‘‘और कौन लोग रहते हैं, यहां आपके आस-पास?’’

‘‘बहुत लोग हैं, पार्क का स्टाफ है, गांववासी हैं, गोपाल है…. और तमाम तरह के जानवरों से भरा यह जंगल…..।’’

रोहित ने उसी तरह हास-परिहास के जरिए वातावरण को हल्का-फुल्का रखने की कोशिश की,  लेकिन मानसी,  कुछ और जानने की गरज से उसी की ओर देखती रही।

‘‘बच्चे कैसे हैं?’’ थोड़ा संजीदा होते हुए रोहित ने पूछ लिया था।

‘‘अच्छे हैं, लेकिन तुम्हें बहुत मिस करते हैं…. मैं उन्हें क्या समझाऊं रोहित? अब वे बड़े हो रहे हैं…. क्या तुम्हें उनकी याद नही आती?’’ यही पूछते हुए यकायक उदास हो गई थी, मानसी।

‘‘आती क्यों नहीं, …इसीलिए तो पूछ रहा हूं। …अपने काम की कुछ मजबूरियां हैं… आये दिन जंगल में जानवरों के मारे जाने की घटनाएं हो रही हैं, जिनकी वजह से काम अचानक बढ़ गया है… लेकिन उम्मीद है, जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा। …और कैसी चल रही है उनकी पढ़ाई वगैरह?’’

‘‘वैसे तो ठीक चल रही है…. बस आपके लिए जब पूछने लगते हैं,  तो समझाना मुश्किल हो जाता है…. फिर कोशिश करती हूं…’’  बोलते-बोलते वह अचानक रुक गई थी। उसे लगा कि वह इस तरह ज्यादा देर तक निरपेक्ष रहकर बात नहीं कर पाएगी।

‘‘खैर चिन्ता की कोई बात नहीं, मैं खुद जल्दी ही आऊंगा बच्चों के पास।’’ वह बात को समेटते हुए जैसे उठने की तैयारी में था।

‘‘यानी, अभी वापसी में मेरे साथ नहीं चलेंगे?  पूछते हुए थोड़ी रुआंसी-सी हो आई थी मानसी,  लेकिन फिर तुरंत अपने को सम्हाल लिया।

‘‘देखता हूं…. बात करनी होगी हैड-ऑफिस से।’’  कहते हुए रोहित अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ था।

रोहित के व्यवहार में आए इस ठंडे बदलाव से मानसी थोड़ी चिन्तित हो उठी थी। लगा कि उसके मन में पिछली बातों का तनाव अभी खत्‍म नहीं हुआ है। वह खुद अपनी उलझनों से बहुत संतप्त रहती आई है और नहीं चाहती कि उसका कोई अपना उसी की तरह आत्म-संताप से पीड़ित रहे। अनिकेत ठीक ही कहते हैं, कई बार आवेश के क्षणों में हम अपना संतुलन खो बैठते हैं। जीवन के छोटे-छोटे संदेह हमारे समूचे जीवन-विवेक और अनुभव पर भारी पड़ जाते हैं और जब हमें इस बात का अहसास होता है, हम अपने समय और संबंधों का पर्याप्त नुकसान कर चुके होते हैं। अपने पत्रों में वह बार-बार रोहित को यही समझाने की कोशिश करती रही कि उनके बीच की उलझनों का असर बच्चों पर न पड़े, लेकिन यह सब अकेले उसके हाथ में तो नहीं। अपने पिछले पत्र में तो उसने समूचे प्राण ही उड़ेल दिये थे, उसके बावजूद जब रोहित घर नहीं लौटा और न ही उसका कोई जवाब आया, तो उसे लगा कि वह उसे खो देगी। उसे खुद से ज्यादा अपने बच्चों की फिक्र थी, जो अपने पिता को बेहद प्यार करते थे और जिन्हें उनकी सख्त जरूरत थी। इस दौरान अनिकेत जब भी मिले, उसे यही सलाह देते रहे कि वह फौरत खुद जाकर बात करे। पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे माध्यम के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती, चाहे वह कितना ही अजीज और आदरणीय क्यों न हो। अगर अनिकेत ने इतना आग्रह न किया होता तो शायद आज वह यहां न होती और न रोहित के स्वभाव में आ रहे इस बदलाव को ही जान पाती।

‘‘तुम चाहो तो थोड़ी देर आराम कर लो, मैं तब तक ऑफिस का कुछ जरूरी काम निपटाकर आता हूं। दोपहर का खाना हम साथ खाएंगे और अगर कुछ नाश्‍ता करना हो तो गोपाल को बता देना, वह बना देगा।’’ यह कहते हुए रोहित बाहरी दरवाजे की ओर बढ़ गये थे और वह उसी तरह अपनी जगह पर बैठी उसका जाना देखती रही। उसकी चाय कब की खत्म हो चुकी थी,  लेकिन खाली प्याला अब भी उसके हाथ में मौजूद था। वह उसी तरह सोच में डूबी रही। कुछ देर बाद उसे लगा कि कोई उसके पास खड़ा उससे कुछ पूछ रहा है। जब वह अपनी संज्ञा में लौटी तो सामने गोपाल को खड़ा पाया, जो उससे खाली प्याला मांगते हुए पूछ रहा था, ‘‘थोड़ी और चाय बना दूं मेमसाब!’’

