Archive for the 'Uncategorized' Category

कुछ नयी कविताएं –

नंद भारद्वाज की कविताएं

 अपना घर

ईंट-गारे की पक्की चहार-दीवारी

और लौह-द्वार से बन्द

इस कोठी के पिछवाड़े

रहते हुए किराये के कोने में

अक्सर याद आ जाया करता है

रेगिस्तान के गुमनाम हलके में

बरसों पीछे छूट गया वह अपना घर –

घर के खुले अहाते में

बारिश से भीगी रेत को देते हुए

अपना मनचाहा आकार

हम अक्सर बनाया करते थे बचपन में

उस घर के भीतर निरापद अपना घर –

बीच आंगन में खुलते गोल आसरों के द्वार

आयताकार ओरे,  तिकोनी ढलवां साळ

अनाज की कोठी, बुखारी, गायों की गोर

बछड़ों को शीत-ताप और बारिश से

बचाये रखने की पुख्ता ठौर !

जाने क्यों इस घर में अपना घर बनाते

हम अक्सर भूल जाया करते थे

घर को घेर कर रखती वह चहार-दीवारी !

***

मां की याद

बीत गये बरसों के उलझे कोलाहल में

अक्सर उसके बुलावों की याद आती है

याद आता है उसका भीगा हुआ आंचल

जो बादलों की तरह छाया रहता था कड़ी धूप में

रेतीले मार्गों और अधूरी उड़ानों के बीच

अब याद ही तो बची रह गई है उस छांव की

बचपन के बेतरतीब दिनों में

अक्‍सर पीछा करती थी उसकी आवाज

और आंसुओं में भीगा उसका उदास चेहरा –

अपने को बात-बात में कोसते रहने की

उसकी बरसों पुरानी बान –

वह बचाए रखती थी हमें

उन बुरे दिनों की अदीठ मार से

कि जमाने की रफ्तार में छूट न जाए साथ

उसकी धुंधली पड़ती दीठ से बाहर

दहलीज के पार

हम नहीं रह पाए उसकी आंख में

गुजारे की तलाश में भटकते रहे यहां से वहां

और बरसों बाद जब कभी पा जाते उसका आंचल

सराबोर रहते थे उसकी छांव में

वह अनाम वत्सल छवि

अक्सर दीखती थी उदास

बाद के बरसों में,

कहने को जैसे कुछ नहीं था उसके पास

न कोई शिकवा-शिकायत

न उम्मीद ही बकाया

फकत् देखती भर रहती थी    अपलक

हमारे बेचैन चेहरों पर आते उतरते रंग –

हम कहां तक उलझाते

उसे अपनी दुश्‍वारियों के संग?

***

 

 

कहानी – अपने अपने अरण्‍य

कहानी

            अपने अपने अरण्य          

 

रे-भरे पेड़ों और झाड़ियों से ढंकी पहाड़ियों से घिरे इस विशाल जंगल के एक छोर पर बसी इस छोटी-सी बस्ती में जब सवेरे की पहली किरण अपनी आंख खोलती है, तो यहां के ठहरे हुए जीवन में एक हलचल-सी आरंभ होती है। बीती रात की अच्छी बारिश के बाद सवेरे तक जारी बूंदा-बांदी अब थम गई थी। भूरे-मटमैले बादलों की आवाजाही के बावजूद आकाश मौन था। हल्की आवाज के साथ बस के आकर रुकते ही आस-पास की थड़ीनुमा दुकानों से निकलकर लोग बस को घेरकर खड़े हो गये थे।

बस्ती के नाम पर नेशनल पार्क के लिए बनाए गये कुछ भवन और दूसरे मकानात ही दिखाई देते हैं। उन्हीं को घेरे खड़ी पहाड़ियां और चारों ओर का जंगल एक अलग ही तरह का वातावरण बनाते हैं। सुनसान जंगल में खड़ी इन इमारतों में कृषि, पशुपालन, स्वास्थ्य विभाग, बिजली, पानी, डाकतार जैसे ऑफिस हैं और दो वन-विभाग के गैस्ट-हाउस, जिनमें ज्यादातर तो सरकारी विभागों के अधिकारी ही ठहरते हैं। कभी-कभार कोई भूला-भटका सैलानी भी आ जाता हैं, जिसे कहीं और पनाह नहीं मिलती। थोड़े-बहुत कच्चे मकान हैं, जिनमें ग्रामवासी रहते हैं, जो पहले कभी इन्हीं पहाड़ियों के बीच बसे गांवों में अपना गुजर-बसर करते थे। बस्ती में एक प्राथमिक स्कूल है और एक डाकखाना भी, जो यहां के कर्मचारियों और निवासियों की सुविधा के लिए बनवाया गया है। पार्क के मुख्य-द्वार के सामने से गुजरती इस खुली सड़क का एक सिरा आगे जाकर राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ जाता है और दूसरा पास ही के जिला मुख्यालय से। सड़क पर दिन भर वाहनों की आवा-जाही बनी रहती है। इस रूट पर चलने वाली ज्यादातर बसें और यात्री-वाहन पार्क आने-जाने वाले सैलानियों से ही भरे होते हैं, जिन्हें इसी मुख्य-द्वार पर लाकर उतार दिया जाता है और वापस लौटने वाले भी इसी द्वार के पास बने शेड के नीचे या सड़क के उस पार की कच्ची थड़ियों और ढाबों के आस-पास बैठकर वाहनों का इंतजार करते हैं।

रुकी हुई बस के बीच वाले गेट से एक-एक कर उतरती सवारियों के बीच अपने ढीले-ढाले लिबास को सम्हाले जब मानसी ने सामने खड़े लोगों पर नज़र दौड़ाई तो उसे मुस्कुराकर हाथ हिलाते रोहित दिख गये थे। उसने भी अभिवादन में अपना दाहिना हाथ ऊपर उठा दिया था और अगले ही क्षण वह बस से नीचे उतर आई थी। रोहित के साथ खड़े वनकर्मी ने आगे बढ़कर उसका सूटकेस और बैग अपने हाथों में सम्हाल लिया था और सामान लेकर वह रोहित से कुछ कदमों की दूरी पर जाकर रुक गया था। बस से उतरकर मानसी सीधे रोहित के सामने आ खड़ी हुई थी – उसके मुस्कुराते चेहरे के पार कुछ और भी तलाश करती हुई-सी। उसे अपने इतने करीब पाकर रोहित ने अनायास पूछ लिया था, ‘‘कैसी हो मानसी?’’

‘‘जी…. कैसी हो सकती हूं आपके बगैर?’’ हल्की मुस्कुराहट के साथ यकायक निकल आए इस सवालिया जवाब में जैसे उसने बहुत-कुछ कह दिया था। सुनकर एकबारगी  अचकचा गया था रोहित।

‘‘मेरा मतलब…. रास्ते में कोई तकलीफ तो नहीं हुई?’’ अपने को सम्हालते हुए उसने बात आगे बढ़ाई।

‘‘नहीं, तकलीफ कैसी…. ये तो पूरा रास्ता ही इतना खूबसूरत है और फिर सुबह की बारिश ने इसे और भी खुशगवार बना दिया….।’’

‘‘इसीलिए तो सैलानी ऐसे ही मौसम में यहां आना पसंद करते हैं। …वैसे घर चलना पसंद करोगी या….’’ पूछते हुए रोहित के स्वर में शरारत थी या परिहास, वह ठीक से पकड़ नहीं पाई। बस हल्की-सी उदासी के साथ इतना ही कह पाई – ‘‘जहां आप ठीक समझें!’’

उसे लगा, मानसी बुरा मान गई। तुरंत अपनी भूल सुधारते हुए बोल पड़ा, ‘‘ओ के बाबा,  ….आय एम सॉरी! ….सामान क्वार्टर ले चलो कुंजन।’’ उसने अपने से थोड़ी दूरी पर खड़े वनकर्मी को निर्देश दिया और वे दोनों पैदल ही अपने घर की ओर चल पड़े, जो ज्यादा दूर नहीं था, बल्कि सामने ही दीख रहा था।

रोहित चालीस की उम्र पार करता दरम्याना कद-काठी का हंसमुख इन्सान था, जिसे वन अधिकारी के रूप में इस छोटी-सी बस्ती के कर्मचारी और निवासी ही नहीं, जंगल के जानवर भी उसी लगाव से जानते थे। रास्ते में जो भी मिलता, उससे हंसकर दुआ-सलाम जरूर करता।

मानसी को यह देखकर अच्छा लगा कि उसका बंगला खूब खुला-खुला और साफ- सुथरा था। घर के आगे हरी घास का लॉन और चहारदीवारी के पास ऊंचे-ऊंचे अशोक और मोरपंखी के पेड़ थे। अंदर के कमरों का एक बार मुआयना कर लेने के बाद वह हाथ-मुंह धोने बाथरूम की ओर चली गई और रोहित उसका सामान लेकर बैडरूम में। जब वे वापस बैठक में आए,  तब तक सेवक गोपाल चाय बनाकर ले आया था। हाथ-मुंह धो लेने से वह भी कुछ तरो-ताजा महसूस करने लगी थी। अभी कपड़े नहीं बदले थे, अलबत्ता जूड़े में बंधे हुए बालों को जरूर खोल दिया था, जिससे घने काले बालों के बीच सलोना चेहरा और निखर आया था। चाय का प्याला उठाकर पहला घूंट लेते हुए उसी ने बात शुरू की थी – ‘‘और आप कैसे हैं?’’

‘‘बस जैसा हूं, तुम्हारे सामने हूं…. खुद ही जान लो।’’ वह नहीं जान पाई कि वह खुश है या उसी की तरह भीतर से उन्मन।

‘‘और कौन लोग रहते हैं, यहां आपके आस-पास?’’

‘‘बहुत लोग हैं, पार्क का स्टाफ है, गांववासी हैं, गोपाल है…. और तमाम तरह के जानवरों से भरा यह जंगल…..।’’

रोहित ने उसी तरह हास-परिहास के जरिए वातावरण को हल्का-फुल्का रखने की कोशिश की,  लेकिन मानसी,  कुछ और जानने की गरज से उसी की ओर देखती रही।

‘‘बच्चे कैसे हैं?’’ थोड़ा संजीदा होते हुए रोहित ने पूछ लिया था।

‘‘अच्छे हैं, लेकिन तुम्हें बहुत मिस करते हैं…. मैं उन्हें क्या समझाऊं रोहित? अब वे बड़े हो रहे हैं…. क्या तुम्हें उनकी याद नही आती?’’ यही पूछते हुए यकायक उदास हो गई थी, मानसी।

‘‘आती क्यों नहीं, …इसीलिए तो पूछ रहा हूं। …अपने काम की कुछ मजबूरियां हैं… आये दिन जंगल में जानवरों के मारे जाने की घटनाएं हो रही हैं, जिनकी वजह से काम अचानक बढ़ गया है… लेकिन उम्मीद है, जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा। …और कैसी चल रही है उनकी पढ़ाई वगैरह?’’