‘‘नहीं गोपाल, बस रहने दो।’’

‘‘जी मेमसाब।’’ छोटा-सा उत्तर देकर उसने मानसी के हाथ से खाली प्याला थाम लिया और टेबल पर रखे बाकी बर्तन समेटने लगा। मानसी ने देखा, वह एक बीसेक साल का मासूम युवक था, जवानी की दहलीज पर कदम रखता हुआ।

‘‘यहीं रहते हो साब के साथ?’’ उसने यों ही पूछ लिया था।

‘‘नहीं मेमसाब, पास में ही क्वाटर है, वहीं मां के साथ रहता हूं।’’

‘‘और कौन-कौन हैं घर में?’’

‘‘बस मां है और दो छोटी बहनें।’’ इतना बताकर वह चुप हो गया।

‘‘और पिताजी?’’

‘‘वो नहीं हैं…. दो साल पहले इसी जंगल में एक हादसे का शिकार हो गये थे। उनकी जगह पर साहब ने मुझे रख लिया है।’’ बताते हुए थोड़ा उदास हो गया था गोपाल।

‘‘ओह, आय एम सॉरी गोपाल!’’ उसे सांत्वना देती हुई वह जैसे उसी के दुख में डूब गई थी। गोपाल ने सारे बर्तन उठाकर ट्रे में रख लिये थे।

‘‘अच्छा गोपाल, ये बर्तन रसोई में रखकर तुम अभी घर चले जाओ,  मैं थोड़ी देर आराम करूंगी। हो सके तो दोपहर के खाने से पहले लौट आना।’’

‘‘जी मेमसाब! मैं आ जाऊंगा।’’ छोटा-सा उत्तर देकर वह रसोई की ओर लौट गया।

गोपाल के जाने के बाद मानसी ने नहाकर कपड़े बदले और थकान दूर करने की गरज से कुछ देर वहीं सोफे पर लेट गई। उसे भीतर कहीं लग रहा था कि उसकी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है – उसका गंतव्य अभी और आगे है। वह कब बेसुध होकर अपने गुजरे दिनों की ओर लौट गई,  उसे कुछ भी सुध नहीं रही।

*

अनिकेत के साथ उसकी अंतरंगता की एक अलग पृष्ठभूमि थी। उसे मित्रता के सामान्य मापदण्डों से समझ पाना आसान नहीं है। खुद अनिकेत को उसके घर-परिवार वाले कम समझ पाते हैं, पत्नी भी कई तरह की आशंकाओं से घिरी रहती है, लेकिन अनिकेत अपनी निजी जिन्दगी के बारे में कभी कोई चर्चा नहीं करते। मानसी जो भी  थोड़ा बहुत उसके बारे में जान पाई, वह इधर-उधर से टुकड़ों-टुकड़ों में मिली जानकारियां थीं,  लेकिन अनिकेत से इस मसले पर बात करने की जब भी कोशिश की, वे टाल जाते थे। बेशक वे भिन्न स्तरों पर एक-दूसरे की रुचियों और रचनात्मक उपलब्धियों से प्रभावित होकर ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हुए हों, लेकिन पारिवारिक व्यक्ति के रूप में अनिकेत की अपने घर के प्रति जवाबदेही और साफगोई ने उन तमाम आकर्षणों को वक्त आने पर इस तरह छांट-तराश दिया कि खुद मानसी को ही अपने व्यक्तित्व में अलग तरह की परिपक्वता और परिवर्तन महसूस होने लगा। मानसी से अनिकेत का सारा लगाव इस बात पर टिका हुआ था कि उसकी रचनाशीलता में एक अलग तरह की ताजगी और तड़प दिखाई दी थी उसे। उसकी आरंभिक कविताओं और कैनवास पर उभरते अमूर्त आकारों में जो मौलिकता और संभावनाएं उसे दीख रही थीं, वह उसका सही विकास और विस्तार देखना चाहता था।

मानसी अपने व्यक्तिगत जीवन में इस बात का श्रेय अनिकेत को ही देती है कि रोहित के साथ यह रिश्‍ता और पारिवारिक जीवन उसी के आग्रह और प्रयत्न का प्रतिफल है। इस बात को उसके परिवार वाले भी मानते हैं। यह रिश्‍ता तय होने से पहले रोहित से उसकी कोई व्यक्तिगत मुलाकात नहीं थी, लेकिन उसके बारे में अनिकेत ने इतनी जानकारियां अवश्‍य प्राप्त कर ली थीं कि वह एक संजीदा और संवेदनशील युवक है। उसका वानिकी सेवा में चयन भी निश्चित हो चुका था और वह मानसी के लिए हर तरह से उपयुक्त जीवनसाथी लगा था। मानसी के प्रति उसे यह विश्‍वास जरूर था कि वह जिसे भी अपनाएगी,  उसे अपने आत्मिक लगाव और जीवन में अथक साझेदारी से उसे संवार लेगी।

जिन दिनों वह अनिकेत से मिली थी, वे उसके जीवन के सबसे कठिन दिन थे। उसने कभी सोचा नहीं था कि जिस गौरव को उसने जवानी की दहलीज पर कदम रखने से लेकर अगले चार साल तक जी-जान से प्यार किया, जिसके लिए अपने परिवार वालों की सारी नाराजगियां सहीं, अपने शुभचिन्तकों की हर सलाह की अनदेखी की और जिसके लिए वह हर मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार थी, वही गौरव वक्त आने पर बाहरी दबावों के आगे ऐसे झुक गया, जैसे उनके बीच कभी कुछ हुआ ही न हो। उसे तो एकबारगी सारे रिश्‍ते-नातों पर से आस्था ही उठ गई थी, यहां तक कि खुद अपनी जिन्दगी से भी कोई मोह नहीं रह गया था। वे तमाम सराही जानी वाली रचनाएं और कैनवस पर उकेरी आक़ृतियां उसी टूटन को ही तो व्यक्त कर रही थीं। उस वक्त यह अनिकेत ही थे, जिन्होंने उसे मानसिक यंत्रणा और टूटन के बीच और बिखरने से रोक लिया था। ऐसे ही कठिन दौर में अनिकेत उसकी जिन्दगी में एक सच्चे दोस्त की तरह आए और आत्मीय संरक्षक की तरह उसे उस मानसिक ऊहापोह और मंझधार से बाहर निकाल लाए। उन्होंने ही उसके अन्तःकरण में यह बात बिठाई कि किसी एक बुरे अनुभव से अपनी अनमोल संभावनाओं से भरी जिन्दगी को बेवजह सजा देना खुद अपने साथ भी अन्याय करना है।

अनिकेत के इतने अपनेपन से समझाने का मानसी पर अनुकूल असर अवश्‍य पड़ा। वह थोड़े ही समय में गौरव की बेवफाई के बुरे अनुभव से बाहर निकल आई। उसने अपनी बकाया पढ़ाई पूरी की। अपनी रुचि के कामों को और दिलचस्पी से करने लगी। जब वह पी.एच.डी. कर रही थी, उसी वर्ष एक प्रतिष्ठित वार्षिक कला-प्रदर्शनी में उसकी भी चार कला-कृतियां प्रदेश के बड़े कलाकारों के साथ प्रदर्शन के लिए चयनित की गई – इससे वह बेहद उत्साहित थी। उसी कला-प्रदर्शनी से जुड़ी एक विचार-गोष्ठी में अनिकेत ने जिस तरह सभी अच्छी कला-कृतियों की बारीक व्याख्या की, जिसमें मानसी की कृतियों का विशेष उल्लेख था, उसे सुनकर तो वह बहुत देर तक अभिभूत रही। पहली बार उसके काम को किसी ने सार्वजनिक रूप से इस तरह सराहा था। वह मन-ही-मन अनिकेत के प्रति कृतज्ञता और लगाव से भर उठी थी।

संयोग से उन्हीं दिनों मानसी के घर में उसके रिश्‍ते की भी बात चल रही थी, लेकिन मानसी अभी शादी न करने की जिद पर अड़ी थी। उसने गौरव को तो मन से निकाल दिया, लेकिन किसी नये रिश्‍ते के लिए अपने को तैयार नहीं कर पा रही थी। उधर लड़के वाले मानसी के पिता पर जल्दी फैसला करने के लिए दबाव डाल रहे थे। उनकी दुविधा बढ़ती जा रही थी। उन्हीं दिनों अनिकेत दो-एक बार मानसी के बहुत आग्रह करने पर उसका काम देखने उसके घर आ चुके थे। वे मानसी के पिता से पूर्व परिचित थे और वे भी इस बात को जानते थे कि मानसी अनिकेत का बहुत आदर करती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पिछली मुलाकात के दौरान अकेले में अनिकेत से यह अपेक्षा अवश्‍य की थी कि वे उसे इस अच्छे रिश्‍ते के लिए मनाने में उनकी मदद करें। अनिकेत ने उन्हें आश्‍वस्त किया था कि वे कोशिश करेंगे।

उस दिन आर्ट गैलरी के पास बने रेस्तरां में चाय पीते हुए अनिकेत ने बहुत अपनेपन से मानसी से उस रिश्‍ते के बारे में बात की तो पहले तो वह यही कहकर टालती रही कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती है, लेकिन जब अनिकेत ने ज्यादा जोर दिया तो वह अपनी इच्छा और मनोभावों को दबाकर नहीं रख सकी। उसने दबे स्वर में अनिकेत को बता दिया कि वह तो उन्हीं को पसंद करती है। उसकी यह अप्रत्याशित बात सुनकर अनिकेत एकाएक गंभीर हो गया था। वह गौरव के साथ मानसी के बुरे अनुभव से परिचित था और नहीं चाहता था कि वह फिर किसी तनाव से गुजरे,  इसीलिए उसने बहुत आत्मीयता और संजीदगी से उसे समझाया कि वह जो सोचती है, वह असंभव है। यह उसकी आत्मीयता और धैर्य से समझाने का ही परिणाम था कि मानसी ने उसी दिन घर पहुंचकर रोहित से अपनी शादी का रिश्‍ता कुबूल कर लिया। अनिकेत अपनी व्यस्तताओं के कारण मानसी और रोहित की शादी में तो शरीक नहीं हो पाया, लेकिन शादी से पहले, जब मानसी उसे शादी का कार्ड देने आई तो उसने उसे आगाह जरूर कर दिया कि अब उसे अपने पारिवारिक रिश्‍तों, स्कूल-कॉलेज के दिनों की अपनी दोस्तियों और अपनी रुचियों से जुड़े उन तमाम संपर्कों और संबंधों के बारे में नये सिरे से सोचना और व्यवहार करना होगा, उन्हें अपने पारिवारिक सुख और पति-पत्नी के अंतरंग रिश्‍तों की रोशनी में नये सिरे से जांचना-परखना होगा कि वे किस तरह उनके पारिवारिक जीवन को ऊष्मा और गति प्रदान कर सकते हैं।