‘‘वैसे तो ठीक चल रही है…. बस आपके लिए जब पूछने लगते हैं,  तो समझाना मुश्किल हो जाता है…. फिर कोशिश करती हूं…’’  बोलते-बोलते वह अचानक रुक गई थी। उसे लगा कि वह इस तरह ज्यादा देर तक निरपेक्ष रहकर बात नहीं कर पाएगी।

‘‘खैर चिन्ता की कोई बात नहीं, मैं खुद जल्दी ही आऊंगा बच्चों के पास।’’ वह बात को समेटते हुए जैसे उठने की तैयारी में था।

‘‘यानी, अभी वापसी में मेरे साथ नहीं चलेंगे?  पूछते हुए थोड़ी रुआंसी-सी हो आई थी मानसी,  लेकिन फिर तुरंत अपने को सम्हाल लिया।

‘‘देखता हूं…. बात करनी होगी हैड-ऑफिस से।’’  कहते हुए रोहित अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ था।

रोहित के व्यवहार में आए इस ठंडे बदलाव से मानसी थोड़ी चिन्तित हो उठी थी। लगा कि उसके मन में पिछली बातों का तनाव अभी खत्‍म नहीं हुआ है। वह खुद अपनी उलझनों से बहुत संतप्त रहती आई है और नहीं चाहती कि उसका कोई अपना उसी की तरह आत्म-संताप से पीड़ित रहे। अनिकेत ठीक ही कहते हैं, कई बार आवेश के क्षणों में हम अपना संतुलन खो बैठते हैं। जीवन के छोटे-छोटे संदेह हमारे समूचे जीवन-विवेक और अनुभव पर भारी पड़ जाते हैं और जब हमें इस बात का अहसास होता है, हम अपने समय और संबंधों का पर्याप्त नुकसान कर चुके होते हैं। अपने पत्रों में वह बार-बार रोहित को यही समझाने की कोशिश करती रही कि उनके बीच की उलझनों का असर बच्चों पर न पड़े, लेकिन यह सब अकेले उसके हाथ में तो नहीं। अपने पिछले पत्र में तो उसने समूचे प्राण ही उड़ेल दिये थे, उसके बावजूद जब रोहित घर नहीं लौटा और न ही उसका कोई जवाब आया, तो उसे लगा कि वह उसे खो देगी। उसे खुद से ज्यादा अपने बच्चों की फिक्र थी, जो अपने पिता को बेहद प्यार करते थे और जिन्हें उनकी सख्त जरूरत थी। इस दौरान अनिकेत जब भी मिले, उसे यही सलाह देते रहे कि वह फौरत खुद जाकर बात करे। पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे माध्यम के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती, चाहे वह कितना ही अजीज और आदरणीय क्यों न हो। अगर अनिकेत ने इतना आग्रह न किया होता तो शायद आज वह यहां न होती और न रोहित के स्वभाव में आ रहे इस बदलाव को ही जान पाती।

‘‘तुम चाहो तो थोड़ी देर आराम कर लो, मैं तब तक ऑफिस का कुछ जरूरी काम निपटाकर आता हूं। दोपहर का खाना हम साथ खाएंगे और अगर कुछ नाश्‍ता करना हो तो गोपाल को बता देना, वह बना देगा।’’ यह कहते हुए रोहित बाहरी दरवाजे की ओर बढ़ गये थे और वह उसी तरह अपनी जगह पर बैठी उसका जाना देखती रही। उसकी चाय कब की खत्म हो चुकी थी,  लेकिन खाली प्याला अब भी उसके हाथ में मौजूद था। वह उसी तरह सोच में डूबी रही। कुछ देर बाद उसे लगा कि कोई उसके पास खड़ा उससे कुछ पूछ रहा है। जब वह अपनी संज्ञा में लौटी तो सामने गोपाल को खड़ा पाया, जो उससे खाली प्याला मांगते हुए पूछ रहा था, ‘‘थोड़ी और चाय बना दूं मेमसाब!’’

‘‘नहीं गोपाल, बस रहने दो।’’

‘‘जी मेमसाब।’’ छोटा-सा उत्तर देकर उसने मानसी के हाथ से खाली प्याला थाम लिया और टेबल पर रखे बाकी बर्तन समेटने लगा। मानसी ने देखा, वह एक बीसेक साल का मासूम युवक था, जवानी की दहलीज पर कदम रखता हुआ।

‘‘यहीं रहते हो साब के साथ?’’ उसने यों ही पूछ लिया था।

‘‘नहीं मेमसाब, पास में ही क्वाटर है, वहीं मां के साथ रहता हूं।’’

‘‘और कौन-कौन हैं घर में?’’

‘‘बस मां है और दो छोटी बहनें।’’ इतना बताकर वह चुप हो गया।

‘‘और पिताजी?’’

‘‘वो नहीं हैं…. दो साल पहले इसी जंगल में एक हादसे का शिकार हो गये थे। उनकी जगह पर साहब ने मुझे रख लिया है।’’ बताते हुए थोड़ा उदास हो गया था गोपाल।

‘‘ओह, आय एम सॉरी गोपाल!’’ उसे सांत्वना देती हुई वह जैसे उसी के दुख में डूब गई थी। गोपाल ने सारे बर्तन उठाकर ट्रे में रख लिये थे।

‘‘अच्छा गोपाल, ये बर्तन रसोई में रखकर तुम अभी घर चले जाओ,  मैं थोड़ी देर आराम करूंगी। हो सके तो दोपहर के खाने से पहले लौट आना।’’

‘‘जी मेमसाब! मैं आ जाऊंगा।’’ छोटा-सा उत्तर देकर वह रसोई की ओर लौट गया।

गोपाल के जाने के बाद मानसी ने नहाकर कपड़े बदले और थकान दूर करने की गरज से कुछ देर वहीं सोफे पर लेट गई। उसे भीतर कहीं लग रहा था कि उसकी यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है – उसका गंतव्य अभी और आगे है। वह कब बेसुध होकर अपने गुजरे दिनों की ओर लौट गई,  उसे कुछ भी सुध नहीं रही।

*

अनिकेत के साथ उसकी अंतरंगता की एक अलग पृष्ठभूमि थी। उसे मित्रता के सामान्य मापदण्डों से समझ पाना आसान नहीं है। खुद अनिकेत को उसके घर-परिवार वाले कम समझ पाते हैं, पत्नी भी कई तरह की आशंकाओं से घिरी रहती है, लेकिन अनिकेत अपनी निजी जिन्दगी के बारे में कभी कोई चर्चा नहीं करते। मानसी जो भी  थोड़ा बहुत उसके बारे में जान पाई, वह इधर-उधर से टुकड़ों-टुकड़ों में मिली जानकारियां थीं,  लेकिन अनिकेत से इस मसले पर बात करने की जब भी कोशिश की, वे टाल जाते थे। बेशक वे भिन्न स्तरों पर एक-दूसरे की रुचियों और रचनात्मक उपलब्धियों से प्रभावित होकर ही एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हुए हों, लेकिन पारिवारिक व्यक्ति के रूप में अनिकेत की अपने घर के प्रति जवाबदेही और साफगोई ने उन तमाम आकर्षणों को वक्त आने पर इस तरह छांट-तराश दिया कि खुद मानसी को ही अपने व्यक्तित्व में अलग तरह की परिपक्वता और परिवर्तन महसूस होने लगा। मानसी से अनिकेत का सारा लगाव इस बात पर टिका हुआ था कि उसकी रचनाशीलता में एक अलग तरह की ताजगी और तड़प दिखाई दी थी उसे। उसकी आरंभिक कविताओं और कैनवास पर उभरते अमूर्त आकारों में जो मौलिकता और संभावनाएं उसे दीख रही थीं, वह उसका सही विकास और विस्तार देखना चाहता था।

मानसी अपने व्यक्तिगत जीवन में इस बात का श्रेय अनिकेत को ही देती है कि रोहित के साथ यह रिश्‍ता और पारिवारिक जीवन उसी के आग्रह और प्रयत्न का प्रतिफल है। इस बात को उसके परिवार वाले भी मानते हैं। यह रिश्‍ता तय होने से पहले रोहित से उसकी कोई व्यक्तिगत मुलाकात नहीं थी, लेकिन उसके बारे में अनिकेत ने इतनी जानकारियां अवश्‍य प्राप्त कर ली थीं कि वह एक संजीदा और संवेदनशील युवक है। उसका वानिकी सेवा में चयन भी निश्चित हो चुका था और वह मानसी के लिए हर तरह से उपयुक्त जीवनसाथी लगा था। मानसी के प्रति उसे यह विश्‍वास जरूर था कि वह जिसे भी अपनाएगी,  उसे अपने आत्मिक लगाव और जीवन में अथक साझेदारी से उसे संवार लेगी।

जिन दिनों वह अनिकेत से मिली थी, वे उसके जीवन के सबसे कठिन दिन थे। उसने कभी सोचा नहीं था कि जिस गौरव को उसने जवानी की दहलीज पर कदम रखने से लेकर अगले चार साल तक जी-जान से प्यार किया, जिसके लिए अपने परिवार वालों की सारी नाराजगियां सहीं, अपने शुभचिन्तकों की हर सलाह की अनदेखी की और जिसके लिए वह हर मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार थी, वही गौरव वक्त आने पर बाहरी दबावों के आगे ऐसे झुक गया, जैसे उनके बीच कभी कुछ हुआ ही न हो। उसे तो एकबारगी सारे रिश्‍ते-नातों पर से आस्था ही उठ गई थी, यहां तक कि खुद अपनी जिन्दगी से भी कोई मोह नहीं रह गया था। वे तमाम सराही जानी वाली रचनाएं और कैनवस पर उकेरी आक़ृतियां उसी टूटन को ही तो व्यक्त कर रही थीं। उस वक्त यह अनिकेत ही थे, जिन्होंने उसे मानसिक यंत्रणा और टूटन के बीच और बिखरने से रोक लिया था। ऐसे ही कठिन दौर में अनिकेत उसकी जिन्दगी में एक सच्चे दोस्त की तरह आए और आत्मीय संरक्षक की तरह उसे उस मानसिक ऊहापोह और मंझधार से बाहर निकाल लाए। उन्होंने ही उसके अन्तःकरण में यह बात बिठाई कि किसी एक बुरे अनुभव से अपनी अनमोल संभावनाओं से भरी जिन्दगी को बेवजह सजा देना खुद अपने साथ भी अन्याय करना है।

अनिकेत के इतने अपनेपन से समझाने का मानसी पर अनुकूल असर अवश्‍य पड़ा। वह थोड़े ही समय में गौरव की बेवफाई के बुरे अनुभव से बाहर निकल आई। उसने अपनी बकाया पढ़ाई पूरी की। अपनी रुचि के कामों को और दिलचस्पी से करने लगी। जब वह पी.एच.डी. कर रही थी, उसी वर्ष एक प्रतिष्ठित वार्षिक कला-प्रदर्शनी में उसकी भी चार कला-कृतियां प्रदेश के बड़े कलाकारों के साथ प्रदर्शन के लिए चयनित की गई – इससे वह बेहद उत्साहित थी। उसी कला-प्रदर्शनी से जुड़ी एक विचार-गोष्ठी में अनिकेत ने जिस तरह सभी अच्छी कला-कृतियों की बारीक व्याख्या की, जिसमें मानसी की कृतियों का विशेष उल्लेख था, उसे सुनकर तो वह बहुत देर तक अभिभूत रही। पहली बार उसके काम को किसी ने सार्वजनिक रूप से इस तरह सराहा था। वह मन-ही-मन अनिकेत के प्रति कृतज्ञता और लगाव से भर उठी थी।

संयोग से उन्हीं दिनों मानसी के घर में उसके रिश्‍ते की भी बात चल रही थी, लेकिन मानसी अभी शादी न करने की जिद पर अड़ी थी। उसने गौरव को तो मन से निकाल दिया, लेकिन किसी नये रिश्‍ते के लिए अपने को तैयार नहीं कर पा रही थी। उधर लड़के वाले मानसी के पिता पर जल्दी फैसला करने के लिए दबाव डाल रहे थे। उनकी दुविधा बढ़ती जा रही थी। उन्हीं दिनों अनिकेत दो-एक बार मानसी के बहुत आग्रह करने पर उसका काम देखने उसके घर आ चुके थे। वे मानसी के पिता से पूर्व परिचित थे और वे भी इस बात को जानते थे कि मानसी अनिकेत का बहुत आदर करती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पिछली मुलाकात के दौरान अकेले में अनिकेत से यह अपेक्षा अवश्‍य की थी कि वे उसे इस अच्छे रिश्‍ते के लिए मनाने में उनकी मदद करें। अनिकेत ने उन्हें आश्‍वस्त किया था कि वे कोशिश करेंगे।

उस दिन आर्ट गैलरी के पास बने रेस्तरां में चाय पीते हुए अनिकेत ने बहुत अपनेपन से मानसी से उस रिश्‍ते के बारे में बात की तो पहले तो वह यही कहकर टालती रही कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती है, लेकिन जब अनिकेत ने ज्यादा जोर दिया तो वह अपनी इच्छा और मनोभावों को दबाकर नहीं रख सकी। उसने दबे स्वर में अनिकेत को बता दिया कि वह तो उन्हीं को पसंद करती है। उसकी यह अप्रत्याशित बात सुनकर अनिकेत एकाएक गंभीर हो गया था। वह गौरव के साथ मानसी के बुरे अनुभव से परिचित था और नहीं चाहता था कि वह फिर किसी तनाव से गुजरे,  इसीलिए उसने बहुत आत्मीयता और संजीदगी से उसे समझाया कि वह जो सोचती है, वह असंभव है। यह उसकी आत्मीयता और धैर्य से समझाने का ही परिणाम था कि मानसी ने उसी दिन घर पहुंचकर रोहित से अपनी शादी का रिश्‍ता कुबूल कर लिया। अनिकेत अपनी व्यस्तताओं के कारण मानसी और रोहित की शादी में तो शरीक नहीं हो पाया, लेकिन शादी से पहले, जब मानसी उसे शादी का कार्ड देने आई तो उसने उसे आगाह जरूर कर दिया कि अब उसे अपने पारिवारिक रिश्‍तों, स्कूल-कॉलेज के दिनों की अपनी दोस्तियों और अपनी रुचियों से जुड़े उन तमाम संपर्कों और संबंधों के बारे में नये सिरे से सोचना और व्यवहार करना होगा, उन्हें अपने पारिवारिक सुख और पति-पत्नी के अंतरंग रिश्‍तों की रोशनी में नये सिरे से जांचना-परखना होगा कि वे किस तरह उनके पारिवारिक जीवन को ऊष्मा और गति प्रदान कर सकते हैं।

मानसी ने अब अपना मन बना लिया था और वह अपने मनोभावों की कोई और परीक्षा नहीं चाहती थी। उसने शादी में आने के लिए अनिकेत पर ज्यादा दबाव भी नहीं डाला। इस आखिरी मुलाकात के बाद अगले कई सालों तक उनके बीच कोई खास संपर्क नहीं रहा। बस जानकारी भर रही कि कौन कहां है। मानसी अपने पारिवारिक जीवन में रम गई थी और अनिकेत उसी विश्‍वविद्यालय में पढ़ाते हुए अब रीडर हो गये थे। इसी बीच उनकी कुछ किताबें भी प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुकी थीं। पत्रिकाओं में उनकी कहानियां और लेख आदि भी छपते रहते थे। उन्हीं दिनों एक पत्रिका में छपी कहानी पर उन्हें अपनी डाक में एक छोटे-से पत्र के रूप में मानसी की प्रतिक्रिया मिली और उसी से यह जानकारी भी कि वह उन्हीं के पास के शहर में रोहित का तबादला होने के कारण आ गई है। उसने यह भी आग्रह किया था कि वे जब कभी उनके शहर आने का संयोग बने तो  उनसे मिले बगैर न जाएं। रोहित को भी उनसे मिलकर बहुत अच्छा लगेगा और इस तरह एक अन्तराल के बाद संबंधों का वह सूत्र फिर से जुड़ गया।

यह फिर से जुड़ा संपर्क कब रोहित और उनके प्रियजनों के बीच संदेह और परेशानी  का कारण बन सकता है,  उन्हें कभी इसका खयाल ही नहीं आया। लेकिन इसी संपर्क और पुराने प्रसंगों को लेकर न जाने कैसे रोहित और मानसी के बीच एक अनावश्‍यक विवाद ने ऐसा तूल पकड़ लिया कि वे एक-दूसरे से खफा होकर अलग-अलग जा बैठे। वन-विभाग की नौकरी में हालांकि पति-पत्नी का साथ-साथ रह पाना संयोग ही माना जाता है, लेकिन साल भर पहले जब रोहित का इस नेशनल पार्क में तबादला हुआ तो मानसी ने उसे इसी रूप में लिया कि रोहित ने उससे नाराज होकर ही अपना तबादला परिवार से दूर इस जंगल में करवाया है।

जब अनिकेत ने मानसी से बहुत आग्रह करके पूछा, तब उसने बताया कि रोहित और उसके बीच अनबन का मूल कारण उन्हीं के बीच का पत्र-व्यवहार है, जो उनके बीच एक सहज संवाद का माध्‍यम था। अनिकेत को यह जानकर दुःख हुआ, बल्कि अपने आप पर झुंझलाहट भी हुई कि उसे इस तरह पति-पत्नी के बीच दुबारा नहीं आना चाहिये था। उसने मानसी को समझाने की कोशिश की कि वह अपने मन में रोहित के प्रति कोई नाराजगी न रखे और जितना जल्दी हो सके, स्वयं उसके पास जाकर गलतफहमियां दूर करे। अनिकेत को सबसे बड़ा आश्‍चर्य इस बात का था कि मानसी जैसी संवेदनशील और टूटकर प्यार करने वाली स्त्री से कोई कैसे रूठकर रह सकता है? उसी के आग्रह पर मानसी ने पहले तो पत्रों के माध्‍यम से अनिकेत के साथ अपने निर्मल रिश्‍ते की खुलासा जानकारी दी और फिर उसकी गैर-मौजूदगी के कारण घर में उसे और बच्चों को होने वाली कठिनाइयों और मानसिक पीड़ा का विस्तार से जिक्र किया। उन पत्रों के बाद भी जब रोहित का कोई जवाब नहीं आया तो वह चिन्तित हो उठी।

मानसी एक पढ़ी-लिखी और समर्थ स्‍त्री थी, अपनी और बच्चों की आवश्‍यकताओं के लिए वह किसी पर निर्भर नहीं थी। खुद एक एडवरटाइजिंग एजेन्सी में आर्ट डायरेक्टर का काम करती थी, इसके बावजूद वह पति को सदैव घर के मुखिया के रूप में ही देखती थी। शुरू के कुछ वर्षों में तो उसने रोहित की तबादलों वाली नौकरी और बच्चों की परवरिश के कारण किसी एक शहर में स्थाई रूप से बसने के बारे में कभी सोचा नहीं था। रोहित के तबादले के साथ वे जहां भी जाते, मानसी थोड़े समय में ही वहां अपनी रुचि का काम ढूंढ़ लेती।  इससे उसका मन लगा रहता और पारिवारिक कामों में भी मदद रहती। जब तीन महीने गुजर जाने के बाद भी न रोहित घर आया और न ही कोई जवाब आया, तो उसका चिन्तित हो उठना स्वाभाविक था। उसने तुरन्त पत्र लिखकर मायके से मां को बुलवा लिया और उसे घर और बच्चों की जिम्मेदारी सौंपकर वह खुद रोहित के सामने आ खड़ी हुई।

*

रोहित के साथ दिन भर की जंगल-यात्रा में मानसी ने उसके मन को कई तरह से टटोलने की कोशिश की – यह जानने के लिए कि कहीं कोई आशंका या सवाल अब भी मन में बचा हुआ तो नहीं है। जो कुछ वह अपने पत्रों में बयान कर चुकी थी, क्या उन्हीं बातों को फिर से दोहराने या उन्हें और खोलकर समझाने की जरूरत बाकी रह गई है? जो खुलापन और अन्तरंगता वैवाहिक जीवन के दस वर्षों में उनके बीच बनी रही, वह किसी काल्पनिक आशंका या सन्देह-मात्र से बाधित कैसे हो सकती है? क्या उनके बीच के रिश्‍ते की बुनियाद इतनी कमजोर है?

वे दोनों अपने आप में खोए हुए सोफे के दो छोरों पर बैठे शाम की चाय पी रहे थे। बैठक की खिड़की के बाहर कहीं दूर से आती वन्य-प्राणियों और पक्षियों की आवाजें अनायास ही मानसी का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी। यों सुबह की छोटी-सी बातचीत और दोपहर बाद रोहित के साथ जंगल की यात्रा के बाद दोनों के बीच तनाव का कोई चिन्ह नहीं दीख रहा था – खुद रोहित भी जंगल में घूमते हुए बहुत उत्साह से उसे अभयारण्य की खूबियों के बारे में विस्तार से बताते जा रहे थे। उसे यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि वह अलग-अलग प्राणियों की आदतों और गतिविधियों के बारे में कितना-कुछ जानता हैं,  यहां तक कि कुछ प्राणियों की आवाजों और उनकी हरकतों को इतनी खूबी से पहचानता है कि देखकर ताज्जुब होता है। जंगल में घूमते हुए वह किस तरह वायरलैस के जरिए समूचे जंगल में फैले वन-कर्मियों के काम पर अपनी पकड़ रखता है, किस समय कौन-सा बड़ा जानवर किस इलाके में घूम रहा है, वह हर पल इसकी पूरी खबर रखता है। वह रोहित की इस कार्य-शैली और क्षमता पर मन ही मन रीझ रही थी, लेकिन एक सवाल अब भी उसके मन में खटक रहा था कि सब कुछ की इतनी खबर रखने वाला और सबके साथ इतना खुला व्यवहार करने वाला यह शख्स अपने ही घर-परिवार और अन्तरंग रिश्‍तों के प्रति इतना शंकालु क्यों है?  जंगल-यात्रा के दौरान जीप में एक और वनकर्मी साथ होने के कारण वे ज्यादा निजी बातें तो नहीं कर सके, लेकिन पूरी यात्रा के दौरान मानसी ने यह महसूस जरूर किया कि वह पहले वाला संशय और तनाव अब नहीं था।  सुबह से अब तक यह जरूर लग रहा था कि रोहित उससे खुलकर बात नहीं कर रहा,  लेकिन ऐसा भी कुछ जाहिर नहीं कर रहा था जिससे यह अनुमान हो कि उसके मन में मानसी के प्रति किसी तरह का संशय या सन्देह बना हुआ है। जंगल में झरने के पास थोड़ा एकान्त मिलने पर मानसी ने जब सीधे अपने पत्रों के बारे में पूछा तो तुरन्त उसने यह कहते हुए बात को संक्षेप में समेट दिया कि वह सब उसका बेकार का वहम था, जो वह कब का भूल चुका है।

‘‘तो फिर क्या बात है रोहित?’’ पूछते हुए अधीर-सी हो उठी थी मानसी, लेकिन रोहित तब भी शान्त था। उसने चारों ओर नजर दौड़ाते हुए घड़ी की ओर देखा और इतना ही कहा था, ‘‘हम इस पर तसल्ली से बात करेंगे मानसी।’’ और यह कहते हुए वह वहीं से वापस लौट पड़ा था।

मनसी ने चाय का आखिरी घूंट लेकर प्याला वहीं सामने टेबल पर रख दिया और अपनी जगह से उठकर पिछवाड़े की ओर खुलने वाली खिड़की पर पहुंच गई थी। यहां से पश्चिम का आकाश साफ दिखता था। सूरज अब डूब चुका था, लेकिन रोशनदान से भीतर आने वाले उजास का असर बैठक में अब भी बरकरार था, इसलिए बत्ती अभी नहीं जलाई गई थी। थोड़ी और रोशनी के लिए मानसी ने खिड़की का पर्दा जब हटा दिया तो उसकी नजरें खिड़की के पार दीखते खुले आसमान पर टिक गई। वह देर तक खोई हुई-सी उस खुले आसमान के टुकड़े पर उड़ते हुए पक्षियों का आना-जाना देखती रही।

रोहित न जाने कब अपनी सीट से उठकर उसके पीछे आ खड़ा हुआ था,  इसका आभास उसे तब हुआ जब उसे अपनी पीठ और कंधों पर हल्का दबाव और अपनी बगल से निकल आए दो आत्मीय हाथों का स्पर्श उसी दृश्‍य की ओर बहा ले जाता हुआ-सा प्रतीत हुआ – वह एकाएक उस स्पर्श और दबाव में बेसुध होकर बह गई। उसने उन हाथों की कलाइयों को अपने हाथों में बांध लिया। उसे अपने दाएं कान और गाल पर रोहित की गर्म सांसों की मिठास और भी बेसुध किये दे रही थी। वह समय, स्थान और अपनी अवस्था की सारी संज्ञाएं भूल गई थी और उसकी पलकें अपने आप मुंद गई थी। जाने कितनी देर वे उसी अवस्था में बेसुध-से खड़े रहे और जब संज्ञा में लौटे तो सामने का दृश्‍य बदल चुका था। बाहर खुले आसमान पर अब तारे निकल आये थे और बैठक की हर चीज अंधेरे में डूब चुकी थी। रोहित के इस पार्श्‍व आलिंगन से मुक्त होते ही मानसी ज्यों ही बत्ती जलाने के लिए पीछे की ओर घूमी,  रोहित ने फिर उसे अपने गहरे आलिंगन में बांध लिया।