मानसी ने अब अपना मन बना लिया था और वह अपने मनोभावों की कोई और परीक्षा नहीं चाहती थी। उसने शादी में आने के लिए अनिकेत पर ज्यादा दबाव भी नहीं डाला। इस आखिरी मुलाकात के बाद अगले कई सालों तक उनके बीच कोई खास संपर्क नहीं रहा। बस जानकारी भर रही कि कौन कहां है। मानसी अपने पारिवारिक जीवन में रम गई थी और अनिकेत उसी विश्‍वविद्यालय में पढ़ाते हुए अब रीडर हो गये थे। इसी बीच उनकी कुछ किताबें भी प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुकी थीं। पत्रिकाओं में उनकी कहानियां और लेख आदि भी छपते रहते थे। उन्हीं दिनों एक पत्रिका में छपी कहानी पर उन्हें अपनी डाक में एक छोटे-से पत्र के रूप में मानसी की प्रतिक्रिया मिली और उसी से यह जानकारी भी कि वह उन्हीं के पास के शहर में रोहित का तबादला होने के कारण आ गई है। उसने यह भी आग्रह किया था कि वे जब कभी उनके शहर आने का संयोग बने तो  उनसे मिले बगैर न जाएं। रोहित को भी उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगेगा और इस तरह एक अन्तराल के बाद संबंधों का वह सूत्र फिर से जुड़ गया।

यह फिर से जुड़ा संपर्क कब रोहित और उनके प्रियजनों के बीच संदेह और परेशानी  का कारण बन सकता है,  उन्हें कभी इसका खयाल ही नहीं आया। लेकिन इसी संपर्क और पुराने प्रसंगों को लेकर न जाने कैसे रोहित और मानसी के बीच एक अनावश्‍यक विवाद ने ऐसा तूल पकड़ लिया कि वे एक-दूसरे से खफा होकर अलग-अलग जा बैठे। वन-विभाग की नौकरी में हालांकि पति-पत्नी का साथ-साथ रह पाना संयोग ही माना जाता है, लेकिन साल भर पहले जब रोहित का इस नेशनल पार्क में तबादला हुआ तो मानसी ने उसे इसी रूप में लिया कि रोहित ने उससे नाराज होकर ही अपना तबादला परिवार से दूर इस जंगल में करवाया है।

जब अनिकेत ने मानसी से बहुत आग्रह करके पूछा, तब उसने बताया कि रोहित और उसके बीच अनबन का मूल कारण उन्हीं के बीच का पत्र-व्यवहार है, जो उनके बीच एक सहज संवाद का माध्‍यम था। अनिकेत को यह जानकर दुःख हुआ, बल्कि अपने आप पर झुंझलाहट भी हुई कि उसे इस तरह पति-पत्नी के बीच दुबारा नहीं आना चाहिये था। उसने मानसी को समझाने की कोशिश की कि वह अपने मन में रोहित के प्रति कोई नाराजगी न रखे और जितना जल्दी हो सके, स्वयं उसके पास जाकर गलतफहमियां दूर करे। अनिकेत को सबसे बड़ा आश्‍चर्य इस बात का था कि मानसी जैसी संवेदनशील और टूटकर प्यार करने वाली स्त्री से कोई कैसे रूठकर रह सकता है? उसी के आग्रह पर मानसी ने पहले तो पत्रों के माध्‍यम से अनिकेत के साथ अपने निर्मल रिश्‍ते की खुलासा जानकारी दी और फिर उसकी गैर-मौजूदगी के कारण घर में उसे और बच्चों को होने वाली कठिनाइयों और मानसिक पीड़ा का विस्तार से जिक्र किया। उन पत्रों के बाद भी जब रोहित का कोई जवाब नहीं आया तो वह चिन्तित हो उठी।