*

देह की अपनी भाषा होती है, वह अपना संवाद स्‍वयं रचती है। उसके राग-विराग का अपना व्‍याकरण है और अपनी संपुष्टि। सम पर लौट आने के बाद जो बच रहता है, उसी को सुलझाने का प्रयास करती है मानवीय संवाद की वह भाषा, जिसे बरतने का अभ्‍यास रोहित के पास बेशक कम रहा हो, लेकिन इन्‍हीं वन्‍य-प्राणियों के संसर्ग में रहते हुए उस नैसर्गिक रिश्‍ते की अहमियत को उसने जान अवश्‍य लिया था। जिन अनुकूल अवसरों को वह अमूमन चूक जाता रहा और फिर हर बार किसी अनिर्णय में जाकर अटक जाता, अब उस अवस्‍था से बाहर आने का संकल्‍प उसके भीतर आकार लेने लगा था। उस रात जब पहली बार रोहित ने हिम्‍मत जुटाकर बिना कोई अतिरिक्‍त वास्‍ता लिये-दिये मानसी के वे सारे गिले-शिकवों को दूर करने और अपने व्‍यवहार का परिमार्जन करने का मन बनाया तो पहले से कुछ भी तय नहीं था। बल्कि अपनी इसी मनोदशा को उसने संवाद का आधार बना लिया था। खुद मानसी को भी लगा कि रोहित के इन कठिन अनुभवों और मानसिक तनावों के सामने उसके अपने किशोर अनुभव तो जैसे कुछ भी नहीं थे। अपने दैहिक आवेग से उबर आने के बाद रोहित ने गंहरे सोच-विचार के साथ वह सब कहने-बताने का मानस बनाया था, जो वह अब तक मानसी के साथ कभी साझा नहीं कर पाया। उसकी उपस्थिति और स्‍पंदन को अपने भीतर महसूस करते हुए मानसी को हालांकि अब किसी अतिरिक्‍त संवाद की अपेक्षा नहीं रह गई थी, लेकिन जब रोहित ने अपने अतीत के उन अदृश्‍य हवालों की ओर उसका ध्‍यान आकर्षित करते हुए बोलना शुरू किया तो वह अवाक्-सी उसके चेहरे की ओर देखती रह गई थी –

‘‘मुझे इस बात का अफसोस है मानसी कि मैंने पिछले दिनों अपने अजीबोगरीब  बरताव से तुम्हें दुःख पहुंचाया है…. तुमने तो अपने पत्रों के जरिये अपना मन खोलकर मेरे सामने रख भी दिया और तुम्हें शायद यह लगता रहा कि जैसे मैं तुम्हारी बातों पर यकीन नहीं कर पा रहा हूं…. पर असल में ऐसा था नहीं मानसी,  मेरी अपनी दुविधाएं कुछ कम नहीं रही…. पता नहीं, मैं तुम्हें ठीक से बता भी पाऊंगा या नहीं….।’’ कहते हुए  रोहित फिर यकायक चुप्प-सा हो गया था। मानसी ने हल्‍के-से उसके हाथ को चूमा और उसे आश्‍वस्‍त किया कि वह अपनी बात कहे।

आज उसके सामने वाकई एक नया रोहित था जो रुक-रुककर कुछ कहने की कोशिश कर रहा था, ‘‘असल में मैं तुम्हारे जितना खुला और बेलाग व्यक्ति नहीं हूं, मानसी…. अपनी कमजोरियां और सीमाएं अब जानने लगा हूं, शायद तुम्हारे इसी खुलेपन ने आज मुझे इतनी हिम्मत दी है कि तुम्हारे सामने अपना उलझा हुआ अतीत और अपना अन्तःकरण खोलकर रख सकूं….. मैं कलाकार नहीं हूं और शायद मेरे पास बयान करने के लिए अच्छी भाषा भी नहीं है, लेकिन मैं उम्मीद करूंगा कि तुम मुझे ग़लत नहीं समझोगी और इस बात का बुरा भी नहीं मानोगी कि अपने वैवाहिक जीवन के दस साल बाद मैं इस रूप में तुम्हारे सामने खुल रहा हूं…’’

और इस कैफियत के साथ कुछ क्षण मौन रहने के बाद जब पहली बार रोहित ने यह रहस्योद्घाटन किया कि वह अपनी इस शादी से पहले किसी और को अपना जीवनसाथी बनाने का निश्‍चय कर चुका था और उसको लेकर उसके जीवन में कई सालों तक उथल-पुथल रही है तो उसे लगा कि जैसे इस रोहित से वह पहली बार मिल रही है। वह बिना कुछ कहे उसकी ओर देखती रही और सांस रोककर सुनती रही।

रोहित बता रहे थे कि वह अपने कॉलेज के दिनों में शालिनी नाम की लड़की से बेहद प्यार करते थे, जिससे विवाह न कर पाने का अफसोस उसे बरसों तक भीतर से कचोटता रहा। वह खूबसूरत और समझदार थी, लेकिन गरीब थी। अपने घर में वह बहुत उपेक्षा और बुरे अनुभवों के बीच से गुजरकर बड़ी हुई थी। वह बड़ी मुश्किल से कॉलेज में दाखिला ले पाई थी – बस किसी तरह पढ़-लिखकर उस दशा से बाहर निकल आना चाहती थी और उसी में उसे मदद की जरूरत थी। उसके शराबी पिता ने पैसा लेकर उसका रिश्‍ता अपनी ही बिरादरी के एक ऐसे दुहाजू व्यक्ति से तय कर दिया था, जिससे उसका कोई मेल नहीं था। उसने विरोध भी किया, लेकिन उसका साथ देने वाला कोई नहीं था। एक दिन शालिनी की मर्जी के खिलाफ उस व्‍यक्ति के साथ उसकी शादी कर दी गई, जिसकी पहली बीबी उसी के जुल्म सहती मर गई थी। शालिनी उससे बचने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी, यहां तक कि रोहित के साथ भाग जाने को भी। शादी की तारीख से पहले उसने कई बार रोहित से मदद के लिए आग्रह किया, लेकिन वह कभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाया।

शादी के बाद शालिनी की पढ़ाई छूट गई और वह उस घर में बंदी होकर रह गई। इसी अपराधबोध और दुःख के कारण रोहित का अपने घरवालों के साथ भी व्यवहार सामान्य नहीं रह गया। अपनी पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद जब घर में उसके लिए रिश्‍ते आने शुरू हुए तो उसने किसी रिश्‍ते के लिए अपनी सहमति नहीं दी। आखिर शालिनी को जब इस बात की खबर लगी कि वह उसी के कारण शादी नहीं कर रहा है, तो उसे अफसोस हुआ। वह तब भी भीतर से कहीं उसके लिए लगाव महसूस करती थी। आखिर उसी के कहने-समझाने पर उसने मानसी का रिश्‍ता मंजूर किया था। अपनी जिन्दगी को शालिनी ने नियति मान लिया था। वह आज भी उनके परिवार की उतनी ही चिन्ता करती है, लेकिन कहीं रोहित और मानसी के बीच गलतफहमी का कारण न बन जाए,  इसलिए उनकी शादी के बाद उसने कभी संपर्क बनाए रखने की कोशिश नहीं की।

समय गुजरने के साथ घर में शालिनी के पति का बरताव और बिगड़ता चला गया। वह रोहित और शालिनी के आपसी लगाव के बारे में जानता था। उसने कई तरह के उल्टे-सीधे लांछन भी उस पर लगाये, लेकिन शालिनी सारी तकलीफें उठाकर भी यही कोशिश करती रही कि उसका पारिवारिक जीवन किसी तरह बचा रहे। वह दो बेटियों की मां बन चुकी थी, लेकिन उस निर्मम आदमी का मन वह नहीं बदल सकी… उसका पारिवारिक जीवन नष्ट हो गया। यही बात रोहित को लगातार कचोटती रही और शालिनी की इस दशा के लिए वह आज तक अपने को माफ नहीं कर पाया… यही सब बातें मानसी को बताते हुए वह गहरे अवसाद में डूब गया था और सिरहाने रखे तकिये पर पीठ टिकाकर छत की ओर देखने लगा था। मानसी उसी की ओर मुंह किये, बैड के सिरहाने से अपनी पीठ टिकाए उसे सुनती रही। रोहित के चुप हो जाने के बाद उसने सिर्फ इतना-सा पूछा, ‘‘ये वही शालिनी है न, जो ‘आस्था’ के साथ काम करती है?’’

‘‘हां वही, मगर….’’ वह कुछ और पूछता, लेकिन उसे अनसुना करते हुए मानसी ने अपनी बात जारी रखी – ‘‘लेकिन वह तो अपनी दोनों बेटियों के साथ अलग रहती है शायद? उसके पति तो साथ नहीं रहते।’’

‘‘तुम शालिनी को जानती हो मानसी?’’ रोहित ने आश्‍चर्य से उसकी ओर देखते पूछा था।

‘‘बस इतना ही कि वह एक साहसी स्त्री है, वह अपने पांवों पर खड़ी है और स्त्रियों की स्वयंसेवी संस्था ‘आस्था’ के साथ काम करती है। मैंने पहली बार उसे उसी संस्था के आयोजन में बोलते हुए सुना था – अच्छा बोलती है, वह तो कहीं से भी असहाय या कमजोर नहीं लगती।’’

‘‘यही तो उसकी खूबी है मानसी! वह अपने भीतर के दर्द को छुपाकर रखती है। उसने मुझसे कभी नहीं कहा कि उसने क्या-कुछ सहा है। मुझे उसके आस-पड़ौस और परिचितों से ही उसके बारे में जानकारियां मिलती रही हैं।’’

‘‘तो आपकी उससे अब मुलाकात नहीं होती?’’ पहली बार मानसी ने अविश्‍वास से उसकी आंखों में देखते हुए पूछा था।

‘‘बहुत कम… कभी-कभार संयोगवश! बस, पिछले दिनों यहीं पास के जिला मुख्यालय पर एक आयोजन में उससे मिलना हुआ था। मैं तो उससे सहानुभूति प्रकट करने ही उसके पास गया था…. जब थोड़ी देर अकेले में उससे बात हुई तो मुझे यह जानकर तकलीफ हुई कि उसकी मेरे बारे में अच्छी राय नहीं थी… मेरी सहानुभूति में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी… वह तो उल्टे मुझे ही नसीहत दे रही थी कि मैं अपने घर को ठीक तरह से संभालूं… ऐसा क्यों हुआ मानसी…. उसने ऐसा रूखा बरताव क्यों किया मेरे साथ? …पिछले सप्ताह भर से यही बात मुझे बराबर कचोटती रही है।’’

फिर जैसे कुछ सोचते हुए उसने पूछा, ‘‘कहीं ये तुम्हारी उस मुलाकात का परिणाम तो नहीं था, मानसी?’’ और उसने अपनी आंखें मानसी के चेहरे पर टिका ली थी।

इस अंतिम प्रश्‍न से मानसी एकाएक चौंक गई,  इसके बावजूद संयत रहते हुए   उसने इतना ही कहा, ‘‘नहीं, मुझसे तो ऐसी कोई बात नहीं हुई, बल्कि उससे पहली बार मिलने पर मुझे आश्‍चर्य जरूर हुआ था कि वह हमारे बारे में कितना कुछ जानती है। तुम्हारे बारे में पूछने पर उसने इतना ही बताया था कि तुम दोनों साथ पढ़े हो और इसी नाते वह तुम्हें जानती है। मुझे थोड़ा अजीब लगा था कि उस पहली ही मुलाकात में वह हमारे आपसी रिश्‍तों को लेकर कितनी दिलचस्पी दिखा रही थी, लेकिन मैंने उसे कुछ नहीं बताया। बस जाते जाते उसने यह जरूर कहा था कि तुम बहुत अच्छे इन्सान हो… मुझे तुम्हें और बेहतर ढंग से समझना चाहिए! ….उस मुलाकात के बाद एक दिन अचानक अनिकेत से भी यह पता लगा कि वे एक-दूसरे से अच्छी तरह परिचित हैं…. उनकी संस्था के काम में अनिकेत से उनका अक्सर मिलना होता है… हो सकता है, अनिकेत से हमारे पारिवारिक जीवन के बारे में उनके बीच कोई बात हुई हो…’’ लेकिन यह सब बताते हुए मानसी फिर जैसे अपनी ही चिन्ता में डूब गई थी।

वे एकबारगी चुप हो गये थे। रोहित तकिये पर सिर टिकाकर अब पीठ के बल लेट गया था और वह भी कुछ क्षण बाद उसकी बगल में सीधी लेट गई थी। कुछ पल बाद रोहित की ओर करवट लेकर मानसी ने उसकी आंखों में देखते हुए इतना ही पूछा था, ‘‘रोहित, क्या तुम्हें यह अजीब नही लगता कि हमारे रिश्‍तों के बीच और लोग आकर हमें समझाने का प्रयत्न करते हैं… क्या पति-पत्नी से भी ज्‍यादा करीब कोई और रिश्‍ता हो सकता है?’’

रोहित ने उसके खुले वक्ष में अपना सर छुपाते हुए इतना ही कहा था, ‘‘मुझे माफ कर दो मानसी! …अब ऐसा कभी नहीं होगा, ….प्लीज, बिलीव मी!’’ और मानसी ने उसके सर को सहलाते हुए फिर से उसे अपने अंक में समेट लिया था।

***

कुछ प्रेम कविताएं अपनी


तुम्‍हारी याद

 

आज फिर आई तुम्‍हारी याद

तुम फिर याद में आई –

आकर समा गई चौतरफ

समूचे ताल में ।

रात भर होती रही बारिश

रह-रह कर हुमकता रहा आसमान

तुम्‍हारे होने का अहसास –

कहीं आस-पास

भीगती रही देहरी

आंगन-द्वार

मन तिरता-डूबता रहा

तुम्‍हारी याद में।


उसकी स्मृतियों में

जिस वक्त में यहाँ होता हूँ

तुम्हारी आँख में

कहीं और भी तो जी रहा होता हूँ

किसी की स्मृतियों में शेष

शायद वहीं से आती है मुझमें ऊर्जा

इस थका देने वाली जीवन–यात्रा में

फिर से नया उल्लास

एक सघन आवेग की तरह

आती है वह मेरे उलझे हुए संसार में

और सुगंध की तरह

समा जाती है समय की संधियों में मौन

मुझे राग और रिश्तों के

नये आशय समझाती हुई।

उसकी अगुवाई में तैरते हैं अनगिनत सपने

सुनहरी कल्पनाओं का अटूट एक सिलसिला

वह आती है इस रूखे संसार में

फूलों से लदी घाटियों की स्मृतियों के साथ

और बरसाती नदी की तरह फैल जाती है

समूचे ताल में

उसी की निश्छल हँसी में चमकते हैं

चाँद और सितारे आखी रात

रेतीले धोरों पर उगते सूरज का आलोक

वह विचरती है रेतीली गठानों पर निरावेग

उमड़ती हुई घटाओं के अन्तराल में गूँजता है

लहराते मोरों का एकलगान

मन की उमंगों में थिरक उठती है वह

नन्हीं बूँदों की ताल पर।

उसकी छवियों में उभर आता है

भीगी हुई धरती का उर्वर आवेग

वह आँधी की तरह घुल जाती है

मेह के चौतरफा विस्तार में

मेरी स्मृतियों में

देर तक रहता है उसके होने का अहसास

सहेज कर जीना है

उसकी ऊर्जा को अनवरत।

 

मैं जो एक दिन

मैं जो एक दिन

तुम्हारी अधखिली मुस्कान पर रीझा,

अपनों की जीवारी और जान की खातिर

तुम्हारी आंखों में वह उमड़ता आवेग –

मैं रीझा तुम्हारी उजली उड़ान पर

जो बरसों पीछा करती रही –

अपनों के बिखरते संसार का,

तुम्हारी वत्सल छवियों में

छलकता वह नेह का दरिया

बच्चों की बदलती दुनिया में

तुम्हारे होने का विस्मय

मैं रीझा तुम्हारी भीतरी चमक

और ऊर्जा के उनवान पर

जैसे कोई चांद पर मोहित होता है –

कोई चाहता है –

नदी की लहरों को

बांध लेना बाहों में !

ÛÛÛ

 

तुम्हारा होना

तुम्हारे साथ

बीते समय की स्मृतियों को जीते

कुछ इस तरह बिलमा रहता हूं

अपने आप में,

जिस तरह दरख्त अपने पूरे आकार

और अदीठ जड़ों के सहारे

बना रहता है धरती की कोख में ।

जिस तरह

मौसम की पहली बारिश के बाद

बदल जाती है

धरती और आसमान की रंगत

ऋतुओं के पार

बनी रहती है नमी

तुम्हारी आंख में –

इस घनी आबादी वाले उजाड़ में

ऐसे ही लौट कर आती

तुम्हारी अनगिनत यादें –

अचरज करता हूं

तुम्हारा होना

कितना कुछ जीता है मुझ में

इस तरह !

ÛÛÛ

तुम यकीन करोगी

तुम यकीन करोगी –

तुम्हारे साथ एक उम्र जी लेने की

कितनी अनमोल सौगातें रही हैं मेरे पास:

सुनहरी रेत के धोरों पर उगती भोर

लहलहाती फसलों पर रिमझिम बरसता मेह

कुछ नितान्त अलग-सी दीखती हरियाली के बिम्ब

बरसाती नदियों की उद्दाम लहरें

और दरख्तों पर खिलते इतने इतने फूल…….

कोसों पसरे रेतीले टीबों में

खोए गांवों की उदास शामें –

सूनी हवेलियों के

बहुत अकेले खण्डहर,

सूखे कुए के खम्‍भों पर

प्यासे पंछियों का मौन

अकथ संवाद,

कुलधरा-सी सूनी निर्जन बस्तियां

मन की उदासी को गहराते

कुछ ऐसे ही दुर्लभ दरसाव

हर पल धड़कती फकत् एक अभिलाषा –

जीवन के फिर किसी मोड़ पर

तुम्हारी आंख और आगोश में

अपने को विस्मृत कर देने की चाह

और यही कुछ सोचते सहेजते

मैं थके पांव लौट आता हूं

बीते बरसों की धुंधली स्मृतियों के बीच

गो कि कोई शिकायत नहीं है

अपने आप से –

फकत् कुछ उदासियां हैं

अकेलेपन की !

ÛÛÛ

एक आत्मीय अनुरोध

कहवाघरों की सर्द बहसों में

अपने को खोने से बेहतर है

घर में बीमार बीबी के पास बैठो,

आईने के सामने खड़े होकर

उलझे बालों को संवारो –

अपने को आंको,

थके हारे पड़ौसी को लतीफा सुनाओ

बच्चों के साथ सांप-सीढ़ी खेलो –

बेफ़िक्र     फिर जीतो चाहे हारो,

कहने का मकसद ये कि

खुद को यों अकारथ मत मारो !

जरूरी नहीं

कि जायका बदलने के लिए

मौसम पर बात की जाए

खंख किताबों पर ही नहीं

चौतरफ    दिलो-दिमाग पर

अपना असर कर चुकी है –

खिड़की के पल्ले खोलो

और ताजा हवा लेते हुए

कोलाहल के बीच

उस आवाज की पहचान करो

जिसमें धड़कन है ।

आंख भर देखो उस उलझी बस्ती को

उकताहट में व्यर्थ मत चीखो,

बेहतर होगा –

अगर चरस और चूल्हे के

धुंए में फ़र्क करना सीखो !

– नंद भारद्वाज

ÛÛÛ

मुक्तिबोध रचना शिविर, राजनांदगांव

राजनांदगांव में मुक्तिबोध रचना शिविर : एक विरल अनुभव

महानगरों और प्रादेशिक राजधानियों के सुविधाजनक ठिकानों से निकलने वाली नयी रचनाशीलता की दावेदार साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रतिस्‍पर्धी दौर में किसी दूर-दराज के कस्‍बे या जिला मुख्‍यालय जैसी साधारण जगह पर कोई साहित्यिक आयोजन या सार्थक संवाद संभव कर लेना असंभव भले न सही, आसान अब नहीं रह गया है। पहली दिक्‍कत तो यही आती है कि इन स्‍थानों पर साहित्‍य के स्‍वनामधन्‍यों और बड़े रचनाकारों को जुटाया कैसे जाय, अगर किसी तरह भाग लेने के लिए मना भी लें तो उन्‍हें अच्‍छे परिहास में कैसे रखा जाए, ताकि नये रचनाकारों के बीच वे उन्‍हीं के धरातल पर सहजता से संवाद कायम रख सकें। ऐसी संस्‍थाओं के पास अनुभव और साधन तो सीमित होते ही हैं, उनके बारे में दुष्‍प्रचार करने वाले सोखी-दोखी भी कम नहीं होते। महानगरों के मसीहा खुद भले कुछ न करना चाहें, लेकिन छोटे शहरों की कोई दूसरी संस्‍था इस तरह के आयोजन का साहस कर ले, तो उन्‍हें उसमें बीस तरह की खामियां नजर आने लगती हैं और फिर आशंकाओं का तो कहना ही क्‍या? कुछ इसी तरह की अटपटी और विकट स्थितियों में छत्‍तीसगढ़ जैसे नवोदित राज्‍य के छोटे शहरों और कस्‍बों में पिछले कुछ सालों में साहित्‍य-संस्‍कृ‍ति के सुरुचिपूर्ण आयोजन करने वाली साहित्यिक संस्‍था प्रमोद वर्मा स्‍मृति संस्‍थान ने विगत 17 से 20 दिसंबर 2010 के बीच हिन्‍दी के प्रतिष्ठित कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कर्मस्‍थली राजनांदगांव में एक विलक्षण रचना शिविर आयोजित करने की परिकल्‍पना कर ही डाली।

कोई तीन महीने पहले इस रचना शिविर में शामिल होने के लिए जब मेरे सामने यह प्रस्‍ताव आया तो मैं खुद असमंजस में था। तब यह आयोजन 13, 14 और 15 नवंबर को बिलासपुर में आयोजित किये जाने का प्रस्‍ताव था और प्रस्‍तावित रूपरेखा के अनुसार भाग लेने वाले वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों में सीताकान्‍त महापात्र, अशोक वाजपेयी, राजेन्‍द्र यादव, केदारनाथसिंह, चंद्रकान्‍त देवताले, विश्‍वनाथप्रसाद तिवारी, प्रभाकर श्रोत्रिय, वीरेन डंगवाल, उदयप्रकाश, अनामिका जैसे कितने ही चर्चित नाम देखकर यह जरूर लगा कि ऐसे रचना‍ शिविर में भाग लेना निश्‍चय ही उपलब्धि होगी। प्रारंभ में यही कुछ सोचकर मैंने उसमें भाग लेने का मन बना लिया था। बाद में संयोजक जयप्रकाश मानस ने जब यह सूचना दी यह आयोजन किसी कारणवश प्रस्‍तावित तिथियों पर नहीं होगा और नई तिथियों की सूचना फिर से दी जाएगी, तो बात आई-गई होती लगी थी। इस सूचना के महीने भर बाद जब उन्‍होंने फिर सूचना दी कि अब यह आयोजन 17 से 20 दिसंबर के बीच राजनांदगांव में होगा, तो मेरे लिए यह इस लिहाज से और भी महत्‍वपूर्ण हो गया कि वह मुक्तिबोध की कर्मभूमि पर होने जा रहा था, जहां मैं पिछले कई सालों से जाने का सपना संजोए हुए था। मैंने मानसजी को तुरंत  अपनी स्‍वी‍कृति से अवगत करा दिया और इस अवसर पर प्रकाशित की जानेवाली उनकी पत्रिका ‘पांडुलिपि’ के लिए मुक्तिबोध पर अपना आलेख भी भेज दिया। इस आलेख पर उनकी सकारात्‍मक प्रतिक्रिया ने मेरे हौसले को और बढा दिया। आयोजन की निर्धारित रूपरेखा के अनुसार मुझे उसमें एक सत्र को संबोधित भी करना था, सो मैं उसी  की तैयारी में जुट गया। बीच में कुछ निजी कारणों से ऐसा भी लगा कि शायद मैं न जा पाऊं और मैंने मानस को फोन पर अपनी कठिनाई से अवगत भी करा दिया। लेकिन जब मेरी इस बात से वे थोड़ा निराश लगे और यह भी लगा कि मेरी इस असमर्थता को वे बहाना मान रहे हैं, जैसे मैं किसी और के बहकावे में आकर वहां जाने से बच रहा हूं – तो मैंने अपनी कठिनाई के बावजूद तुरंत आयोजन में पहुंचने का मन बना लिया और उन्‍हें आश्‍वस्‍त भी कर‍ दिया। इस सहमति के बाद जब रेल टिकट के बारे में पता किया तो ज्ञात हुआ कि निर्धारित तिथि का रेल्‍वे आरक्षण उपलब्‍ध नहीं है, मैंने हवाई यात्रा से रायपुर पहुंचने का निश्‍चय कर लिया। ऐसा तय करते हुए इस बात के लिए भी तैयार हो गया था कि मैं आयोजन की निर्धारित व्‍यवस्‍था के अनुसार सिर्फ रेल यात्रा का ही मार्ग-व्‍यय ग्रहण करूंगा।