मानसी एक पढ़ी-लिखी और समर्थ स्‍त्री थी, अपनी और बच्चों की आवश्‍यकताओं के लिए वह किसी पर निर्भर नहीं थी। खुद एक एडवरटाइजिंग एजेन्सी में आर्ट डायरेक्टर का काम करती थी, इसके बावजूद वह पति को सदैव घर के मुखिया के रूप में ही देखती थी। शुरू के कुछ वर्षों में तो उसने रोहित की तबादलों वाली नौकरी और बच्चों की परवरिश के कारण किसी एक शहर में स्थाई रूप से बसने के बारे में कभी सोचा नहीं था। रोहित के तबादले के साथ वे जहां भी जाते, मानसी थोड़े समय में ही वहां अपनी रुचि का काम ढूंढ़ लेती।  इससे उसका मन लगा रहता और पारिवारिक कामों में भी मदद रहती। जब तीन महीने गुजर जाने के बाद भी न रोहित घर आया और न ही कोई जवाब आया, तो उसका चिन्तित हो उठना स्वाभाविक था। उसने तुरन्त पत्र लिखकर मायके से मां को बुलवा लिया और उसे घर और बच्चों की जिम्मेदारी सौंपकर वह खुद रोहित के सामने आ खड़ी हुई।

*

रोहित के साथ दिन भर की जंगल-यात्रा में मानसी ने उसके मन को कई तरह से टटोलने की कोशिश की – यह जानने के लिए कि कहीं कोई आशंका या सवाल अब भी मन में बचा हुआ तो नहीं है। जो कुछ वह अपने पत्रों में बयान कर चुकी थी, क्या उन्हीं बातों को फिर से दोहराने या उन्हें और खोलकर समझाने की जरूरत बाकी रह गई है? जो खुलापन और अन्तरंगता वैवाहिक जीवन के दस वर्षों में उनके बीच बनी रही, वह किसी काल्पनिक आशंका या सन्देह-मात्र से बाधित कैसे हो सकती है? क्या उनके बीच के रिश्‍ते की बुनियाद इतनी कमजोर है?

वे दोनों अपने आप में खोए हुए सोफे के दो छोरों पर बैठे शाम की चाय पी रहे थे। बैठक की खिड़की के बाहर कहीं दूर से आती वन्य-प्राणियों और पक्षियों की आवाजें अनायास ही मानसी का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी। यों सुबह की छोटी-सी बातचीत और दोपहर बाद रोहित के साथ जंगल की यात्रा के बाद दोनों के बीच तनाव का कोई चिन्ह नहीं दीख रहा था – खुद रोहित भी जंगल में घूमते हुए बहुत उत्साह से उसे अभयारण्य की खूबियों के बारे में विस्तार से बताते जा रहे थे। उसे यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि वह अलग-अलग प्राणियों की आदतों और गतिविधियों के बारे में कितना-कुछ जानता हैं,  यहां तक कि कुछ प्राणियों की आवाजों और उनकी हरकतों को इतनी खूबी से पहचानता है कि देखकर ताज्जुब होता है। जंगल में घूमते हुए वह किस तरह वायरलैस के जरिए समूचे जंगल में फैले वन-कर्मियों के काम पर अपनी पकड़ रखता है, किस समय कौन-सा बड़ा जानवर किस इलाके में घूम रहा है, वह हर पल इसकी पूरी खबर रखता है। वह रोहित की इस कार्य-शैली और क्षमता पर मन ही मन रीझ रही थी, लेकिन एक सवाल अब भी उसके मन में खटक रहा था कि सब कुछ की इतनी खबर रखने वाला और सबके साथ इतना खुला व्यवहार करने वाला यह शख्स अपने ही घर-परिवार और अन्तरंग रिश्‍तों के प्रति इतना शंकालु क्यों है?  जंगल-यात्रा के दौरान जीप में एक और वनकर्मी साथ होने के कारण वे ज्यादा निजी बातें तो नहीं कर सके, लेकिन पूरी यात्रा के दौरान मानसी ने यह महसूस जरूर किया कि वह पहले वाला संशय और तनाव अब नहीं था।  सुबह से अब तक यह जरूर लग रहा था कि रोहित उससे खुलकर बात नहीं कर रहा,  लेकिन ऐसा भी कुछ जाहिर नहीं कर रहा था जिससे यह अनुमान हो कि उसके मन में मानसी के प्रति किसी तरह का संशय या सन्देह बना हुआ है। जंगल में झरने के पास थोड़ा एकान्त मिलने पर मानसी ने जब सीधे अपने पत्रों के बारे में पूछा तो तुरन्त उसने यह कहते हुए बात को संक्षेप में समेट दिया कि वह सब उसका बेकार का वहम था, जो वह कब का भूल चुका है।

‘‘तो फिर क्या बात है रोहित?’’ पूछते हुए अधीर-सी हो उठी थी मानसी, लेकिन रोहित तब भी शान्त था। उसने चारों ओर नजर दौड़ाते हुए घड़ी की ओर देखा और इतना ही कहा था, ‘‘हम इस पर तसल्ली से बात करेंगे मानसी।’’ और यह कहते हुए वह वहीं से वापस लौट पड़ा था।