अपनी इस यात्रा में 15 दिसंबर को मुझे दिल्‍ली के साहित्यिक मित्रों के बीच ‘एक कवि एक शाम’ कार्यक्रम में काव्‍य-पाठ करना था और अगले दिन 16 दिसंबर की सर्द सुबह साढ़े छह बजे दिल्‍ली से रायपुर के लिए रवाना होना था। तय कार्यक्रम के अनुसार मैं सुबह साढ़े आठ बजे रायपुर पहुंच गया। विमान जब इस नगर के आकाश पर पहुंचा तो नीचे का नजारा देखने लायक था। नगर के बीचो-बीच दूर से दिखते छोटे-छोटे तालाब और जलाशय अनायास यह आश्‍वस्ति दे रहे थे कि इस जमीन पर जल का कोई अभाव नहीं है। शायद यह बात मुझ सरीखे मरुस्‍थलीय हलके के व्‍यक्ति के लिए और भी महत्‍व रखती है। एयरपोर्ट पर स्‍वयं मानस मुझे रिसीव करने के लिए मौजूद थे। दोपहर तक यहीं एक अतिथिगृह में विश्राम करने के बाद अपरान्‍ह 3 बजे मैं मानस और उनकी टीम के साथ कार से राजनांदगांव के लिए रवाना हो गया। इसी रास्‍ते पर देश का सबसे बड़ा इस्‍पात केन्‍द्र भिलाई आता है, जिसकी गगनचुंबी चिमनियां दूर ही दीखने लगी थीं। जाने क्‍यों भिलाई से गुजरते हुए अनायास बरसों पहले यहीं एक अप्रिय शहादत के शिकार श्रमिक नेता शंकरगुहा नियोगी और हाल ही में आदिवासियों के प्रति सहानुभूति रखने के कारण चर्चा में आए डॉ विनायक सेन की याद ताजा हो आई। इस दुखद स्‍मृति के साथ ही मन में एक अव्‍यक्‍त-सी उदासी भर आई। अपनी इस स्‍मृति और अहसास को मन ही में घुलाते मैं मौन भाव से इस औद्योगिक नगरी से गुजर गया और थोड़ी ही देर में हम दुर्ग होते हुए सूर्यास्‍त से पहले अपने गंतव्‍य स्‍थल राजनांदगांव पहुंच गये।

आम बोल-चाल में इस कस्‍बे का पूरा नाम प्राय: कम ही लोग लेते हैं, उनका काम नांदगांव से ही चल जाता है, जो शायद पहले कभी गांव ही रहा हो। लेकिन अब तो यह अच्‍छे खासे शहर की शक्‍ल अख्तियार कर चुका है। शहर के बीचो-बीच से गुजरते नेशनल हाईवे पर इन दिनों फ्‍लाई-ओवर बनने का काम तेजी से जारी है। इस हाईवे ने पूरे कस्‍बे को दो भागों में बांट दिया है। रायपुर से पश्चिम दिशा की ओर कोई 70 किलो- मीटर की दूरी पर स्थित यह जिला मुख्‍यालय, छत्‍तीसगढ़ राज्‍य का एक संवेदनशील हलका माना जाता है।

आयोजन स्‍थल सिन्‍धु भवन पहुंचने पर वहां मौजूद कई स्‍थानीय साहित्‍यकारों और कार्यकर्त्‍ताओं से परिचय हुआ। सबसे मुलाकात के बाद रात्रि-विश्राम के लिए मुझे स्‍थानीय राजकीय विश्राम-गृह पहुंचा दिया गया। यहां पहुंचने के बाद मेरी पहली इच्‍छा यही थी कि मैं जल्‍द-से-जल्‍द उन स्‍थानों को अवश्‍य देख आऊं, जिनका मेरे प्रिय कवि मुक्तिबोध के जीवन और कविताओं से गहरा संबंध रहा है। अपनी इसी इच्‍छा को मन में दोहराते उस दो-मंजिले विश्राम-गृह की बालकनी से मैं हल्‍की ठंड के बावजूद रात्रि के स्‍याह अंधेरे में देर तक नांदगांव की झिलमिलाती रौशनियां और अपनी स्‍मृति में अंकित मुक्तिबोध की कविताओं के अनेकानेक बिम्‍ब याद करता रहा, जो बरसों से मेरे अवचेतन में घूमते रहे हैं। अगले दिन अपरान्‍ह 4 बजे इस रचना शिविर की विधिवत शुरुआत होनी थी। उस लिहाज से 17 दिसंबर के शुरुआत का तीन-चौथाई दिन सहज ही मेरे पास भ्रमण के लिए उपलब्‍ध था। मैं रात को सोने से पहले ही मन में यह निश्‍चय कर चुका था कि सुबह उठते ही पहला काम यही कर लेना है। उसी रात से प्रतिभागी रचनाकारों का भी आने का सिलसिला जारी था, जो अगली शाम तक जारी रहा। सवेरे उसी अभियान पर निकलने से पहले कुछ देर के लिए मैं सिन्‍धु भवन आया तो बाहर से आ रहे कई लेखकों से मुलाकात हुई – मसलन सागर से आये बुजुर्ग साहित्‍यकार प्रो श्‍यामसुन्‍दर दुबे, गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र और तिरुअनंतपुरम् से आई रति सक्‍सेना मुझे पहले ही दौर में मिल गये थे। जब उन्‍हें मेरे भ्रमण कार्यक्रम का पता चला तो बुद्धिनाथ और रति भी साथ चलने को तैयार हो गये। हम तीनों नाश्‍ता करने के तुरंत बाद मुक्तिबोध के निवास, उनके कार्य-स्‍थल दिग्विजय कॉलेज और उन स्‍थलों को देखने निकल पड़े, जिनका उनके जीवन और रचना-संसार से गहरा रिश्‍ता रहा है।

मुक्तिबोध अपने जीवन के अंतिम दिनों तक जिस दिग्विजय कॉलेज में पढ़ाते रहे थे, उसी कॉलेज के पश्चिमी छोर पर मुख्‍य द्वार के पास बना एक छोटे-सा दो-मंजिला भवन उनका निवास रहा था। राज्‍य सरकार ने इसी निवास को मुक्तिबोध स्‍मृति संस्‍थान और त्रिवेणी संग्रहालय के रूप में संरक्षित कर लिया है, जिसमें मुक्तिबोध के ही समकालीन दो वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों स्‍व पदुमलाल पुन्‍नालाल बक्षी और बल्‍देवप्रसाद मिश्र की कृतियों, उनकी हस्‍त-लिपियों, दुर्लभ चित्रों और स्‍मृति चिन्‍हों को संग्रहीत कर लिया गया है। उस दिन ईदुल-जुहा के कारण कॉलेज बंद था, लेकिन संग्रहालय जरूर खुला था। हम प्रात 11 बजे जब यहां पहुंचे तो संग्रहालय के निकट ही लगी तीनों वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों की प्रतिमाओं के पास खुले स्‍थान पर शामियाना लगाया जा रहा था, जहां सायं 4 बजे रचना शिविर का उदघाटन समारोह आयोजित किया जाना था।

संग्रहालय के स्‍वागत कक्ष में हमारी मुलाकात एक बु‍जुर्ग-से सज्‍जन से हुई जो राज्‍य सरकार के ही राजस्‍व विभाग के सेवा-निवृत्‍त कर्मचारी थे और अब इस संग्रहालय के स्‍वागत अधिकारी का काम देख रहे थे। ऊपर-नीचे के इन्‍हीं चार कमरों में तीनों साहित्‍यकारों से संबंधित पुस्‍तकों, हस्‍तलिपियों और उनके चित्रों को सजाया गया है। संभवत इसी संस्‍थान के सही विकास और उसके बेहतर उपयोग की दृष्टि से इस भवन के पास ही राज्‍य सरकार ने एक नया ‘सृजन-संवाद’ भवन भी बनवाया है, जिसमें संदर्भ-सामग्री के संग्रह, आम लोगों के लिए वाचनालय, संगोष्‍ठी-कक्ष और लेखकों-शोधार्थियों के लिए आवास-कक्ष बनवाये गये हैं, लेकिन उचित रख-रखाव के अभाव में दो साल पहले बना यह नवनिर्मित भवन अब उजाड़-सा पड़ा है। सुरक्षा के अभाव में कुछ उठाईगीर इस भवन में से दरवाजों के कुंदे, बिजली के उपकरण (पंखे, ट्यूब-लाइटें-स्विच आदि) और बाथरूम की फिटिंग्‍स तक उखाड़कर ले गये हैं। पूछने पर जानकारी मिली कि अब सरकार ने उसकी रखवाली की व्‍यवस्‍था की है और दुबारा कुछ राशि स्‍वीकृत कर उसे फिर से तैयार करवाया जा रहा है।

इसी कॉलेज परिसर में रियासती जमाने के बने दो तालाब (रानी सागर और बूढ़ा सागर) हैं, जिनमें बारहों महीने जल भरा रहता है। कहते हैं, रियासती जमाने में स्‍थानीय राजघराने की स्त्रियां इसी रानीसागर में जल-क्रीड़ाएं करती थीं, इसीलिए इस जल को साफ सुथरा रखने पर पूरा ध्‍यान दिया जाता था, लेकिन आजकल ये जल-स्रोत स्‍थानीय जनता के लिए सार्वजनिक नहानघर हो गया है, जहां बस्‍ती की स्त्रियां और शहर के धोबी इस जल को कपड़े धोने के काम में लेते हैं। इन तालाबों के किनारे कुछ पुरानी शैली के मंदिर और मस्जिद भी हैं, जो आम लोगों को धर्मभीरू बनाये रखने में अपनी पारंपरिक भूमिका निभा रहे हैं। यही तालाब और पर्यावराण मुक्तिबोध की कविताओं में सहज ही रेखांकित किया जा सकता है। मैं जिस विश्राम-गृह में रुका हुआ था, वह भी संयोग से इसी रानीसागर के किनारे पर स्थि‍त था, जो अनायास ही रात के अंधेरे में मुझे उन कविताओं में वर्णित भूगोल की तरफ खींच ले जाता था। कॉलेज की इमारत का स्‍थापत्‍य भी कुछ इसी वातावरण का अटूट हिस्‍सा लगता है, जो रियासती जमाने में स्‍थानीय शासकों ने अपने बचाव के लिए एक किले के रूप में बनवाया था। 1947 में जब देश आजाद हुआ और रियासती शासन समाप्‍त हो गया तो राजा दिग्विजयसिंह ने अपना यश बरकरार रखने के लिए इसे एक शिक्षण संस्‍थान का रूप दे दिया और उन्‍हीं के नाम से यह अब दिग्विजय कॉलेज के रूप में प्रसिद्ध है।