मनसी ने चाय का आखिरी घूंट लेकर प्याला वहीं सामने टेबल पर रख दिया और अपनी जगह से उठकर पिछवाड़े की ओर खुलने वाली खिड़की पर पहुंच गई थी। यहां से पश्चिम का आकाश साफ दिखता था। सूरज अब डूब चुका था, लेकिन रोशनदान से भीतर आने वाले उजास का असर बैठक में अब भी बरकरार था, इसलिए बत्ती अभी नहीं जलाई गई थी। थोड़ी और रोशनी के लिए मानसी ने खिड़की का पर्दा जब हटा दिया तो उसकी नजरें खिड़की के पार दीखते खुले आसमान पर टिक गई। वह देर तक खोई हुई-सी उस खुले आसमान के टुकड़े पर उड़ते हुए पक्षियों का आना-जाना देखती रही।

रोहित न जाने कब अपनी सीट से उठकर उसके पीछे आ खड़ा हुआ था,  इसका आभास उसे तब हुआ जब उसे अपनी पीठ और कंधों पर हल्का दबाव और अपनी बगल से निकल आए दो आत्मीय हाथों का स्पर्श उसी दृश्‍य की ओर बहा ले जाता हुआ-सा प्रतीत हुआ – वह एकाएक उस स्पर्श और दबाव में बेसुध होकर बह गई। उसने उन हाथों की कलाइयों को अपने हाथों में बांध लिया। उसे अपने दाएं कान और गाल पर रोहित की गर्म सांसों की मिठास और भी बेसुध किये दे रही थी। वह समय, स्थान और अपनी अवस्था की सारी संज्ञाएं भूल गई थी और उसकी पलकें अपने आप मुंद गई थी। जाने कितनी देर वे उसी अवस्था में बेसुध-से खड़े रहे और जब संज्ञा में लौटे तो सामने का दृश्‍य बदल चुका था। बाहर खुले आसमान पर अब तारे निकल आये थे और बैठक की हर चीज अंधेरे में डूब चुकी थी। रोहित के इस पार्श्‍व आलिंगन से मुक्त होते ही मानसी ज्यों ही बत्ती जलाने के लिए पीछे की ओर घूमी,  रोहित ने फिर उसे अपने गहरे आलिंगन में बांध लिया।

*

देह की अपनी भाषा होती है, वह अपना संवाद स्‍वयं रचती है। उसके राग-विराग का अपना व्‍याकरण है और अपनी संपुष्टि। सम पर लौट आने के बाद जो बच रहता है, उसी को सुलझाने का प्रयास करती है मानवीय संवाद की वह भाषा, जिसे बरतने का अभ्‍यास रोहित के पास बेशक कम रहा हो, लेकिन इन्‍हीं वन्‍य-प्राणियों के संसर्ग में रहते हुए उस नैसर्गिक रिश्‍ते की अहमियत को उसने जान अवश्‍य लिया था। जिन अनुकूल अवसरों को वह अमूमन चूक जाता रहा और फिर हर बार किसी अनिर्णय में जाकर अटक जाता, अब उस अवस्‍था से बाहर आने का संकल्‍प उसके भीतर आकार लेने लगा था। उस रात जब पहली बार रोहित ने हिम्‍मत जुटाकर बिना कोई अतिरिक्‍त वास्‍ता लिये-दिये मानसी के वे सारे गिले-शिकवों को दूर करने और अपने व्‍यवहार का परिमार्जन करने का मन बनाया तो पहले से कुछ भी तय नहीं था। बल्कि अपनी इसी मनोदशा को उसने संवाद का आधार बना लिया था। खुद मानसी को भी लगा कि रोहित के इन कठिन अनुभवों और मानसिक तनावों के सामने उसके अपने किशोर अनुभव तो जैसे कुछ भी नहीं थे। अपने दैहिक आवेग से उबर आने के बाद रोहित ने गंहरे सोच-विचार के साथ वह सब कहने-बताने का मानस बनाया था, जो वह अब तक मानसी के साथ कभी साझा नहीं कर पाया। उसकी उपस्थिति और स्‍पंदन को अपने भीतर महसूस करते हुए मानसी को हालांकि अब किसी अतिरिक्‍त संवाद की अपेक्षा नहीं रह गई थी, लेकिन जब रोहित ने अपने अतीत के उन अदृश्‍य हवालों की ओर उसका ध्‍यान आकर्षित करते हुए बोलना शुरू किया तो वह अवाक्-सी उसके चेहरे की ओर देखती रह गई थी –

‘‘मुझे इस बात का अफसोस है मानसी कि मैंने पिछले दिनों अपने अजीबोगरीब  बरताव से तुम्हें दुःख पहुंचाया है…. तुमने तो अपने पत्रों के जरिये अपना मन खोलकर मेरे सामने रख भी दिया और तुम्हें शायद यह लगता रहा कि जैसे मैं तुम्हारी बातों पर यकीन नहीं कर पा रहा हूं…. पर असल में ऐसा था नहीं मानसी,  मेरी अपनी दुविधाएं कुछ कम नहीं रही…. पता नहीं, मैं तुम्हें ठीक से बता भी पाऊंगा या नहीं….।’’ कहते हुए  रोहित फिर यकायक चुप्प-सा हो गया था। मानसी ने हल्‍के-से उसके हाथ को चूमा और उसे आश्‍वस्‍त किया कि वह अपनी बात कहे।