इसी कॉलेज के त्रिवेणी परिसर में अपरान्‍ह 4 बजे मुक्तिबोध स्‍मृति रचना शिविर का उदघाटन कार्यक्रम सम्‍पन्‍न होना था। भ्रमण और भोजन के उपरान्‍त नियत समय पर सभी प्रतिभागी रचनाकार समारोह स्‍थल पर पहुंच गये। यह देखकर अच्‍छा लगा कि इस समारोह में रचनाकारों के अलावा बड़ी संख्‍या में राजनांदगांव नगर के नागरिक और साहित्‍यप्रेमी उत्‍साह से भाग लेने के लिए उपस्थित थे। समारोह के आरंभ में संयोजक की घोषणा से ही पहली बार यह बात मेरी जानकारी में आई कि मुझे इस आयोजन में मुख्‍य अतिथि के रूप में मंच पर बैठना है और जाहिर है उसी रूप में अपना उदबोधन भी देना है। यों मंच पर अध्‍यक्ष के रूप में राज्‍य पुलिस के महानिदेशक और वरिष्‍ठ साहित्‍यकार विश्‍वरंजनजी के उपस्थित रहने की तो जानकारी पहले से थी ही, बाकी हल्‍का-सा अनुमान था कि कुछ वरिष्‍ठ लोग शायद और भी रहें। वे मंच पर रहे भी – खासतौर से स्‍थानीय वरिष्‍ठ साहित्‍यकार शरद कोठारी, प्रो श्‍यामसुंदर दुबे, बुद्धिनाथ मिश्र, श्रीप्रकाश मिश्र, रति सक्‍सेना और युवा कवि जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव की उपस्थिति ने निश्‍चय ही समारोह को गरिमापूर्ण बना दिया। हालांकि वक्‍ता के रूप में प्रो अशोक संघई और शरद कोठारी जी को स्‍वागत भाषण देना था, मुझे मुख्‍य अतिथि के रूप में उदघाटन भाषण और विश्‍वरंजनजी को अपना अध्‍यक्षीय उदबोधन। सभी वक्‍ताओं ने नपे-तुले शब्‍दों में अपनी बात कही और निर्धारित समय-सीमा में कार्यक्रम सम्‍पन्‍न हो गया। कार्यक्रम के अंत में बस्‍तर के लोक-कलाकारों ने अपना पारंपरिक मांगलिक मोहरी वादन प्रस्‍तुत कर सभी आगंतुकों को उस अंचल की लोक-संवेदना से अनायास ही जोड़ लिया।

उदघाटन के बाद उसी रात्रि से सिन्‍धु भवन में रचना शिविर के विभिन्‍न कार्यक्रमों की विधिवत शुरुआत हो गई। पहले कार्यक्रम के रूप में राजनांदगांव के स्थानीय रचनाकारों के काव्य पाठ का आयोजन हुआ, जिसमें शंकर सक्सेना, अब्दुल सलाम कौसर, प्रोफेसर कृष्ण कुमार द्विवेदी, दाऊलाल जोशी, डॉ शंकर मुनिराय, आत्माराम कोशा, आभा श्रीवास्तव, राजेश गुप्ता, गिरीश ठक्कर आदि ने अपनी रचनाएं पढ़ीं।

अगले दिन 18 दिसंबर को सुबह 9-30 बजे से जिन विचार-गोष्ठियों की शुरुआत हुई, उनमें प्रथम गोष्‍ठी के रूप में ‘रचना की दुनिया और दुनिया की रचना’ विषय पर श्रीप्रकाश मिश्र और नंद भारद्वाज ने अपना वक्‍तव्‍य प्रस्‍तुत किया। दोनों वक्‍ताओं ने समकालीन हिन्‍दी लेखन की समृद्ध विरासत, उसके वर्तमान स्‍वरूप, रचना में यथार्थ और कल्‍पना तथा नयी रचनाशीलता में लक्षित बदलावों पर विस्‍तार से चर्चा की। चर्चा में रति सक्‍सेना, आनंद कृष्‍ण, शंकर सक्‍सेना और कई युवा रचनाकारों ने भाग लिया। दूसरे सत्र में ‘रचना और भारतीयता’ विषय पर डॉ रोहिताश्‍व ने जहां साहित्‍य की विशाल परंपरा में भारतीयता की पहचान को रेखांकित किया वहीं युवाकवि जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव ने नयी रचनाशीलता और लोक-तत्‍वों के माध्‍यम से भारतीयता की पहचान पर विशेष बल दिया।  तीसरे सत्र में प्रो श्‍यामसुन्‍दर दुबे और रति सक्‍सेना ने ‘रचना और प्रजातंत्र’ विषय पर अपने सारगर्भित वक्‍तव्‍य प्रस्‍तुत किये। इसी प्रकार तीन दिन तक चली विचार-गोष्ठियों के क्रम में रचना और मनुष्‍यता का संकट, रचना और संप्रेषण, शब्‍द समय और संवेदना, कविता की अद्यतन यात्रा, कविता में छंद और लय, समकालीन लेखन में महिला, दलित और आदिवासी, समकालीन हिन्‍दी कहानी, हिन्‍दी आलोचना के स्‍वरूप और ललित निबंधों पर जहां वरिष्‍ठ रचनाकारों ने अपने आधार वक्‍तव्‍य प्रस्‍तुत किये वहीं युवा रचनाकारों और अन्‍य प्रतिभागियों ने उन पर अपने मौलिक विचार प्रस्‍तुत कर इस त्रिदिवसीय आयोजन को अपनी वैचारिक ऊष्‍मा से समृद्ध बनाया।

इन विचार गोष्ठियों में श्रीप्रकाश मिश्र, श्‍यामसुन्‍दर दुबे, बुद्धिनाथ मिश्र, रोहिताश्‍व, रति सक्‍सेना, रघुवंश मणि, प्रफुल्‍ल कोलख्‍यान, जितेन्‍द्र श्रीवास्‍तव, श्रीराम परिहार और नंद भारद्वाज ने जहां मार्गदर्शक साहित्‍यकार के रूप में अपनी सहभागिता निभाई वहीं छत्‍तीसगढ़ के प्रमुख  साहित्‍यकारों में डॉ बल्‍देव, अशोक संघई, राम पटवा, रवि श्रीवास्‍तव, प्रो चित्‍तरंजन, कमलेश्‍वर साहू, नासिर अहमद सिकंदर, कोलकाता से आये कथाकार बिमलेश त्रिपाठी, भुवनेश्‍वर से आये दिनेश माली, महंतकुमार शर्मा जैसे युवा रचनाकारों ने अपने सटीक प्रश्‍नों और टिप्‍पणियों के माध्‍यम से इस विमर्श को नयी अर्थवत्‍ता प्रदान की।‍ यद्यपि विचार-गोष्ठियों में यह बात जरूर अनुभव की गई कि कुछ विद्वान अपनी बात को सटीक और सारगर्भित तरीके से प्रस्‍तुत करने के कम अभ्‍यस्‍त हैं। अक्‍सर उनके वक्‍तव्‍य मूल विषय से थोडे अवांतर, बोझिल और कुछ हद तक दोहराव के भी शिकार पाये गये, लेकिन इन छोटी कमियों के बावजूद उनकी ईमानदारी, परिश्रम और साहित्‍य के प्रति उनकी निष्‍ठा में शायद ही कोई कमी-कमजोरी महसूस की गई हो। इन सभी लोगों से रूबरू संवाद और अनौपचारिक चर्चाएं इस आयोजन की अनूठी उपलब्धि कही जा सकती है, जो महानगरों और साहित्‍य के बड़े ठिकानों में विरल होती जा रही है।

रचना शिविर की दूसरी रात्रि जहां बाहर से आये वरिष्‍ठ रचनाकारों के काव्‍य-पाठ पर केन्द्रित रही वहीं तीसरी रात्रि को प्रतिभागी युवा रचनाकारों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। इन युवा रचनाकारों में श्रीमती शैल चन्‍द्रा, शोभा शर्मा, प्रदीप देशमुख, सुमन शर्मा, अशोक बर्डे, ज्‍योति द्विवेदी, हाशम बेग आदि की कविताएं विशेष उल्‍लेखनीय रहीं। इस आयोजन की खूबी यह थी कि शिविर में आये वरिष्‍ठ रचनाकारों की प्रत्‍येक कविता पर अपनी समीक्षात्‍मक टिप्‍पणी प्रस्‍तुत करते हुए उनकी रचनाशीलता के संबंध में उपयोगी सुझाव भी दिये।

शिविर के अंतिम दिन 20 दिसंबर को अपरान्‍ह वरिष्‍ठ साहित्‍यकार विश्‍वरंजन की अध्‍यक्षता में आयोजित समापन समारोह में अतिथि साहित्‍यकारों को शॉल, श्रीफल और स्‍मृति चिन्‍ह प्रदान कर सम्‍मानित किया गया। इसी अवसर पर मुक्तिबोध के मित्र रचनाकार शरद कोठारी और गीतकार शंकर सक्सेना को उनके साहित्यिक अवदान के लिए प्रमोद वर्मा स्मृति अलंकरण से सम्मानित किया गया। इस आयोजन की कामयाबी में संस्थान के कार्यकारी निदेशक जयप्रकाश मानस, कमलेश्वर साहू,  बीएल पाल,  डी एस अहलूवालिया, सुरेश छत्री, शांति स्वरूप शर्मा  आदि का उल्लेखनीय योगदान रहा।

इस आयोजन की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि राजनांदगांव जैसी जगह पर बीस से अधिक वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों और सौ से अधिक युवा रचनाकारों की जीवंत उपस्थिति और हर गोष्‍ठी में उनकी सक्रिय भागीदारी से यह बात पुष्‍ट होती है कि दूर-दराज के क्षेत्रों में साहित्‍य और नये रचनाकर्म को लेकर आज भी लोगों के उत्‍साह और उत्‍सुकता में कोई कमी नहीं आई है, शायद यही कारण है कि मध्‍य भारत का यह दूरस्‍थ इलाका हिन्‍दी की ऊर्जावान रचनाशीलता के लिए आज भी एक मिसाल माना जाता है और यह अनायास नहीं है कि इसी रचनाशीलता के बीच से मुक्तिबोध, श्रीकान्‍त वर्मा, अशोक वाजपेयी, प्रमोद वर्मा, धनंजय वर्मा, विनोदकुमार शुक्‍ल, एकान्‍त श्रीवास्‍तव जैसी रचनात्‍मक प्रतिभाएं आज हिन्‍दी संसार का गौरव मानी जाती है। अपने प्रिय कवि की कर्मभूमि पर आयोजित ऐसे सार्थक उपक्रम में भाग लेना मेरे लिए किसी विरल अनुभव से कम नहीं था।

nandbhardwaj@gmail.com

Nand Bhardwaj

Nand Bharadwaj is an eminent writer of Hindi & Rajasthani and a well-known media expert. Critics and the fans both have equally appreciated his contribution in literature as well as in media. Born in a small village in Barmer district of Rajsthan in 1948, he has completed his post-graduation in Hindi literature from Rajasthan University  in 1971. He has contributed a number of books such as : SAHITYA PARAMPARA AUR NAYA RACHNA KARMA (collection of literary essays), SAMVAD NIRANTER (collection of interviews with senior writers and cultural experts), and SANSKRITI JANSANCHAR AUR BAZAR (collection of articles on culture and media). He has written number of short stories and a novel ‘SAMHI KHULATO MARAG’ in Rajasthani. His translation of ‘The Outsider’ of famous novelist Albert Camus in Rajsthani was published in 1973. He himself is a well-known poet of Hindi and Rajasthani. ANDHAR PAKH, JHEEL PER HAVI RAAT and HARI DOOB KA SAPNA  are some of his own poetry collections. He has also been an editor of various daily, weekly and monthly Journals and publications. His major editorial works include RET PAR NANGE PANV (An anthology of senior Hindi poets of Rajasthan, published by Rajasthan Sahitya Akademi in 1989) and TEEN BEESI PAAR (An anthology of Rajasthani short stories) published by National Book Trust, India in 2007. As an honor for his literary contributions, he was awarded by Rajasthan Graduates National Service Association, Mumbai in 1975 for his poetry collection ANDHAR PAKH, “Narottamdas  Swami Gadya  Puruskar” for his book “DAUR AR DAYRO” in 1984. In 1995 he was awarded “Pt. Brij Mohan Joshi Gadya Puruskar”   for his exceptional service to Hindi and Rajasthani literature. He has also been awarded by DG Doordarshan for his outstanding contribution in the production of programme series on “INDIAN CLASSICS” during DD Annual Award 2003 at Mumbai. Planning, direction and anchoring of the programme series BHARTAYAN, based on 150 years of Indian freedom struggle, its main events and comprehensive development before and after the Independence with special reference to the Rajasthan state. This documentary series was produced by DDK, Jaipur during 2006-07 and has also been telecast on National Channels of DD during 2007-08. He has been awarded the most prestigious Sahitya Akademi Award-2004 on his Rajasthani novel ‘SAMHI KHULATO MARAG’. As media professional, he has been working with All India Radio and Doordarshan since 1975 as a professional and senior programme officer. Recently K.K. Birla Foundation has confered the ‘Bihari Award’ on his poetry collection ‘Hari Doob Ka Sapna’ for the year 2008, which is considered to be the prestigious award in literarature. He has been retired from the post of Senior Director, Doordarshan Kendra, Jaipur in August 2008. At present, he is active as a free-lance writer and media expert.