आज उसके सामने वाकई एक नया रोहित था जो रुक-रुककर कुछ कहने की कोशिश कर रहा था, ‘‘असल में मैं तुम्हारे जितना खुला और बेलाग व्यक्ति नहीं हूं, मानसी…. अपनी कमजोरियां और सीमाएं अब जानने लगा हूं, शायद तुम्हारे इसी खुलेपन ने आज मुझे इतनी हिम्मत दी है कि तुम्हारे सामने अपना उलझा हुआ अतीत और अपना अन्तःकरण खोलकर रख सकूं….. मैं कलाकार नहीं हूं और शायद मेरे पास बयान करने के लिए अच्छी भाषा भी नहीं है, लेकिन मैं उम्मीद करूंगा कि तुम मुझे ग़लत नहीं समझोगी और इस बात का बुरा भी नहीं मानोगी कि अपने वैवाहिक जीवन के दस साल बाद मैं इस रूप में तुम्हारे सामने खुल रहा हूं…’’

और इस कैफियत के साथ कुछ क्षण मौन रहने के बाद जब पहली बार रोहित ने यह रहस्योद्घाटन किया कि वह अपनी इस शादी से पहले किसी और को अपना जीवनसाथी बनाने का निश्‍चय कर चुका था और उसको लेकर उसके जीवन में कई सालों तक उथल-पुथल रही है तो उसे लगा कि जैसे इस रोहित से वह पहली बार मिल रही है। वह बिना कुछ कहे उसकी ओर देखती रही और सांस रोककर सुनती रही।

रोहित बता रहे थे कि वह अपने कॉलेज के दिनों में शालिनी नाम की लड़की से बेहद प्यार करते थे, जिससे विवाह न कर पाने का अफसोस उसे बरसों तक भीतर से कचोटता रहा। वह खूबसूरत और समझदार थी, लेकिन गरीब थी। अपने घर में वह बहुत उपेक्षा और बुरे अनुभवों के बीच से गुजरकर बड़ी हुई थी। वह बड़ी मुश्किल से कॉलेज में दाखिला ले पाई थी – बस किसी तरह पढ़-लिखकर उस दशा से बाहर निकल आना चाहती थी और उसी में उसे मदद की जरूरत थी। उसके शराबी पिता ने पैसा लेकर उसका रिश्‍ता अपनी ही बिरादरी के एक ऐसे दुहाजू व्यक्ति से तय कर दिया था, जिससे उसका कोई मेल नहीं था। उसने विरोध भी किया, लेकिन उसका साथ देने वाला कोई नहीं था। एक दिन शालिनी की मर्जी के खिलाफ उस व्‍यक्ति के साथ उसकी शादी कर दी गई, जिसकी पहली बीबी उसी के जुल्म सहती मर गई थी। शालिनी उससे बचने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी, यहां तक कि रोहित के साथ भाग जाने को भी। शादी की तारीख से पहले उसने कई बार रोहित से मदद के लिए आग्रह किया, लेकिन वह कभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाया।

शादी के बाद शालिनी की पढ़ाई छूट गई और वह उस घर में बंदी होकर रह गई। इसी अपराधबोध और दुःख के कारण रोहित का अपने घरवालों के साथ भी व्यवहार सामान्य नहीं रह गया। अपनी पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद जब घर में उसके लिए रिश्‍ते आने शुरू हुए तो उसने किसी रिश्‍ते के लिए अपनी सहमति नहीं दी। आखिर शालिनी को जब इस बात की खबर लगी कि वह उसी के कारण शादी नहीं कर रहा है, तो उसे अफसोस हुआ। वह तब भी भीतर से कहीं उसके लिए लगाव महसूस करती थी। आखिर उसी के कहने-समझाने पर उसने मानसी का रिश्‍ता मंजूर किया था। अपनी जिन्दगी को शालिनी ने नियति मान लिया था। वह आज भी उनके परिवार की उतनी ही चिन्ता करती है, लेकिन कहीं रोहित और मानसी के बीच गलतफहमी का कारण न बन जाए,  इसलिए उनकी शादी के बाद उसने कभी संपर्क बनाए रखने की कोशिश नहीं की।

समय गुजरने के साथ घर में शालिनी के पति का बरताव और बिगड़ता चला गया। वह रोहित और शालिनी के आपसी लगाव के बारे में जानता था। उसने कई तरह के उल्टे-सीधे लांछन भी उस पर लगाये, लेकिन शालिनी सारी तकलीफें उठाकर भी यही कोशिश करती रही कि उसका पारिवारिक जीवन किसी तरह बचा रहे। वह दो बेटियों की मां बन चुकी थी, लेकिन उस निर्मम आदमी का मन वह नहीं बदल सकी… उसका पारिवारिक जीवन नष्ट हो गया। यही बात रोहित को लगातार कचोटती रही और शालिनी की इस दशा के लिए वह आज तक अपने को माफ नहीं कर पाया… यही सब बातें मानसी को बताते हुए वह गहरे अवसाद में डूब गया था और सिरहाने रखे तकिये पर पीठ टिकाकर छत की ओर देखने लगा था। मानसी उसी की ओर मुंह किये, बैड के सिरहाने से अपनी पीठ टिकाए उसे सुनती रही। रोहित के चुप हो जाने के बाद उसने सिर्फ इतना-सा पूछा, ‘‘ये वही शालिनी है न, जो ‘आस्था’ के साथ काम करती है?’’