अपने बारे में

साहित्य-कर्म मेरे लिए जीने का तरीका है

0 नंद भारद्वाज

पिछले चार दशक से मैं हिन्दी और राजस्थानी में अपने लेखन-कार्य से जुड़ा हूं, लेकिन आज भी हर नयी रचना एक शुरूआत लगती है और संतोष तो बिरले ही होता है। लेखन मेरे लिए शौक या हॉबी का सबब कभी नहीं रहा, बल्कि यही मेरे जीने का तरीका है। कई बार लोग मुझसे लेखन की प्रेरणा को लेकर सवाल करते हैं तो मैं अवाक् रह जाता हूं। अगर संवाद मेरी जरूरत है, तो इसमें और किसी प्रेरणा को कैसे देखूं? लेखन मेरे लिए हमेशा संवाद की तरह ही रहा है – अपने समय के साथ और खुद अपने साथ भी। परिवार और परिवेश में कुछ कारण अवश्य बन जाते होंगे, जिनसे किसी रचनात्मक कार्य की शुरूआत संभव होती हो।

मैं गांव से आया हुआ व्यक्ति हूं, यह न कोई खूबी है और न कैफियत। वहां साहित्य या संस्कृति को लेकर ऊपरी तौर पर कोई स्वरूप या संकेत नहीं दिखाई देता, लेकिन उन संस्स्कारों की जड़ें शायद काफी गहरी थीं। उम्र के साथ ज्यों-ज्यों मेरी आंख खुलती गई और अपनी जड़ों की तलाश भी जारी रही तो मैंने पाया कि अद्भुत थे वे संस्कार और वह लोक-विरासत, जिसकी गोद में पलकर मैं बड़ा हुआ और अपना होश संभाला। मेरे बड़ों ने भी शायद यही अपेक्षा की थी कि मुझमें वही संस्कार और रुचियां विकसित हों, जो वे मुझ तक संजोकर लाए थे। खुद अपनी ओर से भी यही प्रयत्न रहा कि मैं उन चीजों को जानूं-समझूं। मैंने रुचि लेकर कोशिश की। इस लोक-विरासत से मिली रामायण, महाभारत की आख्यान-कथाओं को अपनी रुचि और उनकी प्रेरणा से जाना-समझा और सत्य, न्याय और लोकधर्म के प्रति एक बुनियादी आस्था अपने भीतर अंकुरित होते हुए महसूस की। उन्हीं स्कूली दिनों की शुरूआत में  मेरे एक प्रिय शिक्षक रहे – मास्टर लज्जाराम, जिन्होंने मेरे भीतर यह विश्वास पैदा किया कि जीवन में अगर कुछ बेहतर करना है तो अच्छी शिक्षा बेहद जरूरी है। मेरे इसी प्रारंभिक जीवन-अनुभव से जुड़ी कविता है, ‘हरी दूब का सपना’, जिसके केन्द्र में उन्हीं का आत्मीय व्यक्तित्व और बिखरते सपने संरक्षित हैं।

साहित्य-कर्म को मैं जीवन के एक सहज कर्म की तरह ही लेता हूं – जैसे किसान खेती करता है, कारीगर कोई उपकरण बनाता है या एक शिक्षक शिक्षण का काम करता है। लिखना-पढ़ना मेरे लिए उतना ही सहज और जरूरी काम रहा है, जितने जीवन के दूसरे काम। यह बात अनुभव से ही जानी है कि रचनाकर्म किसी जन्मजात प्रतिभा का मोहताज नही होता, वह सुरुचि और सतत अभ्यास से विकसित किया जा सकता है। लेखन एक दायित्वपूर्ण कर्म अवश्य है, लेकिन कोई अगर इसे विशिष्ट मानकर करता है और स्वयं भी विशिष्ट होने के भ्रम में जीता है, तो न उससे वह कर्म सधता है और न वैशिष्ट्य ही बन पाता है।

अपने बहुविध रचनाकर्म में कविता को मैं अपने चित्त के बहुत करीब पाता रहा हूं। यद्यपि अन्य विधाओं के साथ भी मेरा वैसा ही आत्मीय रिश्ता रहा है। यह बात बाद में जानी कि अनुभव की प्रकृति और अभिव्यक्ति का आवेग ही यह तय करता है कि मुझे अपनी बात किस साहित्य-रूप के माध्यम से कहनी है। किसी प्रासंगिक विषय पर वैचारिक विवेचन प्रस्तुत करना जरूरी लगा, तो आलोचना या निबंध मुझे अनुकूल विधा लगी, अगर कोई जीवन-प्रसंग फिक्शन के बतौर बयान करना ज्यादा सहज और जरूरी लगा, तो कहानी या उपन्यास के आकार में उसे ढालने का प्रयत्न किया। इसी तरह नाटक, संवाद, संस्मरण आदि में भी मेरी दिलचस्पी रही है। लेकिन अभिव्यक्ति के इन विविध रूपों में कविता के प्रति मेरी लगाव कभी कम नहीं हुआ।

यों हर रचना अनुभव की पुनर्रचना का पर्याय मानी जाती है, लेकिन अपने तंई उस संवेदन को पूरी इन्टैसिटी और भाषिक आवेग के साथ व्यक्त करना मैं रचना की अपनी जरूरत मानता हूं। कविता में अक्सर चीजों के साथ हमारे रिश्ते बदल जाते हैं। यह बदला हुआ रिश्ता हमें उनके और करीब ले जाता है। वहां पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं रह जाता और न पहाड़ कोई निर्जीव आकार। शब्द वही अर्थ नहीं देते, जो सामान्यतः उनसे लिया जाता है। अभिव्यक्ति लय में विलीन होती हुई कुछ तरल आकार ग्रहण करने लगती है और कम-से-कम शब्दों का सहारा लेते हुए मन की गहराई में उतरने का प्रयत्न करती है। यही प्रयत्न कविता को दूसी विधाओं से अलग करता है। यह काव्यानुभव जितना व्यंजित होकर असर पैदा करता है, उतना मुखर होकर नहीं। इसलिए अच्छी कविता के लिए यह जरूरी है कि वह अनावष्यक विस्तार के प्रति सतर्क रहे, भाषा के अपव्यय से बचे और इस बात का खयाल रखे कि अभिव्यक्ति में वह तराश और कसावट आखिर तक बनी रहे। रचनात्मकता की इन्हीं खूबियों के कारण कविता को मैं साहित्यिक अभिव्यक्ति का एक बेहतर फॉर्म मानता हूं। रचना के भीतर मूर्त होता जीवन-यथार्थ, उसमें अन्तर्निहित मानवीय सरोकार और उसके लक्षित पाठक-वर्ग से बनता रिश्ता ही यह तय कर पाता है कि कविता उसकी जीवन-प्रक्रिया में कितनी प्रासंगिक और प्रभावी रह गई है।

यहां यह उल्लेख कर देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि इस सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के लिए मेरा मन अपनी मातृभाषा राजस्थानी में अधिक रमता है। यद्यपि अभिव्यक्ति के बतौर हिन्दी और राजस्थानी दोनों मेरे लिए उतनी ही सहज और आत्मीय हैं और दोनों में समानान्तर रचनाकर्म जारी रखते हुए मुझे कभी कोई दुविधा नहीं होती।

अपने साहित्य-कर्म को लेकर जब भी सार्वजनिक रूप से मान-सम्मान का कोई अवसर आता है और वहां अपनी भाषा को लेकर कोई रियायत या अतिरिक्त दया-भाव देखने में आता है, तो मेरा मन उद्वेलित हो उठता है। मुझ जैसे सैकड़ों राजस्थानी लेखक और करोड़ों मूक लोग आजादी के बाद से अब तक इस भाषा की मान्यता के लिए प्रतीक्षारत हैं। मैं बिना किसी भावावेष के अपने मन की यह पीड़ा दोहराना चाहता हूं कि हमारा यह मान-सम्मान तब तक अधूरा है, जब तक इस भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिल जाती।

जिस भाषा में सात सौ वर्षों की समृद्ध साहित्य-परम्परा मौजूद हो, कविता, कथा, उपन्यास, नाटक, आलोचना और गद्य की तमाम विधाओं में पर्याप्त सृजन उपलब्ध हो, हजारों हस्तलिखित पाण्डुलिपियां और प्रकाषित पुस्तकें शोध-संस्थानों और पुस्तकालयों में अंटी पड़ी हों, लोक-कथाओं, लोक-नाट्योें, लोकगीतों और मुहावरों-लोकोक्तियों का अकूत भंडार बिखरा पड़ा हो, जो आजादी से पहले राजपुताना की रियासतों की राजभाषा रही हो, षिक्षा, कारोबार और आम बोलचाल का आधार रही हो, ढाई लाख शब्दों की नौ जिल्दों में फैला जिसका विषाल शब्दकोष अजूबे की तरह सजा हो, जिसका अपना अलग व्याकरण मौजूद हो, उस करोड़ों लोगों की सजीव और समर्थ भाषा को उसका उचित स्थान न मिले, तो उस पीड़ा को वही जान सकता है, जिसे इस वास्तविकता का अहसास हो।

पिछले चार दशकों में अपने साहित्य-कर्म के साथ मैं मीडिया में भी सक्रिय रहा हूं। इधर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार को कुछ लोग कला-साहित्य के लिए एक खतरे की तरह देखने लगे हैं, जबकि देखना उसे एक सकारात्मक चुनौती की तरह ही चाहिये। इस व्यावसायिक मीडिया की अपनी प्राथमिकताएं हैं। अपनी साख और बौद्धिक वर्ग में घुसपैठ के लिए वह साहित्य या कला-रूपों का मनमाना इस्तेमाल बेशक कर लेता हो, लेकिन साहित्य और कला से उसका रिश्ता कतई विश्वसनीय नहीं बन पाया है। यहां तक कि लोक-प्रसारण का दावा रखने वाली माध्यम इकाइयां भी अपने प्रयत्न के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं अर्जित कर पाई हैं।

व्यावसायिक मीडिया को हम जितनी आसानी से जनसंचार की संज्ञा से विभूषित करने लगते हैं, दरअसल वह उसके मूल मकसद के कहीं आस-पास भी नहीं होता। उस जन की भागीदारी वहां नगण्य है, जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है।

लोग अक्सर इस तथ्य को गौण कर जाते हैं कि लोक-भाषा जन-अभिव्यक्ति का आधार होती है। प्रत्येक जन-समुदाय अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में जो भाषा विकसित करता है और वह उसके सर्जनात्मक विकास की सारी संभावनाएं खोलती है। उसकी उपेक्षा करके कोई माध्यम जनता के साथ सार्थक संवाद कायम नहीं कर सकता।

उदारीकरण की प्रक्रिया में इधर बहुत से बाहरी दबाव अनायास ही बाजार में प्रवेश कर गये हैं। बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ऐसा माहौल बना दिया है, जैसे अब सारा मार्केट और सारे उपभोक्ता उन्हीं के इशारों पर चलेंगे, लेकिन सचाई इतनी सीधी और सरल नहीं है। यह व्यवसायीकरण भी जन-आकांक्षाओं की उपेक्षा करके कहीं अपना पांव नहीं टिका पाता। इन कंपनियों को जब अपना उत्पाद आम लोगों तक पहुंचाना होता है, तो वे हिन्दी या कोई भारतीय भाषा ही क्या, उन भाषाओं की सामान्य बोलियों तक जा पहुंचती हैं। यह एक अनिवार्य संघर्ष है, जिसके बीच लोक-भाषाओं को अपनी ऊर्जा बचाकर रखनी है। साहित्य का काम इन्हीं लोगों के मनोबल को बचाये रखना है। यहीं एक लोक-कल्याणकारी राज्य की सार्थक भूमिका का सवाल भी सामने आता है। लोकतंत्र में लोक और तंत्र एक-दूसरे के पूरक होकर ही जिन्दा रह सकते हैं, अन्यथा न लोक चैन से जी पाएगा और न तंत्र ही साबुत रह पाएगा। दरअसल भाषा, साहित्य और संवाद के यही वे उलझे सूत्र हैं, जिन्हें सुलझाकर ही शायद हम किसी नये सार्थक सृजन की कल्पना कर पाएं।

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