‘‘हां वही, मगर….’’ वह कुछ और पूछता, लेकिन उसे अनसुना करते हुए मानसी ने अपनी बात जारी रखी – ‘‘लेकिन वह तो अपनी दोनों बेटियों के साथ अलग रहती है शायद? उसके पति तो साथ नहीं रहते।’’

‘‘तुम शालिनी को जानती हो मानसी?’’ रोहित ने आश्‍चर्य से उसकी ओर देखते पूछा था।

‘‘बस इतना ही कि वह एक साहसी स्त्री है, वह अपने पांवों पर खड़ी है और स्त्रियों की स्वयंसेवी संस्था ‘आस्था’ के साथ काम करती है। मैंने पहली बार उसे उसी संस्था के आयोजन में बोलते हुए सुना था – अच्छा बोलती है, वह तो कहीं से भी असहाय या कमजोर नहीं लगती।’’

‘‘यही तो उसकी खूबी है मानसी! वह अपने भीतर के दर्द को छुपाकर रखती है। उसने मुझसे कभी नहीं कहा कि उसने क्या-कुछ सहा है। मुझे उसके आस-पड़ौस और परिचितों से ही उसके बारे में जानकारियां मिलती रही हैं।’’

‘‘तो आपकी उससे अब मुलाकात नहीं होती?’’ पहली बार मानसी ने अविश्‍वास से उसकी आंखों में देखते हुए पूछा था।

‘‘बहुत कम… कभी-कभार संयोगवश! बस, पिछले दिनों यहीं पास के जिला मुख्यालय पर एक आयोजन में उससे मिलना हुआ था। मैं तो उससे सहानुभूति प्रकट करने ही उसके पास गया था…. जब थोड़ी देर अकेले में उससे बात हुई तो मुझे यह जानकर तकलीफ हुई कि उसकी मेरे बारे में अच्छी राय नहीं थी… मेरी सहानुभूति में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी… वह तो उल्टे मुझे ही नसीहत दे रही थी कि मैं अपने घर को ठीक तरह से संभालूं… ऐसा क्यों हुआ मानसी…. उसने ऐसा रूखा बरताव क्यों किया मेरे साथ? …पिछले सप्ताह भर से यही बात मुझे बराबर कचोटती रही है।’’

फिर जैसे कुछ सोचते हुए उसने पूछा, ‘‘कहीं ये तुम्हारी उस मुलाकात का परिणाम तो नहीं था, मानसी?’’ और उसने अपनी आंखें मानसी के चेहरे पर टिका ली थी।

इस अंतिम प्रश्‍न से मानसी एकाएक चौंक गई,  इसके बावजूद संयत रहते हुए   उसने इतना ही कहा, ‘‘नहीं, मुझसे तो ऐसी कोई बात नहीं हुई, बल्कि उससे पहली बार मिलने पर मुझे आश्‍चर्य जरूर हुआ था कि वह हमारे बारे में कितना कुछ जानती है। तुम्हारे बारे में पूछने पर उसने इतना ही बताया था कि तुम दोनों साथ पढ़े हो और इसी नाते वह तुम्हें जानती है। मुझे थोड़ा अजीब लगा था कि उस पहली ही मुलाकात में वह हमारे आपसी रिश्‍तों को लेकर कितनी दिलचस्पी दिखा रही थी, लेकिन मैंने उसे कुछ नहीं बताया। बस जाते जाते उसने यह जरूर कहा था कि तुम बहुत अच्छे इन्सान हो… मुझे तुम्हें और बेहतर ढंग से समझना चाहिए! ….उस मुलाकात के बाद एक दिन अचानक अनिकेत से भी यह पता लगा कि वे एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित हैं…. उनकी संस्था के काम में अनिकेत से उनका अक्सर मिलना होता है… हो सकता है, अनिकेत से हमारे पारिवारिक जीवन के बारे में उनके बीच कोई बात हुई हो…’’ लेकिन यह सब बताते हुए मानसी फिर जैसे अपनी ही चिन्ता में डूब गई थी।

वे एकबारगी चुप हो गये थे। रोहित तकिये पर सिर टिकाकर अब पीठ के बल लेट गया था और वह भी कुछ क्षण बाद उसकी बगल में सीधी लेट गई थी। कुछ पल बाद रोहित की ओर करवट लेकर मानसी ने उसकी आंखों में देखते हुए इतना ही पूछा था, ‘‘रोहित, क्या तुम्हें यह अजीब नही लगता कि हमारे रिश्‍तों के बीच और लोग आकर हमें समझाने का प्रयत्न करते हैं… क्या पति-पत्नी से भी ज्‍यादा करीब कोई और रिश्‍ता हो सकता है?’’

रोहित ने उसके खुले वक्ष में अपना सर छुपाते हुए इतना ही कहा था, ‘‘मुझे माफ कर दो मानसी! …अब ऐसा कभी नहीं होगा, ….प्लीज, बिलीव मी!’’ और मानसी ने उसके सर को सहलाते हुए फिर से उसे अपने अंक में समेट लिया था।

 
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